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04-04-2025 Vol 19

सीधी लड़ाई में अन्य की भूमिका

अगले महीने, जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं उनमें हिंदी पट्टी के तीनों राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हमेशा आमने-सामने की लड़ाई होती है। दशकों से चुनावी मुकाबला कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच होता है। इन तीनों राज्यों में कोई भी मजबूत प्रादेशिक पार्टी नहीं है और किसी राष्ट्रीय पार्टी की भी मजबूत मौजूदगी नहीं है। इसके बावजूद यह एक दिलचस्प तथ्य है कि इन तीनों राज्यों में अन्य एक बड़ा फैक्टर होते हैं। अन्य का मतलब है कि छोटी पार्टियां और निर्दलीय उम्मीदवार। वे चुनाव नतीजों पर बड़ा असर डालते हैं और चुनाव के बाद सरकार बनाने में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। कांग्रेस ने पिछले 20 साल में दो बार- 2008 और 2018 सरकार बनाई और दोनों बार अन्य के सहारे से ही उसकी सरकार बनी। इस बार भी अन्य का फैक्टर बड़ा काम करेगा।

अगर आंकड़ों की बात करें तो पिछले यानी 2018 के विधानसभा चुनाव में दो पार्टियों- कांग्रेस और भाजपा में सीधे मुकाबले के बावजूद छत्तीसगढ़ में इन दोनों पार्टियों को सिर्फ 76 फीसदी वोट मिले और 24 फीसदी वोट अन्य पार्टियों को गए। इसी तरह पिछले चुनाव में राजस्थान में भी भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला था इसके बावजूद इन दोनों को 78.90 फीसदी वोट मिले यानी 21 फीसदी वोट अन्य के खाते में गए। मध्य प्रदेश में स्थिति इससे थोड़ी बेहतर रही लेकिन वहां भी कांग्रेस और भाजपा को 81.90 फीसदी वोट मिले और करीब 18 फीसदी वोट अन्य को गए। इसका मतलब है कि भले कोई बड़ी तीसरी ताकत नहीं है लेकिन राज्य के आम लोग कांग्रेस और भाजपा से अलग हमेशा एक विकल्प तलाशते रहते हैं। तभी बसपा, सपा, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी या निर्दलियों के प्रतनिधि चुनती रहती है।

इस बार भी अन्य का फैक्टर चुनाव नतीजों को प्रभावित करेगा और चुनाव के बाद की राजनीति पर भी असर डालेगा। राजस्थान में पिछली बार मायावती की पार्टी बसपा के छह विधायक जीते थे, जो बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए थे। इस बार भी बसपा ने अनेक सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने भी राजस्थान में उम्मीदवार दिए हैं। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के नेता और सांसद हनुमान बेनिवाल ने ऐलान किया है कि वे आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के साथ तालमेल करके राज्य की सभी दो सौ सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। इसके अलावा कांग्रेस और भाजपा से टिकट लेने में नाकाम रहे अनेक मजबूत नेता निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे। इससे लगता है कि कई सीटों पर त्रिकोणात्मक या चारकोणीय चुनाव हो सकता है और थोड़े बहुत वोट के अंतर से हार-जीत का फैसला होगा।

मध्य प्रदेश में नजदीकी मुकाबला ज्यादा होता है। पिछले विधानसभा चुनाव में 84 सीटों पर जीत हार का फैसला 10 हजार से कम वोट के अंतर से हुआ था। इसमें से 44 सीटें भाजपा ने जीती थीं और 40 सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली थी। इस बार भी दोनों पार्टियों के बीच नजदीकी मुकाबला दिख रहा है। इस बार मध्य प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ने गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से तालमेल किया है। दोनों पार्टियां दलित और आदिवासी बहुल इलाकों में मजबूत उम्मीदवार उतार कर मुकाबले को तिकोना बनाने की कोशिश कर रही हैं। कांग्रेस से विवाद के बाद समाजवादी पार्टी ने भी 30 से ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए हैं। उत्तर प्रदेश से सटे कई इलाकों में सपा का ठीक ठाक असर है। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में शामिल जनता दल यू ने भी अपने उम्मीदवार उतारे हैं। इसके अलावा कांग्रेस व भाजपा से टिकट लेने में नाकाम रहे कई मजबूत नेता निर्दलीय भी लड़ेंगे। भाजपा से अलग हुए मैहर के विधायक नारायण त्रिपाठी ने अलग विंध्य पार्टी बनाने और 30 सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतार कर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। अगर बसपा व गोंडवाना गणतंत्र पार्टी कहीं कांग्रेस का नुकसान करती हैं तो नारायण त्रिपाठी की पार्टी भाजपा का वोट काट सकती है।

उधर छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत अजित जोगी की बनाई पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ भी कई सीटों पर मजबूती से लड़ती है और कुछ सीटों पर चुनाव जीतती भी है। इस बार भी अजित जोगी के परिवार के कई सदस्य चुनाव लड़ेंगे। मरवाही, अकलतरा आदि इलाकों में परिवार का अच्छा खासा असर है। सतनामी समुदाय के वोट को लेकर पार्टी राजनीति करती है। कांग्रेस की टिकट लेने में नाकाम रहे कई नेता जोगी की पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं। छत्तीसगढ़ में भी बसपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के बीच तालमेल हुआ है। सो, भले कोई बड़ी प्रादेशिक पार्टी नहीं हो लेकिन छोटी पार्टियां और निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव नतीजों पर असर डाल सकते हैं। चुनाव के बाद तीनों राज्यों में इनका असर भी देखने को मिलेगा। पिछले चुनाव के बाद कांग्रेस ने राजस्थान में बसपा और निर्दलीयों के सहारे सरकार बनाई थी तो मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस ने बसपा के दो और सपा के एक विधायक की मदद से सरकार बनाई थी।

हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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