संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा के लिए सदस्यों को चुनते समय भाजपा का रवैया दूसरी पार्टियों से बहुत अलग होता है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, राजद या दूसरी कई क्षेत्रीय पार्टियां राज्यसभा में सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकीलों और कारोबारियों या परिवार के सदस्यों को भेजने मे ज्यादा दिलचस्पी दिखाती हैं। इसके उलट भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को उच्च सदन में भेजती है। ऐसे नेता राज्यसभा में जाते हैं, जिनका राज्य की राजनीति में भी बहुत बड़ा कद नहीं होता है। कुछ लोग इसके अपवाद होते हैं लेकिन भाजपा ज्यादातर ऐसे ही लोगों को राज्यसभा में भेजती है। तभी जब गुजरात भाजपा के अध्यक्ष सीआर पाटिल ने राज्यसभा सांसदों को लाखों में चंदा देने को कहा तो वह हैरानी की बात थी।
सीआर पाटिल ने पिछले दिनों एक जिले मे पार्टी के कार्यालय का उद्घाटन किया तो इस मौके पर एक राज्यसभा सांसद का किस्सा सुनाते हुए कहा कि बहुत कहने पर उन्होंने पार्टी के लिए 11 लाख रुपए का चंदा दिया। इसके बाद उन्होंने कहा कि पार्टी ने राज्यसभा सांसद बनाया है तो कम से कम 21 लाख रुपए तो देना चाहिए। सोचें, पार्टी ने किसी कार्यकर्ता को राज्यसभा सांसद बनाया तो वह कहां से 21 लाख रुपए दे? और क्या पार्टी राज्यसभा सांसद बनाने के रूप में यह फीस वसूल रही है? हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए नेता टिकट मिलने के बाद 60-70 लाख रुपए खर्च करते हैं। राज्यसभा के चुनाव में वह खर्च नहीं करना पड़ता है। इसलिए 21 लाख रुपए पार्टी फंड में चंदा देने में दिक्कत नहीं है।