विपक्षी पार्टियों के गठबंधन ‘इंडिया’ के साथ एक बड़ी समस्या यह है कि उसे दक्षिण भारत में कुछ और राजनीति करनी है, जबकि उत्तर भारत में उसके बिल्कुल उलट राजनीति करनी है। मिसाल के तौर पर पिछले साल मई में कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में बजरंग दल पर पाबंदी की बात करके भी कांग्रेस जीत गई थी लेकिन यह बात वह उत्तर भारत के किसी राज्य में नहीं कर सकेगी। सो, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में कांग्रेस के नेता या ‘इंडिया’ के घटक दल, जो राजनीति कर रहे हैं या जिस तरह के बयान दे रहे हैं उनसे उत्तर और पश्चिमी राज्यों में नुकसान हो रहा है। सूचना तकनीक और सोशल मीडिया के मौजूदा दौर में वहां दिया गया कोई भी बयान सिर्फ वहीं तक सीमित नहीं रहता है वह सोशल मीडिया और फिर पारंपरिक मीडिया के जरिए ट्रैवल करके पूरे देश में पहुंचता है।
विपक्षी गठबंधन के नेता तीन दक्षिणी राज्यों में चल रहे राजनीतिक विमर्श को लेकर इसी वजह से चिंतित हैं। तमिलनाडु में कांग्रेस की सहयोगी डीएमके के नेताओं ने एक के बाद एक ऐसे बयान दिए हैं, जिनका बचाव मुश्किल हो गया है। राज्य सरकार के मंत्री उदयनिधि स्टालिन और डीएमके सांसद ए राजा ने सनातन को लेकर विवादित बयान दिया। उसे बीमारी बताते हुए मिटाने की बात कही। अभी विपक्षी गठबंधन किसी तरह से इस विवाद को सुलझा रहा था तब तक दयानिधि मारन की एक पुराना वीडियो वायरल हो गया, जिसमें वे कह रहे थे कि उत्तर प्रदेश और बिहार के हिंदी पढ़ने वाले तमिलनाडु में आकर सड़क बनाते हैं और टॉयलेट साफ करते हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बिहार में राजद व जदयू को इस बयान का बचाव करना भारी पड़ा।
उधर कर्नाटक में अचानक फिर से हिजाब का मामला उठ गया। मीडिया में खबर आ गई कि राज्य की कांग्रेस सरकार ने स्कूल और कॉलेजों में हिजाब पहनने पर लगाई गई पाबंदी हटा दी है। फिर सोशल मीडिया के जरिए इसका प्रचार शुरू हो गया। हालांकि राज्य सरकार ने तुरंत इसको ठीक करने का प्रयास किया और सिद्धरमैया ने कहा कि सरकार इस पर विचार कर रही है, अभी फैसला नहीं हुआ है। डैमेज कंट्रोल के तहत उनका यह बयान आया और लग रहा है कि लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस सरकार इसे टाले रहेगी। क्योंकि यह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का बड़ा मुद्दा बन सकता है।
ऐसे ही केरल में सीपीएम के नेताओं ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम को राजनीतिक मुद्दा बना दिया है। सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने इस कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता ठुकरा दिया। उसके बाद उनकी पार्टी लगातार कांग्रेस पर दबाव बनाए हुए है कि वह भी अयोध्या के कार्यक्रम में शामिल नहीं हो। सो, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल के नेताओं के बयानों या घटनाक्रमों से वहां की राजनीति में हो सकता है कि विपक्षी गठबंधन को फायदा हो जाए लेकिन उत्तर भारत में नुकसान हो सकता है।