इस वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संघ प्रमुख मोहन भागवत दोनों 75 वर्ष के होंगे। मेरा मानना है आरएसएस के सौ साल पूरे होने के कार्यक्रम के बाद 75 वर्ष की उम्र के हवाले भागवत रिटायर होंगे। पर 75 वर्ष की उम्र के कायदे में नरेंद्र मोदी क्या अपने किसी सहयोगी को सत्ता संभला कर रिटायर होंगे? नामुमकिन है। इसलिए पार्टी, मुख्यमंत्रियों और संगठन (अध्यक्ष मोदी के मनमाफिक ही होगा) के साथ ही संघ में नंबर दो दत्तात्रेय होसबले (उम्र 70 वर्ष) यदि संघ के प्रमुख बनें या कोई और भी बना तो वह प्रधानमंत्री के साये के नीचे ही रहेगा। इसलिए इस वर्ष के आखिर तक संघ परिवार और भाजपा के भविष्य की दिशा तय हो जानी है।
सवाल है नरेंद्र मोदी को उत्तर भारत की वोट राजनीति में सबसे ज्यादा किसकी जरूरत है? घूम फिर कर वापिस योगी आदित्यनाथ का चेहरा उभरता है। ऐसी स्थिति बन गई है कि 74 वर्ष के नरेंद्र मोदी और 52 वर्ष के योगी आदित्यनाथ की जोड़ी में ही आगे हिंदू राजनीति है। मैं इसे मामूली बात नहीं मानता जो प्रधानमंत्री मोदी ने महाकुंभ की ब्रांडिंग में योगी आदित्यनाथ का अखिल भारतीय जलवा बनने दिया।
सोचें, पूरे देश में पिछले छह महीनों में क्या हुआ है? घर-घर योगी आदित्यनाथ का चेहरा पहुंचा है।
सो, योगी से अब कैसे पार पाया जा सकता है? योगी के चेहरे पर ही उत्तर प्रदेश का अगला चुनाव लड़ा जाना है और तीसरी बार यदि योगी की कमान में भाजपा ने चुनाव जीता तो इससे प्रदेश, देश, भाजपा-संघ की आगे क्या दिशा बनेगी, इसकी कल्पना कर सकते हैं!
सो भाजपा-संघ अब वह नहीं है जो 2014 से पहले थी। चाल, चेहरे, चरित्र और बुनियाद सब बदल गई है। उसकी प्राण वायु हिंदू भावना है। इसी की बेफिक्री या अहंकार में वही होगा जो हिंदू राजनीति और हिंदुस्तान का अतीत है।
मजेदार बात है जो विपक्ष में नरेंद्र मोदी की उम्र के आगे लगभग सभी चेहरे युवा हैं। उनसे चुनौती ही नहीं बननी है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की उम्र इतनी कम (54 और 53 वर्ष) है कि उनके आगे अंततः योगी आदित्यनाथ होंगे। इनके साथ अखिलेश यादव (51 वर्ष) तेजस्वी यादव (35 वर्ष), हेमंत सोरेन (49 वर्ष), आदित्य ठाकरे (34 वर्ष), अरविंद केजरीवाल (56 वर्ष) अभिषेक बनर्जी (37 वर्ष), ओवैसी (55 वर्ष), चंद्रशेखर आजाद रावण (39 वर्ष) या स्टालिन, केसीआर, चंद्रबाबू के बेटों की उम्र की कसौटी में हिंदू राजनीति का यदि भविष्य देखें तो आसान नजर आएगा लेकिन देश का भविष्य पानीपत का मैदान बनता हुआ होगा। न विचार और विचारधारा और झगड़ा सिर्फ सत्ता व धर्म की पताकाओं का। संभव ही नहीं आपसी सद्भाव तथा लोकतांत्रिक मूल्यों में आचरण वाली राजनीति हो।
दिशा स्पष्ट है। भाजपा-संघ परिवार का भंडारा और सत्संग व महाकुंभ सब आज चाहे जितने भव्य दिखें, जमीन पर जिस दिन बवंडर पैदा हुए सब भरभरा कर तहस-नहस हो जाना है। अगले दस वर्षों में सत्ता की जिद्द, उसके केंद्रीकरण की भूख और सांप्रदायिक-जातीय वैमनस्य तथा सियासी टकराव अनिवार्यतः बढ़ेगा।