एक अध्ययन में यह खुलासा किया गया है कि आपदा, विशेष तौर पर प्राकृतिक आपदा, के बाद सत्ता की निरंकुशता पहले से अधिक बढ़ जाती है| पहले प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति का समय लंबा था, पर अब जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से यह एक वार्षिक और लगातार घटना है| जाहिर है, जलवायु परिवर्तन सत्ता की निरंकुशता और जनता के दमन के लिए जिम्मेदार होती जा रही है|
जलवायु परिवर्तन और तापमान बृद्धि के प्रभाव से दुनिया बदल रही है और आपदाएं भी लगातार हमें जकड़ रही हैं| बाढ़, सूखा, भूस्खलन, हिमस्खलन, तूफान, चक्रवात, इत्यादि अब सामान्य हो चले हैं| हमारे प्रधानमंत्री हमेशा आपदा में अवसर की बात करते हैं – किसी भी आपदा में जनता को कोई अवसर तो नहीं मिलता पर सत्ता को अपनी निरंकुशता तेजी से बढाने और जनता का नए सिरे से दमन का अवसर जरूर मिल जाता है| याद कीजिये, वर्ष 2020 का वह दौर जब कोविड 19 एक आपदा बन कर उभरा था| उस दौर में लाखों व्यक्ति सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने घरों तक पैदल गए, और सत्ता उनकी मदद के बदले उन्हें प्रताड़ित करती रही| अनेक पत्रकार जो इन श्रमिकों की व्यथा और सरकारी अकर्मण्यता को उजागर कर रहे थे, उन्हें जेल में बंद कर दिया गया| दूसरी तरफ इसी दौर में दिल्ली दंगों की धार्मिक उन्माद में रंगी चार्जशीट दायर की गयी, और अनेकों निरपराधों को जेल में बंद कर दिया गया, और साथ ही उन पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी बंद किया गया जो तथ्यों को उजागर कर रहे थे| यही हमारे प्रधानमंत्री के लिए आपदा में अवसर के मायने हैं| (Natural Disasters)
एक अध्ययन में यह खुलासा किया गया है कि आपदा, विशेष तौर पर प्राकृतिक आपदा, के बाद सत्ता की निरंकुशता पहले से अधिक बढ़ जाती है| पहले प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति का समय लंबा था, पर अब जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से यह एक वार्षिक और लगातार घटना है| जाहिर है, जलवायु परिवर्तन सत्ता की निरंकुशता और जनता के दमन के लिए जिम्मेदार होती जा रही है| बाढ़ और भयानक सूखा जैसी चरम पर्यावरणीय आपदाएं अब दुनिया के लिए सामान्य स्थिति है, क्योंकि पूरे साल कोई ना कोई क्षेत्र इनका सामना कर रहा होता है| जब ऐसी स्थितियां यूरोप, अमेरिका या एशिया के कुछ देशों में पनपती हैं तब दुनिया भर का मीडिया इन्हें दिखाता है, पर अफ्रीका, प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण अमेरिकी देशों के मामले में मीडिया चुप्पी साध लेता है| वैश्विक मीडिया के लिए पूरी दुनिया गोरे और अमीर आबादी में सिमट कर रह गयी है| चरम पर्यावरणीय आपदाएं भी जलवायु परिवर्तन और तापमान बृद्धि के सन्दर्भ में एक गलत नाम है, क्योंकि इन चरम घटनाओं का कारण प्रकृति और पर्यावरण नहीं है, बल्कि मनुष्य की गतिविधियाँ हैं, जिनके कारण बेतहाशा ग्रीनहाउस गैसों का वायुमंडल में उत्सर्जन हो रहा है|
जर्नल ऑफ़ डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार दुनिया में सत्ता की निरंकुशता पिछले कुछ वर्षों से बढ़ती जा रही है, और इन्हीं वर्षों के दौरान जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से प्राकृतिक आपदाओं की संख्या भी तेजी से बढी है| इस अध्ययन के अनुसार चरम प्राकृतिक आपदाओं और सत्ता द्वारा जनता के दमन का सीधा सम्बन्ध है| इस अध्ययन को डाकिन यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्रियों, वैज्ञानिकों और मनोवैज्ञानिकों के एक दल ने किया है| इसमें प्रशांत क्षेत्र, पूर्वी एशिया और कैरीबियन क्षेत्र के 47 छोटे द्वीपीय देशों में वर्ष 1950 से 2020 के बीच प्राकृतिक आपदाओं और प्रजातंत्र के स्तर का आकलन किया गया है, और इनमें परस्पर सम्बन्ध निर्धारित किया गया है| प्रजातंत्र के स्तर के आकलन के लिए पोलिटी-2 विधि का सहारा लिया गया है, जो प्रजातंत्र के स्तर के आकलन के लिए दुनियाभर में उपयोग में लाया जाता है| प्राकृतिक आपदाओं के बारे में जानकारी सम्बंधित देशों के मौसम विभाग से प्राप्त की गयी|(Natural Disasters)
प्राकृतिक आपदाएं और प्रजातंत्र: कैसे बढ़ती है सत्ता की निरंकुशता?
