महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी को समझ में नहीं आ रहा है कि वह अपनी नई सहयोगी यानी एनसीपी के अजित पवार खेम के साथ कैसे डील करें। एक तरफ अजित पवार की मांग है, जो खत्म ही नहीं हो रही है और उसी बीच छगन भुजबल ने अलग राजनीति शुरू कर दी है। भाजपा को उम्मीद है कि अजित पवार की वजह से उसको मराठा वोट मिलेगा लेकिन मराठा आरक्षण के आंदोलन ने भाजपा का सिरदर्द बढ़ाया हुआ है। आरक्षण आंदोलन के बाद सरकार ने मराठाओं को आरक्षण देने का ऐलान कर दिया लेकिन अब अन्य पिछड़ी जातियों की ओर से इसका विरोध हो रहा है। उनका कहना है कि अगर मराठाओं को ओबीसी में शामिल करके उनके कोटे से आरक्षण दिया जाता है तो इसका बड़ा विरोध होगा।
ध्यान रहे मराठा आरक्षण के आंदोलन का केंद्र मराठवाड़ा का जालना है। वहीं पर मनोज जरांगे पाटिल ने भूख हड़ताल की थी। उसी जालना में पिछले हफ्ते ओबीसी समुदाय ने रैली करके ताकत दिखाई। अजित पवार खेमे के नेता और राज्य सरकार के मंत्री छगन भुजबल इस रैली में शामिल हुए और ऐलान किया कि अगर ओबीसी कोटे से मराठाओं को आरक्षण दिया गया तो इसका बड़ा विरोध होगा और पूरे प्रदेश में आंदोलन होगा। इससे भाजपा की दुविधा और बढ़ी है। उसे एक तरफ कुआं तो दूसरी ओर खाई दिखाई दे रहा है। सवाल है कि क्या अजित पवार और छगन भुजबल अलग अलग राजनीति कर रहे हैं या यह दोनों का साझा खेल है? ध्यान रहे भुजबल राज्य के सबसे बड़े ओबीसी नेताओं में से हैं। भाजपा का वोट आधार भी ओबीसी में है। इसलिए उसे बहुत सावधानी से इस मामले को हैंडल करना होगा।