आवश्यक है कि विद्यालयों में गुणवत्ता सुधार के साथ-साथ परीक्षाओं में सफलता का मूल्यांकन केवल अंकों के आधार पर न किया जाए, बल्कि छात्रों की संपूर्ण योग्यता और कौशल को ध्यान में रखा जाए। जब शिक्षा का असली उद्देश्य ज्ञानार्जन बनेगा, तभी समाज का वास्तविक विकास संभव होगा।
देश में वार्षिक परीक्षाएँ छात्रों के भविष्य को निर्धारित करने का प्रमुख माध्यम हैं। लेकिन हाल के वर्षों में, शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान अर्जन से हटकर केवल उच्च अंक प्राप्त करने तक ही सीमित होता जा रहा है। खासकर देहाती क्षेत्रों के विद्यार्थी अब नियमित कक्षाओं में पढ़ने की बजाय कोचिंग सेंटरों पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं, क्योंकि वहाँ कम समय में अधिक अंक प्राप्त करने के आसान तरीके बताए जाते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल शिक्षा प्रणाली को प्रभावित कर रही है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों के समग्र विकास के लिए भी एक चुनौती बनती जा रही है।
देश के गाँवों के छात्रों में एक नई होड़ देखी जा रही है। देहाती छात्र काफ़ी मात्रा में विद्यालय से विमुख हो रहे हैं। इसके पीछे शिक्षा प्रणाली की कई खामियाँ ज़िम्मेदार मानी जा सकती हैं। इनमें अहम हैं ग्रामीण स्कूलों में शिक्षकों की कमी, कमजोर आधारभूत संरचना और अपर्याप्त शिक्षण सामग्री के कारण विद्यार्थी नियमित कक्षाओं में रुचि नहीं लेते। इसके अलावा कोचिंग संस्कृति का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि छात्रों को लगता है कि विद्यालय में पढ़ने की तुलना में कोचिंग सेंटरों में परीक्षा के लिए विशेष तरीके सिखाए जाते हैं। जिससे वे कम समय में अधिक अंक प्राप्त कर सकते हैं। यह धारणा दिन ब दिन बढ़ती जा रही है।
इतना ही नहीं गाँव के भोले भाले युवकों को लुभाने की मंशा से कई कोचिंग सेंटर यह दावा भी करते हैं कि वे छात्रों को परीक्षा में अधिक अंक दिलाने में मदद करेंगे। जिससे अभिभावक भी अपने बच्चों को विद्यालय भेजने की बजाय कोचिंग में दाखिला दिलाने के लिए प्रेरित होते हैं। ऐसे में यदि शिक्षक भी उदासीन रवैया अपनाना शूर कर दें तो वह आग में घी का काम करता है। ऐसा भी देखने में आया है कि ग्रामीण इलाक़ों के कई सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी या उनकी लापरवाही के कारण कक्षाओं का स्तर गिरता जा रहा है। ऐसे में छात्र कोचिंग का विकल्प चुनने को मजबूर हो जाते हैं।
आज से कई वर्ष पूर्व ‘थ्री इडिअट्स’ फ़िल्म में भी यह दिखाया गया था कि अधिक अंकों की होड़ का छात्रों पर काफ़ी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जबकि होना यह चाहिए कि अगर हर नौजवान को अपने दिल की आवाज सुनकर अपनी जिंदगी की राह तय करनी चाहिए। यदि वो अइस करता है तो वह खुश भी होता है और सही मायने में सफल भी। केवल ज्यादा पैसे कमाने के लिए बिना समझे रट्टा मारने वाले कोल्हू के बैल ही होते हैं। जिनकी जिंदगी में रस नहीं आ पाता। यही कारण है कि आईआईटी जैसी प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़कर सैकड़ों नौजवान आज देश में ऐसे काम कर रहे हैं जिसका उनकी डिग्री से कोई लेना देना नहीं है।
