लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा केंद्र सरकार में मंत्री बने तो इस बात की चर्चा शुरू हुई कि भाजपा का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन बनेगा। चर्चा इतनी तेजी थी कि लग रहा था कि नए अध्यक्ष की नियुक्ति बस हुई ही समझिए। फिर थोड़े दिन के बाद नए अध्यक्ष की चर्चा थम गई और कहा गया कि चार राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं, ऐसे में अध्यक्ष बदलना ठीक नहीं होगा। तब इस बात की चर्चा शुरू हुई कि पार्टी के महासचिवों में से किसी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाएगा। इसके लिए सुनील बंसल और विनोद तावड़े के नाम की जोर शोर से चर्चा चलने लगी। मीडिया में यह बात भी खूब फैलाई गई कि भाजपा में एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत चलता है इसलिए नड्डा अगर अभी तुरंत नहीं हटते हैं तब भी कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया जाएगा और बाद में वही पार्टी का अध्यक्ष बन जाएगा। संगठन महासचिव बीएल संतोष के नेतृत्व में तदर्थ व्यवस्था बनाने की भी चर्चा हुई।
यह सारी चर्चा 30 जून तक चलती रही। लेकिन 30 जून को नड्डा का विस्तारित कार्यकाल समाप्त हुआ और उसके साथ ही चर्चा भी बंद हो गई। अब किसी को अंदाजा नहीं है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की क्या स्थिति है। नड्डा को आधिकारिक रूप से कोई सेवा विस्तार नहीं दिया गया है और न कोई कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। सो, कायदे से नड्डा का विस्तारित कार्यकाल भी खत्म हो गया है। कम से कम आधिकारिक रूप से भाजपा की ओर से नहीं बताया गया है कि संसदीय बोर्ड ने उनका कार्यकाल फिर बढ़ाया है या नहीं। तो क्या अब कोई भी भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं है? ऐसा नहीं है। नड्डा राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर काम कर रहे हैं और उन्होंने अभी 23 राज्यों में प्रभारियों और सह प्रभारियों की घोषणा की। सोचें, उनका कार्यकाल और विस्तारित कार्यकाल भी खत्म हो गया है और किसी नए अध्यक्ष की नियुक्ति होनी है लेकिन उससे पहले नड्डा ने प्रभारियों की घोषणा की!
सवाल है कि इसका क्या मतलब निकाला जाए? अगर यह तय है कि चार राज्यों के विधानसभा चुनावों तक जेपी नड्डा ही अध्यक्ष रहने वाले हैं तो इसकी आधिकारिक घोषणा क्यों नहीं की जा रही है? अगर उनके कार्यकाल का और विस्तार किया जा रहा है तो उनके साथ कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त करने की घोषणा क्यों नहीं हो रही है? क्या राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की ओर से कोई शर्त रखी जा रही है या संभावित नामों पर सहमति नहीं बन पा रही है? लोकसभा चुनाव में भाजपा के बहुमत से पीछे रह जाने के बाद से आरएसएस ने जैसे तेवर दिखाए उससे माना जा रहा है कि संघ अपनी पसंद के व्यक्ति को भाजपा अध्यक्ष बनाना चाह रहा है। संघ की पसंद जो नेता बताए जा रहे थे उनमें से सभी केंद्र सरकार में मंत्री बन गए हैं। तभी घूम फिर कर सुनील बंसल, विनोद तावड़े और देवेंद्र फड़नवीस के नाम लिए जा रहे हैं। महासचिवों में से एक नाम अरुण सिंह का भी है, जिनकी चर्चा हो रही है। यह देखना दिलचस्प है कि पार्टी आधिकारिक रूप से नड्डा को सेवा विस्तार देती है या उसके बगैर ही वे अध्यक्ष बने रहते हैं और उनके साथ किसी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाता है या नहीं?