इस अध्ययन के अनुसार चरम प्राकृतिक आपदाओं से केवल समाज, स्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधन ही प्रभावित नहीं होते बल्कि राजनैतिक माहौल भी प्रभावित होता है, पर इसकी चर्चा शायद ही कभी की जाती है| एक चरम प्राकृतिक आपदा का प्रभाव औसतन सात वर्षों तक रहता है, और इस दौरान स्थानीय स्तर पर प्रजातंत्र के स्तर में लगभग 25 प्रतिशत की गिरावट आती है| आपदा के बाद पहले वर्ष में ही प्रजातंत्र के स्तर में 4.25 प्रतिशत की गिरावट आ जाती है| आपदा के बाद प्रजातंत्र में गिरावट के असर से जनता की आजादी, राजनैतिक आजादी, सभा/आन्दोलन की आजादी और अभिव्यक्ति की आजादी भी प्रभावित होती है| कुल मिलाकर मानवाधिकार प्रभावित होता है|
जर्नल ऑफ़ डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार आपदाओं के बाद सरकारें जनता की मदद तो करती हैं, पर इसी मदद के नाम पर अपनी निरंकुशता भी बढाती जाती हैं| दुखद यह है कि अधिकतर मामलों में आपदा के बाद जनता स्वयं सत्ता को अपने दमन की छूट देती है| मदद और सहायता के नाम पर सरकार को दमन के लिए एक सामाजिक लाइसेंस मिल जाता है| ऐसी आपदाओं के समय सत्ता पूरी तरह व्यक्तिवादी हो जाती है, और सेना की भूमिका बढ़ जाती है| आपदा के नाम पर सीमाओं से सेना को हटाकर जनता के बीच हरेक जगह भेज दिया जाता है| हरेक देश में सेना को आपदाओं से निपटने का प्रशिक्षण दिया जाता है, और सेना के जवान इसे बखूबी से करते भी हैं| समस्या तब खडी होती है, जब आपदा के बाद भी सेना जनता के बीच अपना डेरा जमाये रखती है, और सत्ता के इशारे पर मानवाधिकार हनन की कार्यवाही करती है| आपदाओं के बाद सत्ता चुनावों में अधिक हस्तक्षेप करती है और इसके साथ ही मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राजनैतिक विपक्षियों का दमन करती है| (Natural Disasters)
हमारे देश में तो धार्मिक आपदाएं भी खूब होती हैं – मंदिर में भगदड़, प्रवचन में भगदड़, कुम्भ में भगदड़ – इन सबमें लोग मरते भी खूब हैं| इन आपदाओं के बाद भी सत्ता और स्थानीय प्रशासन का निरंकुश स्वरूप ही नजर आता है| इंटरनेट पर पाबंदी, सही खबर उजागर करने वाले पत्रकारों पर पुलिस और कानून की कार्यवाही और आपदा स्थल से लोगों को दूर रखना – यह सब हमारे देश में आपदा के बाद की सामान्य प्रक्रियाएं हो चली हैं|
आपदा से प्रजातन्त्र के विनाश का सबसे बाद उदाहरण हो वर्ष 2024 ने हमें दे दिया है – आधुनिक इतिहास का यह तापमान के संदर्भ में सबसे गरम वर्ष रहा, लगभग हरेक देश के किसी ना किसी क्षेत्र में तापमान के पुराने रिकार्ड ध्वस्त हुए, बाढ़ ने अभूतपूर्व तबाही मचाई – और इसी वर्ष भारत में नरेंद्र मोदी की बीजेपी सरकार और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी ने चुनावों में फिर से जीत हासिल कर सत्ता पर अधिकार किया| दोनों ही अपने देशों में प्रजातन्त्र को खोखला कर रहे हैं| (Natural Disasters)
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