मसलन झुग्गियों में बच्चों को पढ़ाना, आध्यात्मिक आन्दोलनों में भगवत्गीता का प्रचारक बनना या गांव के नौजवानों के लिए छाटे-छोटे कुटीर उद्योग स्थापित करने में मदद करना। दूसरी तरफ इंजीनियरिंग की डिग्री की भूख इस कदर बढ़ गयी है कि एक-एक शहर में दर्जनों प्राईवेट इंजीनियरिंग कॉलेज खुलते जा रहे हैं। जिनमें दाखिले का आधार योग्यता नहीं मोटी रकम होता है। इन कॉलेजों में योग्य शिक्षकों और संसाधनों की भारी कमी रहती है। फिर भी यह छात्रों से भारी रकम फीस में लेते हैं।
बेचारे छात्र अधिकतर ऐसे परिवारों से होते हैं जिनके लिए यह फीस देना जिंदगी भर की कमाई को दाव पर लगा देना होता है। इतना रूपया खर्च करके भी जो डिग्री मिलती है उसकी बाजार में कीमत कुछ भी नहीं होती। तब उस युवा को पता चलता है कि इतना रूपया लगाकर भी उसने दी गयी फीस के ब्याज के बराबर भी पैसे की नौकरी नहीं पाई। तब उनमें हताशा आती है। आज हालत यह है कि यों की दुकानों पर सेल्समैन का काम कर रहे हैं। समय और पैसे का इससे बड़ा दुरूपयोग और क्या हो सकता है?
इसलिए समझ की बजाय रटने की प्रवृत्ति को समाप्त करने में ही समझदारी है। लेकिन देखा यह गया है कि कुछ कोचिंग संस्थान परीक्षा पास कराने के लिए रटने पर जोर देते हैं। जिससे छात्रों की तार्किक और विश्लेषणात्मक क्षमता विकसित नहीं हो पाती। ऊपर से कोचिंग सेंटरों की बढ़ती फीस ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए एक अतिरिक्त बोझ बन रही है। सोचने वाली बात यह है कि जब छात्र स्कूल की पढ़ाई को महत्व नहीं देते, तो विद्यालयों की गुणवत्ता और भी गिरती जाती है। इससे शिक्षा प्रणाली कमजोर होती है। वहीं परीक्षा में अच्छे अंक पाने के दबाव में कई छात्र नकल और अन्य अनुचित तरीकों का सहारा भी लेने लगते हैं।
ऐसे में विद्यालयों की शिक्षा और गुणवत्ता में सुधार की बहुत ज़रूरत है। सभी ग्रामीण स्कूलों में शिक्षकों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए और विद्यालयों में शिक्षण सामग्री व संसाधनों को बेहतर किया जाना चाहिए। यदि सरकार विद्यालयों में परीक्षा की अच्छी तैयारी के लिए विशेष कक्षाएँ संचालित करेगी तो विद्यार्थियों को कोचिंग सेंटर जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। परीक्षाओं को केवल अंकों के आधार पर तय करने की बजाय, प्रायोगिक ज्ञान, परियोजना कार्य और गतिविधि-आधारित मूल्यांकन को बढ़ावा देना चाहिए। शिक्षकों को इस बात पर विशेष ज़ोर देना चाहिए कि उन्हें विद्यार्थियों को अंकों की होड़ में धकेलने की बजाय, उन्हें वास्तविक ज्ञान अर्जित करने और रचनात्मकता विकसित करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
देहाती क्षेत्रों के विद्यार्थियों का विद्यालयों से विमुख होकर कोचिंग संस्थानों की ओर बढ़ना शिक्षा व्यवस्था की एक गंभीर समस्या को दर्शाता है। यदि शिक्षा प्रणाली को अधिक प्रभावी और समावेशी नहीं बनाया गया, तो यह प्रवृत्ति शिक्षा के व्यवसायीकरण को और अधिक बढ़ावा देगी। आवश्यक है कि विद्यालयों में गुणवत्ता सुधार के साथ-साथ परीक्षाओं में सफलता का मूल्यांकन केवल अंकों के आधार पर न किया जाए, बल्कि छात्रों की संपूर्ण योग्यता और कौशल को ध्यान में रखा जाए। जब शिक्षा का असली उद्देश्य ज्ञानार्जन बनेगा, तभी समाज का वास्तविक विकास संभव होगा।