दिल्ली में अनुमान के उलट मुसलमानों ने मोटे तौर पर आम आदमी पार्टी का साथ दिया। ऐसा लग रहा है कि आखिरी समय में मुसलमानों ने तय किया कि कांग्रेस को वोट नहीं करना है और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को भी वोट नहीं करना है क्योंकि ये दोनों पार्टियां वोट काट रही हैं। इनको वोट देने का मतलब है भाजपा की मदद करना। तभी मतदान के ठीक पहले तक बन रही धारणा से उलट मुसलमान लगभग पूरी तरह से आप के साथ रहे। इसका नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम बहुल सीटों पर आप उम्मीदवार या तो जीते या दूसरे स्थान पर रहे, जबकि कांग्रेस और एमआईएम को बहुत कम वोट मिला।
मटियामहल में बड़ेमटियामहल में बड़े अंतर से आप के आले मोहम्मद इकबाल जीते और कांग्रेस के आसिम अहमद खान बड़ी मुश्किल 10 हजार वोट तक पहुंचे। अंतर से आप के आले मोहम्मद इकबाल जीते और कांग्रेस के आसिम अहमद खान बड़ी मुश्किल 10 हजार वोट तक पहुंचे। इसी तरह सीलमपुर में कांग्रेस के अब्दुल रहमान को बमुश्किल 10 हजार वोट आया, जबकि आप के जुबैर अहमद 30 हजार से ज्यादा वोट से जीते। ऐसे ही ओखला में वोट जरूर बंटा लेकिन अमानतुल्ला खान फिर जीते। कांग्रेस और एमआईएम के मुस्लिम उम्मीदवार वोट काट कर उनको हरा नहीं पाए। बल्लीमारान में कांग्रेस के हारून यूसुफ सिर्फ 13 हजार से कुछ ज्यादा वोट ले सके और आप के इमरान हुसैन बड़े अंतर से जीते। मुस्तफाबाद जरूर एक अपवाद रहा, जहां आम आदमी पार्टी को एमआईएम और कांग्रेस के बीच वोट बंटने का नुकसान हुआ। उस सीट पर एमआईएम और कांग्रेस को मिला कर 40 हजार से ज्यादा वोट आया, जबकि आप के आदिल अहमद खान 20 हजार से कम वोट से हारे। आप के नेता जंगपुरा का जिक्र कर सकते हैं, जहां कांग्रेस के फरहाद सूरी ने मनीष सिसोदिया की हार में बड़ी भूमिका निभाई।