पहला कमाल तो यह हुआ था कि आतंकवादियों की फंडिंग के आरोप में जेल में बंद इंजीनियर राशिद को जम्मू कश्मीर में चुनाव प्रचार करने के लिए जमानत दी गई। अदालत ने राशिद को दो अक्टूबर तक की जमानत दी थी क्योंकि एक अक्टूबर को मतदान खत्म हो रहा था। उसके बाद राशिद को जेल जाना था। लेकिन अब दूसरा कमाल यह हुआ है कि अदालत ने राशिद की अंतरिम जमानत की अवधि 10 दिन के लिए बढ़ा दी है। अब वे 12 अक्टूबर तक जेल से बाहर रहेंगे। गौरतलब है कि आठ अक्टूबर को हरियाणा के साथ ही जम्मू कश्मीर के भी चुनाव नतीजे आने वाले हैं। इसलिए राशिद की जमानत की अवधि बढ़ाई गई है।
सवाल है कि 20 दिन पहले जब दो अक्टूबर तक ही जमानत दी गई थी तो अब ऐसा क्या हो गया कि उसे 10 दिन बढ़ाया गया? ऐसा लग रहा है कि चुनाव में अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाने के बाद राशिद की जरुरत नतीजों के बाद के जोड़तोड़ के लिए भी है। माना जा रहा है कि कश्मीर घाटी में चुनाव उलझा हुआ है। राशिद की आवामी इत्तेहाद पार्टी के कई उम्मीदवार और कुछ निर्दलीय भी अच्छे मुकाबले में हैं और चुनाव जीत सकते हैं। इससे जम्मू कश्मीर में त्रिशंकु विधानसभा की संभावना बन गई है। ऐसे में भाजपा को लग रहा है कि वह सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है और जोड़ तोड़ करके सरकार बना सकती है। चुनाव बाद की जोड़ तोड़ में राशिद की जरुरत हो सकती है। तभी आतंकवाद पर जीरो टालरेंस की बात करने वाली भाजपा राशिद की जमानत को लेकर चुप्पी साधे हुए है। अगर राशिद की जरुरत नहीं होती तो केंद्रीय एजेंसियां खासतौर पर एनआईए और ईडी उसकी जमानत रद्द कराने के लिए आकाश पाताल एक कर देते, जैसा उन्होंने कई मामलों में किया है।
बहरहाल, ऐसा नहीं है कि सिर्फ संदिग्ध आतंकवादी की भी जरुरत चुनाव में है। बलात्कारी और हत्यारे का भी चुनाव में इस्तेमाल होता है। यह बात डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत राम रहीम की परोल से भी साबित हुआ है। जिस दिन राशिद की जमानत 10 दिन बढ़ाई गई उससे एक दिन पहले राम रहीम को परोल पर रिहा किया गया। अब उनका काम अपने सेवादारों के जरिए भक्तों तक राजनीतिक मैसेज पहुंचाना है। माना जा रहा है कि हरियाणा की भाजपा सरकार ने इसी लिए चुनाव से चार दिन पहले उनको रिहा किया है। इसमें सरकार के साथ साथ चुनाव आयोग की भूमिका भी संदिग्ध है और अदालत पर भी सवाल हैं। ध्यान रहे राम रहीम को छह बार परोल देने वाले रोहतक की सुनरिया जेल के पूर्व अधीक्षक सुनील सांगवान हरियाणा की चरखी दादरी सीट से भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने जिस दिन अपने पद से इस्तीफा दिया उसके तीसरे ही दिन वे भाजपा में शामिल हुए और उनको टिकट भी मिल गई। बहुत जानकार इसको राम रहीम का ही जलवा मान रहे हैं। बहरहाल, इस बार के चुनाव ने यह साबित किया है कि आतंकवाद का आरोपी है या बलात्कार और हत्या का दोषी चुनाव में सबकी जरुरत पड़ सकती है और सबसे संस्कारी होने का दावा करने वाली पार्टी भी चुनाव के लिए इनका इस्तेमाल कर सकती है।