बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता बनाने के लिए कांग्रेस को फैसला करने को कहा है। उन्होंने गेंद कांग्रेस के पाले में डाली है। इससे ऐसा लगता है कि वे चाहते हैं कि कांग्रेस पहल करे और देश भर की पार्टियों को एक साथ लाकर तालमेल बनवाए। लेकिन असल में खुद नीतीश कुमार को कांग्रेस की जरूरत नहीं है। अपने राज्य बिहार में वे कांग्रेस को अलग थलग करने की राजनीति कर रहे हैं और ऐसे दांव चल रहे हैं, जिनसे लग रहा है कि वे राजद, जदयू और लेफ्ट पार्टियों के साथ मिल कर चुनाव लड़ें और कांग्रेस को अकेले लड़ने के लिए छोड़ दें। हालांकि यह घातक हो सकता है। ऐसी गलती 2009 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद और रामविलास पासवान ने की थी।
बहरहाल, कांग्रेस पार्टी बिहार में नीतीश कुमार की सरकार में शामिल है। पिछले आठ साल में यह दूसरा मौका है, जब नीतीश के साथ कांग्रेस का तालमेल हुआ और कांग्रेस उनकी सरकार में शामिल हुई है। लेकिन नीतीश की पार्टी ने कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा से दूरी बनाए रखी। उसका कोई भी नेता कांग्रेस की यात्रा में शामिल नहीं हुआ। इसी तरह नीतीश ने कांग्रेस पार्टी के सिर्फ दो नेताओं के सरकार में जगह दी है, जबकि कांग्रेस के 19 विधायक हैं। इस लिहाज से कांग्रेस का दावा कम से कम तीन मंत्रालय का बनता है। कांग्रेस के दोनों मंत्रियों को बहुत मामूली और दिखावे वाले मंत्रालय दिए गए हैं। अब नीतीश कुमार और राजद ने मिल कर पूर्णिया में विपक्ष की बड़ी रैली का आयोजन किया है। वह रैली 25 फरवरी को होगी, जब रायपुर में कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा होगा और बिहार प्रदेश कांग्रेस का कोई भी बड़ा नेता उस रैली में शामिल होने के लिए प्रदेश में मौजूद नहीं होगा।