यह बड़े आश्चर्य की बात है कि पिछले करीब 25 साल से राजनीति की जोड़ तोड़ में और पद हासिल करने की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में शामिल रहे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अचानक परमहंसों जैसी बातें करने लगे हैं। उन्होंने न्यूज एजेंसी पीटीआई को एक लंबा इंटरव्यू दिया है, जिसमें जब उनसे प्रधानमंत्री पद के लिए उनके नाम की चर्चा को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘मैं एक योगी हूं, राजनीति मेरे लिए फुल टाइम काम नहीं है’।
जब उनसे पूछा गया कि यह उनके लिए फुलटाइम जॉब नहीं है तो वे कब तक इसमें रहना चाहते हैं। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि अभी वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और इसमें रहने की भी सीमा है। इसी तरह केंद्रीय नेतृत्व के साथ टकराव के सवाल पर मुख्यमंत्री ने कहा कि वे केंद्रीय नेतृत्व की वजह से ही राज्य के मुख्यमंत्री बने हैं। उन्होंने आगे सवालिया लहजे में कहा, ‘क्या केंद्रीय नेतृत्व की मर्जी नहीं होती तो वे मुख्यमंत्री बने रह सकते थे’? ऐसा ही टिकट बांटने के सवाल पर कहा कि यह काम पार्टी के संसदीय बोर्ड का है।
दूसरा सवाल है कि मुख्यमंत्री का काम फुल टाइम जॉब नहीं है तो क्या फुल टाइम जॉब है? ध्यान रहे गोरखनाथ पीठ के महंत भी हैं। तो क्या वे कह रहे हैं कि गोरखनाथ पीठ के महंत का काम फुल टाइम जॉब है? फिर तो वे किसी भी काम के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं! तीसरी बात यह है कि अगर यह काम पसंद का नहीं और महंत या योगी का काम पसंद का है तो किसने जबरदस्ती इस काम में लगा रखा है?
मुख्यमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल का तीन साल पूरा करने के मौके पर दिया गया उनका यह इंटरव्यू असल में केंद्रीय नेतृत्व के सामने समर्पण की भाषा वाला है। सबको पता है कि वे कहीं भी पीछे नहीं हटने वाले हैं। मौका मिला तो तीसरी बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगाएंगे और प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा भी उनकी है। लेकिन क्या वे अब अलग तरह से अपनी पोजिशनिंग कर रहे हैं?
वे केंद्रीय नेतृत्व खास कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सर्वोच्चता को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करके हुए अपने को उनके बाद के दावेदारों की सूची में सबसे ऊपर लाने का प्रयास कर रहे हैं? क्या त्याग की भावना का प्रदर्शन करके और अपने को पहले योगी और फिर नेता बता कर वे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और कट्टर हिंदू भावना वाले मतदाताओं के बीच अपनी पोजिशनिंग कर रहे हैं। जो हो, योगी आदित्यनाथ का यह इंटरव्यू राजनीति में उनकी बहुत लंबी पारी की तैयारियों से जुड़ा हुआ है। भारत के नेताओं को समझने का यह पहला सूत्र वाक्य है कि वे जो कहें उसका उलटा समझना चाहिए।
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