Bangladesh India relations: ‘दि इकोनोमिस्ट’ ने बांग्लादेश को ‘कंट्री ऑफ़ द इयर 2024’ चुना है। यह एकदम सही चुनाव है।
पिछले साल बांग्लादेशियों की ‘जनरेशन जेड’ द्वारा शुरू की गई बगावत से शेख हसीना का सख्त राज ख़त्म हुआ था।
पिछले ही साल एक अन्य देश, सीरिया भी एक तानाशाह के चंगुल से बाहर निकला। मगर अभी उसका भविष्य अनिश्चिततापूर्ण है। लेकिन बांग्लादेश का भविष्य अनिश्चितता के भंवर में नहीं फंसा।
अर्थशास्त्री मोहम्मद युनुस के नेतृत्व में छात्रों, सेना, व्यापरियों और नागरिक समाज से समर्थन से एक अस्थायी सरकार बनाई गई जो बहुत जल्दी देश में कानून-व्यवस्था बहाल करने और अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने में कामयाब रही।
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बांग्लादेश में 2024 में जो कुछ हुआ, वह किसी ने नहीं सोचा था। दुनिया की नजरों में और उसकी समझ में हसीना एक शानदार नेता थीं। उन्हें एशिया की आयरन लेडी कहा जाता था।
उनकी तारीफों के पुल बांधे जाते थे। बांग्लादेश को “भूख और गरीबी से मुक्त विकसित राष्ट्र” बनाने का उनका नारा सबको प्रभावित करता था। उन्होंने देश के इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाया और अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाईयां दीं।
लेकिन इस सबके बीच किसी को भी इस बात का एहसास नहीं हुआ कि हसीना का विकास ऐसा था जिसमें बांग्लादेश तो तरक्की कर रहा था, लेकिन बांग्लादेशी नहीं। धीरे-धीरे देश पर उनका पूर्ण नियंत्रण कायम होता गया। वे दमनकारी बन गईं।
उन्होंने विरोधियों को जेलों में डाल दिया। मीडिया पर रोकें लगा दीं और सेना और पुलिस से विरोध प्रदर्शनों पर गोलीबारी करने को कहा। चुनावों में धांधलियों के जरिए सत्ता पर उनका कब्जा कायम रहा और भ्रष्टाचार भयावह स्तर तक पहुंच गया।
लेकिन दुनिया तब भी यही मानती रही कि बांग्लादेश तेजी से तरक्की कर रहा है। अब जब कि वे देश छोड़कर भारत में शरण लेने को मजबूर हो गईं हैं, उनके विकास की पोल खुल गई है। पर्दा उठ गया है और हकीकत सबके सामने है।
जीडीपी के आंकड़ों में हेराफेरी
पिछले साल दिसंबर में आई एक रपट में दावा किया गया कि बांग्लादेश के विकास के दावे बढ़ाचढ़ाकर पेश किए जा रहे थे और जीडीपी के आंकड़ों में हेराफेरी की जा रही थी।
करीब 385 पेजों की यह रपट, अंतरिम सरकार (जिसका नेतृत्व माईक्रोक्रेडिट के चमत्कारिक नतीजों से दुनिया को परिचित करवाने वाले मोहम्मद युनुस के हाथों में है) द्वारा नियुक्त विशेषज्ञों के एक दल द्वारा तैयार की गई है। इस दल को बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के सभी पहलुओं की पड़ताल करने का काम सौंपा गया था।
विश्वनीय आंकड़ों उपलब्ध न होने पर किसी देश की आर्थिक गतिविधियों के आकलन के लिए विश्व बैंक ने एक नया फार्मूला निकाला है।
और वह है उपग्रहों के जरिये यह पता लगाना कि उस देश में रात में कितना प्रकाश रहता है। उस फार्मूले के आधार पर इस दल ने विकास के नए अनुमान की गणना की।
उसने पाया कि 2018-19 में विकास की दर वास्तव में 3 प्रतिशत के आसपास रही होगी जबकि आधिकारिक आंकड़ों में इसके लगभग 7 प्रतिशत होने का दावा किया गया था।
रपट में राजनीतिज्ञों पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने जीडीपी के अनुमानों में हेराफेरी की ताकि घरेलू और वैश्विक स्तर पर प्रोपेगेंडा किया जा सके।
ढाका से आई एक अन्य रपट में हसीना के राज में चुनाव आयोग द्वारा किए गए घपलों पर प्रकाश डाला गया है।
न केवल 2014, 2018 और 2024 के विवादास्पद चुनावों, बल्कि उनके पहले के सभी राष्ट्रीय चुनावों में अनियमितताएं की गईं, जिससे शेख हसीना सत्ता पर काबिज रह सकीं। इस अवधि में करीब 18 करोड़ लोगों को वोट नहीं देने दिया गया।
शेख हसीना की बांग्लादेश वापिसी
इस सबका क्या मतलब है? पहला, शेख हसीना की बांग्लादेश वापिसी नामुमकिन है। दूसरा, भारत पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी है।
भारत पर नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मोहम्मद युनुस के नेतृत्व वाली कार्यवाहक सरकार को कमजोर करने का प्रयास करने का आरोप लगाया जा रहा है।
नयी सरकार का भारत के प्रति रवैया अपेक्षाकृत कम अनुकूल है और वह भारत के साथ रिश्तों पर ‘नए सिरे से विचार’ करने की बात कह रही है
इसलिए भारत के लिए यह ज़रूरी है कि वह बड़े भाई की भूमिका निभाए, मोहम्मद युनुस की सहायता करे और बांग्लादेश में हिंदुओं की प्रताड़ना के आरोपों से जो कूटनीतिक समस्याएं उभरी हैं, उन्हें सुलझाने का प्रयास करे।
क्योंकि भारत को अपनी सुरक्षा की खातिर बांग्लादेश की दोस्ती की जरूरत है। भारत अपने एक ओर पड़ोसी के चीन की गोद में बैठ जाने का जोखिम नहीं उठा सकता।
चीन बांग्लादेश से अपने आर्थिक और सैन्य रिश्तों और बीएनपी और सामान्य नागरिकों में भारत के प्रति आशंका और विद्वेष के भाव का फायदा उठाने की फिराक में है।
उसने बांग्लादेश को 5 अरब अमरीकी डालर का अतिरिक्त अनुदान और कर्ज देने का वायदा किया है।
बांग्लादेश में शांति
आज की स्थिति में बांग्लादेश में शांति है। नफरत के सैलाब के बाद हालात बेहतर होने की उम्मीदें बंध रही हैं। लेकिन यदि वहां एक नया संकट उत्पन्न होता है तो बहुत चिंताजनक हालात बन सकते हैं।
नया साल बांग्लादेश के लिए अच्छा साबित हो सकता है यदि वह देश के अन्दर और उसके बाहर भी रिश्ते बेहतर बन सके। जहां तक भारत का सवाल है, उसे अर्थव्यवस्था के झूठे आंकड़ों, चुनाव आयोग के कठपुतली बन जाने जैसे मसलों पर सोचना चाहिए।
उसे बांग्लादेश के लिए सिरदर्द नहीं बनना चाहिए। इस मामले में बांग्लादेश और सारी दुनिया को भारत से बहुत सी अपेक्षाएं और उम्मीदें हैं। (कॉपी: अमरीश हरदेनिया)