डोनाल्ड ट्रंप ने चीन से ‘मुक्ति’ के लिए जो किया है क्या वह ‘राष्ट्रवादी’ व ‘आत्मनिर्भर भारत’ ‘मेक इन इंडिया’ के आए दिन जुमले बोलने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 में ही नहीं कर देना था? सोचें, डोनाल्ड ट्रंप का नारा यदि अमेरिका को ग्रेट बनाने का, अमेरिका में वापिस औद्योगिक फैक्टरियां बनवाने, लोगों को रोजगार दिलवाने का, मध्य वर्ग के लिए काम-धंधे के अवसरों को बढ़ाने का है तो क्या इस सबकी जरूरत भारत में नहीं है? यदि मोदी सरकार ने चाइनीज उत्पादनों के आयात पर पाबंदी (भारत में ही बनने वाली छोटी-छोटी चीजों पर) और बाकि चीजों पर 50-100 प्रतिशत कस्टम ड्यूटी लगाई होती तो भारत में वे कई उद्योग वापिस जिंदा हो चुके होते, जिनका स्वदेशी उत्पादन कभी भारत की एक कामयाबी थी।
सोचें, डोनाल्ड ट्रंप, उनके मंत्रियों, नौकरशाहों, व्यापारी सभी को विश्वास है कि हम वापिस स्वदेशी उत्पादन की फैक्टरियां बना सकते हैं। इसके लिए हमें विश्व व्यापार संगठन याकि वैश्विक करारों की चिंता नहीं करनी चाहिए, तो मोदी सरकार, उनके नौकरशाह, अडानी-अंबानी जैसे सेठ क्या ऐसी हिम्मत नहीं दिखा सकते हैं?
ध्यान रहे भारत साल-दर-साल चीन के आयातों से उस पर आश्रित और उनसे बंधता हुआ सबसे बड़ा देश है। चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा सर्वाधिक है। जैसे चीन ने वियतनाम, कंपूचिया, आसियान देशों में फैक्टरी खोल उनसे दुनिया को सामान बेच रहा है वैसी ही तिकड़म चीनी कंपनियों की भारत में भी है। चाइनीज कंपनियां ‘मेक इन इंडिया’ की रियायतों का फायदा उठा कर पुर्जों के किट भारत ला कर उन्हें असेंबल कर, उन पर ‘मेक इन इंडिया’ का ठप्पा लगा कर बेच रही हैं। स्मार्टफोन भारत में बन नहीं रहे हैं, बल्कि असेंबल हो रहे हैं जबकि नैरेटिव है कि हम स्मार्टफोन बनाने लगे हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं।
दरअसल, भारत की आर्थिकी में उद्यम, उद्योग, पुरुषार्थ तथा औद्योगिक पूंजी निवेश नहीं है, बल्कि सिर्फ विदेशी सामान खरीद मुनाफे के व्यापार, कमीशनखोरी, शेयर बाजार की प्रोफिट बुकिंग की धंधेबाजी की प्रवृत्ति है या फिर बीस-पचास क्रोनी पूंजीपतियों के एकाधिकारी उत्पादन (स्टील, सीमेंट, ऊर्जा) व सेवाओं (संचार, एयरलाइंस, आईटी) के बूते आर्थिकी चलती हुई है।
इस सबमें और खासकर आईटी कंपनियों को आगे मुश्किल है। अमेरिका ने भारत को बख्शा नहीं है। भारतीय सामान पर 27 प्रतिशत टैरिफ लगाया है। उससे भी अधिक उनका भारत की बदनामी में ‘टैरिफ किंग’ का जुमला है। यों मोदी सरकार ट्रंप प्रशासन की लल्लोचप्पो करते हुए है। लगता है अगस्त तक भारत और अमेरिका में व्यापार करार हो जाएगा। वाशिंगटन में ट्रंप-मोदी की मुलाकात में सन् 2030 तक दोनों देशों के व्यापार को 210 बिलियन डॉलर से पांतच सौ बिलियन डॉलर पहुंचाने की सहमति हुई थी। भारत अमेरिका से तेल, गैस, हथियार खरीदेगा तो कृषि और ई कामर्स में भी रियायत देने की तैयारी में है।
कोई हर्ज नहीं है। इसलिए क्योंकि ट्रंप प्रशासन से भारत की सुरक्षा, सामरिक स्थिति और भूराजनीतिक, आईटी क्षेत्र के अनेक फायदे हैं। ऐसे ही यूरोपीय संघ और ब्रिटेन का मामला है। यूरोपीय संघ और ब्रिटेन भी ट्रंप के टैरिफ युद्ध से घायल हैं। मगर चीन से पहले से ही हैं। इसलिए ब्रिटेन और यूरोपीय संघ से फ्री ट्रेड समझौते की भारत की सालों से जो कोशिश है वह अब साकार हो सकती है। कई मायनों में भारत के लिए अनुकूल स्थितियां हैं। दिक्कत एक ही है और वह अंबानी-अडानी की वह मर्केंटाईल याकि धंधे की टुच्ची व्यापारी मनोवृत्ति है, जिसमें चीन से सस्ता सामान खरीद भारत के लोगों को चुना लगाना व्यापारियों का परमो धर्म है।