असली लोक जनशक्ति पार्टी किसकी है, पशुपति पारस की या चिराग पासवान की? बहुत जल्दी इसका फैसला होने वाला है। चुनाव आयोग ने दोनों नेताओं को अपने अपने दावे के समर्थन में दस्तावेज देने को कहा है। चुनाव आयोग ने 25 जुलाई तक दस्तावेज जमा करने का आदेश दिया है। ऐसा लग रहा है कि चिराग पासवान को उनके पिता की पार्टी मिल जाएगी। गौरतलब है कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद लोक जनशक्ति पार्टी बंट गई थी। पार्टी के पांच सांसदों के साथ पशुपति पारस अलग हो गए थे और लोकसभा में उनके गुट को मान्यता मिल गई है। वे केंद्र में मंत्री भी बन गए थे। तब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का उनको समर्थन मिला हुआ था। लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पारस को किनारे करके चिराग के साथ तालमेल किया और चिराग पांच सांसदों के साथ मजबूत होकर निकले हैं। वे अब केंद्रीय मंत्री हैं।
जब उनकी पार्टी में विभाजन हुआ था तब चुनाव आयोग ने चिराग पासवान या पशुपति पारस में से किसी को असली पार्टी का दर्ज नहीं दिया था। चिराग की पार्टी का नाम लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास हो गया था और पारस की पार्टी राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी हो गई थी। इसका मतलब है कि लोक जनशक्ति पार्टी का नाम और उसका झोंपड़ी चुनाव चिन्ह आयोग के पास रिजर्व है। एक तो चुनाव आयोग का रिकॉर्ड है कि जो पार्टी केंद्र सरकार के साथ होती है उसे वह असली का दर्जा देती है। जैसे महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे गुट को असली शिव सेना और अजित पवार गुट को असली एनसीपी का दर्जा दिया गया। उसी तरह चिराग को असली लोजपा माना जाएगा। लेकिन शिंदे और अजित पवार से अलग चिराग पासवान सचमुच अपने पिता की विरासत और उनकी बनाई पार्टी के वोट आधार पर एकाधिकार रखते हैं। वे लोकसभा में पांच सीटों पर लड़े और पांचों जीते, जबकि पारस न खुद चुनाव लड़े और न उनकी पार्टी का कोई सदस्य चुनाव लड़ा। इसलिए आयोग का क्या फैसला होगा इसमें कोई संदेह नहीं दिख रहा है।