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03-04-2025 Vol 19

छत्तीसगढ़ में बघेल को घेरने का दांव

जिस तरह से मध्य प्रदेश में भाजपा ने कांग्रेस के दिग्गज नेताओं और खास कर दिग्विजय सिंह के करीबियों को घेरने की रणनीति में टिकट दी है उसी तरह उसने छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को घेरने की रणनीति बनाई है। छत्तीसगढ़ की पाटन सीट पर भाजपा ने दुर्ग के अपने सांसद विजय बघेल को उम्मीदवार बनाया है। विजय बघेल राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के रिश्तेदार हैं और 2008 के विधानसभा चुनाव में उनको हरा चुके हैं। इसके बाद 2013 में भूपेश बघेल ने उनको हराया था। बाद में 2018 में भाजपा ने विजय बघेल को टिकट नहीं दी लेकिन 2019 में उनको दुर्ग से लोकसभा की टिकट दी, जहां से वे बड़े अंतर से जीते। दुर्ग लोकसभा के तहत आने वाली पाटन सीट पर उनको कांग्रेस उम्मीदवार के मुकाबले बढ़त मिली। इसे देखते हुए भाजपा ने उनको पाटन से उम्मीदवार बना दिया।

सोचें, जिस राज्य में कांग्रेस के नेता चुनाव जीता हुआ मान रहे हैं और सबसे ज्यादा भरोसे में हैं वहां मुख्यमंत्री को ही उनकी सीट पर घेरने का कैसा दांव भाजपा ने चला? पिछली बार भाजपा ने इस सीट पर साहू उम्मीदवार उतारा था लेकिन इस बार जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए बघेल के रिश्तेदार को ही उतार दिया, जो पहले उनको हरा चुके हैं और सांसद हैं। इससे भूपेश बघेल अपने क्षेत्र में घिरेंगे। उनको वहां ज्यादा समय देना होगा। ध्यान रहे राज्य में भूपेश बघेल कांग्रेस का चेहरा हैं। सब कुछ उनको ही संभालना है। कोई सेकेंड लाइन वहां नहीं है। टीएस सिंहदेव को उप मुख्यमंत्री बनाया गया है लेकिन उन पर न तो बघेल भरोसा कर रहे हैं और न कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता। वहां अकेले बघेल को चुनाव लड़ाना है और वे अपने क्षेत्र में घिरे रहेंगे। भाजपा यह माहौल बनाएगी वे हार रहे हैं। इसका असर उनके ऊपर जो होगा सो होगा लेकिन पूरे राज्य में कांग्रेस उम्मीदवारों के ऊपर इसका बड़ा मनोवैज्ञानिक असर होगा।

मध्य प्रदेश के मुकाबले छत्तीसगढ़ में भाजपा ने अलग रणनीति बनाई है। इसका कारण यह है कि मध्य प्रदेश में 2018 में भाजपा की हार बहुत मामूली थी। उसे कांग्रेस से ज्यादा वोट मिले थे। लेकिन छत्तीसगढ़ में वह बुरी तरह से हारी थी। उसका वोट आठ फीसदी से ज्यादा कम हुआ था। उसके व कांग्रेस के वोट में 10 फीसदी से ज्यादा का अंतर था। पिछले चुनाव में भाजपा को 33 फीसदी और कांग्रेस को 43 फीसदी वोट मिले थे। इसलिए मध्य प्रदेश में जहां भाजपा ने अपनी हारी हुई और कमजोर 39 सीटों पर सभी हारे हुए उम्मीदवारों को रिपीट कर दिया वही छत्तीसगढ़ में किसी भी हारे हुए उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया।

भाजपा ने छत्तीसगढ़ की 21 सीटों के लिए उम्मीदवार घोषित किए हैं। इन सीटों पर 2018 में जो उम्मीदवार हारे थे उनमें से किसी को पार्टी ने उम्मीदवार नहीं बनाया है। इसका कारण यह है कि 2018 में हारे हुए ज्यादातर उम्मीदवार ऐसे थे, जो उस सीट से कई बार से चुनाव जीत  रहे थे। सो, उनको छोड़ कर पार्टी ने इस बार नए उम्मीदवार उतारे। उसके घोषित 21 उम्मीदवारों में से 16 बिल्कुल नए चेहरे हैं और पांच महिलाएं हैं। भाजपा ने अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 10 और अनुसूचित जाति की एक सीट पर उम्मीदवार दिया है। जिन 10 सामान्य सीटों के उम्मीदवार घोषित हुए है उनमें से भी आठ सीटों पर अन्य पिछड़ी जाति का उम्मीदवार है और एक सामान्य सीट से आदिवासी उम्मीदवार पार्टी ने घोषित किया है। इस तरह 10 सामान्य सीटों में से सिर्फ एक सीट पर अगड़ी जाति का उम्मीदवार घोषित किया गया है। गौरतलब है कि भूपेश बघेल पिछड़ी जाति के नेता हैं इसलिए उनकी ओबीसी वोट को एकजुट करने की रणनीति को पंक्चर करने के लिए भाजपा ने यह दांव चला है।

भाजपा की ओबीसी राजनीति की एक खास बात यह है कि पार्टी ने जो आठ पिछड़ी जाति के उम्मीदवार दिए हैं उनमें से चार साहू जाति के हैं। ध्यान रहे साहू जाति का राज्य की राजनीति में अच्छा खासा असर है। पिछले चुनाव में इस बात की चर्चा थी कि कांग्रेस अपने वरिष्ठ नेता ताम्रध्वज साहू को मुख्यमंत्री बना सकती है। सो, साहू समाज कांग्रेस के साथ चला गया था। भाजपा उसे फिर से अपनी ओर लाने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी ने जिस एकमात्र अगड़ा नेता को टिकट दिया है वह विक्रांत सिंह हैं, जो पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के भतीजे हैं। उनको भाजपा ने खैरागढ़ से टिकट दिया है। ध्यान रहे पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह की टिकट काट दी थी। तब से माना जा रहा था कि रमन सिंह को किनारे कर दिया गया है। लेकिन उनके भतीजे को टिकट देकर भाजपा ने उनकी मुख्यधारा में वापसी करा दी है।

हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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