बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार ठीक से चल रही है लेकिन ऐसा लग रहा है कि राजनीतिक स्तर पर सात पार्टियों के इस गठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं है। कर्नाटक में चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस ने अपनी ताकत दिखानी शुरू की है। कांग्रेस नेता मंत्रिमंडल विस्तार की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक गतिविधियां भी तेज कर दी है। दूसरी ओर हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के जीतन राम मांझी और विकासशील इंसान पार्टी के मुकेश सहनी दो नावों पर पांव रखे हुए हैं। इस बीच गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी राजद के नेता तेजस्वी व उनके भाई तेजप्रताप अलग तेवर दिखा रहे हैं।
पिछले दिनों बिहार में एक बड़ा कार्यक्रम था, जिसमें तेजस्वी यादव को मुख्य अतिथि के तौर पर हिस्सा लेना था लेकिन वे इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। बताया जा रहा है कि कांग्रेस के नेता कन्हैया कुमार इस कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे इसलिए तेजस्वी उसमें नहीं गए। प्रजापति समाज का यह कार्यक्रम राजनीतिक रूप से बेहद अहम था। कहा जा रहा है कि कन्हैया के साथ तेजस्वी मंच साझा नहीं करना चाहते। पिछले लोकसभा चुनाव में भी बेगूसराय सीट पर राजद ने मुस्लिम उम्मीदवार उतार कर यह सुनिश्चित किया था कि सीपीआई के उम्मीदवार कन्हैया कुमार जीत नहीं सकें। हालांकि कन्हैया राजद से छह फीसदी ज्यादा वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे। तब से राजद नेताओं की चिंता और बढ़ी है। हालांकि यह चिंता बेमानी है क्योंकि सवर्ण जाति के कन्हैया कभी भी तेजस्वी के लिए खतरा नहीं हो सकते हैं।
बहरहाल, राजद के तेवर का संकेत शुक्रवार को मिला, जब वन व पर्यावरण मंत्रालय की बैठक थी और उसमें विभागीय मंत्री तेज प्रताप यादव नहीं पहुंचे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और वित्त मंत्री विजय चौधरी ने बैठक की और तेज प्रताप की कुर्सी खाली रही। इसका भी कोई कारण नहीं बताया गया कि तेज प्रताप बैठक में क्यों नहीं गए।