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05-04-2025 Vol 19

थरुर की कोई विश्वसनीयता नहीं!

भला जाने वाले को कोई रोक सकता है? और दूसरी बात जो कही जा रहा है वह किसी विचारधारा से पार्टी से नहीं बंधा था। उसका कोई सिद्धांत नहीं था। वह या तो जैसा राहुल ने कहा अपना महल बचाओ, जान बचाओ के लिए जा रहा है या वहां उसे कुछ मिलने की उम्मीद है। जैसे गुलामनबी आजाद गए।… फिर भाजपा के लोग भी समझ गए कि यह आदमी जिसे हंड्रेड परसेन्ट नेहरू गांधी परिवार ने बनाया है वह उनकी थाली में ही छेद कर सकता है तो फिर हमारा क्या होगा। और अब दो तीन साल में ही गुलाम नबी आजाद अतीत की चीज हो गए है।

लगता है सोशल मीडिया पर कांग्रेस के समर्थक उतने पोलिटिकल करेक्ट नहीं हैं जितने भाजपा के समर्थक।  भाजपा में जो पढ़े लिखे लोग थे, जिन्हें कांग्रेस नेता जयपाल रेड्डी ने ढाई बुद्धिजीवी कहा था मगर उनका नाम नहीं लिया। मगर जब नरेंद्र मोदी के आने के बाद जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी को अलग थलग किया गया तो भाजपा के समर्थकों ने कोई हाय हाय नहीं की।

हालांकि अभी कांग्रेस ने शशि थरूर के बारे में आफिशियली कुछ नहीं कहा है। उल्टे केरल के कांग्रेस एमपी उनसे मिलकर बात कर रहे हैं। और शुक्रवार को दिल्ली में केरल के सांसदों ने एक मीटिंग रखी है। जिसमें फिलहाल आने के लिए शशि थरूर मान गए हैं। मगर थरूर पर कोई बात करते ही सोशल मीडिया के खुद को कांग्रेसी समर्थक कहने वाले चिल्लाने लगते हैं कि वह तो सबसे लोकप्रिय नेता हैं। उनके बहुत फालोअर हैं। उन्हें रोको।

भला जाने वाले को कोई रोक सकता है? और दूसरी बात जो कही जा रहा है वह किसी विचारधारा से पार्टी से नहीं बंधा था। उसका कोई सिद्धांत नहीं था। वह या तो जैसा राहुल ने कहा अपना महल बचाओ, जान बचाओ के लिए जा रहा है या वहां उसे कुछ मिलने की उम्मीद है। जैसे गुलामनबी आजाद गए। और जाते ही जैसे राहुल तो छोड़िए सोनिया गांधी तक पर घटिया हमले करने लगे तो भाजपा के लोग भी समझ गए कि यह आदमी जिसे हंड्रेड परसेन्ट नेहरू गांधी परिवार ने बनाया है वह उनकी थाली में ही छेद कर सकता है तो फिर हमारा क्या होगा।

और अब दो तीन साल में ही गुलाम नबी आजाद अतीत की चीज हो गए है।

खैर बात हो रही थी थरूर की जिन्हें भी राजनीति में पूरी तरह कांग्रेस ने स्थापित किया वे सोशल मीडिया से लेकर गोदी मीडिया जो उनका हमेशा साथ देता है और उनका ही क्या जो भी कांग्रेस से थोड़ी सी भी असहमति जाहिर करता है उसे कांग्रेस का सबसे बड़ा नेता बताने लगता है तक इस बात को लेकर भारी चर्चा में हैं कि वे पार्टी से असंतुष्ट हैं। लेकिन वे एक शब्द भी नहीं बोल रहे हैं कि यह गलत है।

बल्कि बीजेपी नेताओं के साथ अपनी सेल्फी पोस्ट करके उसे और हवा दे रहे हैं। और दूसरी तरफ जितना गोदी मीडिया उन्हें लोकप्रिय बता रहा है उतना ही सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थकों के साथ कांग्रेस के भी सोशल मीडिया सक्रिय लोग।

गलती उनकी नहीं है। हीरो वरशिप ( नायक पूजा) के वे भी शिकार हैं। और इसमें नकली और असली हीरो में वे कभी कभी फर्क नहीं कर पाते। भाजपा के लोग ऐसी गलती नहीं करते। जब मोदी आ गए तो मोदी ही नायक हैं। वे आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सब को भूल गए। और जो थरूर के मुकाबले में उपर तीन

नाम लिए यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह और अरुण शौरी को भी। थरूर के मुकाबले इस लिए लिखा कि गोदी मीडिया के साथ कांग्रेस के कुछ समर्थक उन्हें विद्वान भी बता रहे हैं।

विद्वान पर एक बात। थरूर जब संयुक्त राष्ट्र में थे तब वे वहां भी ऐसे ही दिखावा (शो मेनशिप) (दिखावा) करते थे। डिप्लोमेसी (कूटनीति ) में यह सब चलता नहीं है। और उसका पता तब चल गया जब वे संयुक्त राष्ट्र में महासचिव पद का चुनाव लड़े और हारे। उसके बाद कांग्रेस ने उन्हें 2009 में तिरुअनंतपुरम केरल से टिकट दिया जिताया और मंत्री बनाया। अब बता रहे हैं हम विद्वान की बात। डिक्शनरी में से नए शब्द खोज निकलाने वाला विद्वान नहीं होता।

विद्वान होता है विद्या का आम जनता के लिए उपयोग करने वाला। तो जिन्हें विद्वान कहा जा रहा है उन्होंने मंत्री बनकर कहा कि हवाई जहाज की सामान्य श्रेणी कैटल क्लास ( ढोरों का बाड़ा) होती है। अगर यह विद्वता है तो ठीक है। कैटल क्लास उन दिनों नया शब्द बनकर खुब चला। मगर उस पार्टी के खिलाफ जिसने थरूर को मंत्री बनाया।

दूसरा इसी तरह का पार्टी के खिलाफ शब्द कठपुतली। ढाई साल पहले अभी जब कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़े। तो मीडिया ने इस शब्द का खरगे के खिलाफ खूब इस्तेमाल किया। दो ही लोग चुनाव लड़ रहे थे। मैं कठपुतली नहीं मतलब खरगे हैं! चुनाव में खूब आरोप लगाए। लेवल प्लेइंग फील्ड, जो आरोप राहुल भाजपा सरकार पर लगाते हैं कि चुनावों के लिए वह विपक्षी दलों को समान मैदान (लेवल प्लेइंग फील्ड)  उपलब्ध नहीं होने देती है। उसे खुद कांग्रेस पर लगाकर थरूर ने इस आरोप की वैधता को कमजोर करने की कोशिश की।

और जो बात कह रहे हैं कि कांग्रेस समर्थक पोलिटिकली करेक्ट नहीं दिख रहे तो पार्टी के लोग भी उसी प्रवाह में बह रहे हैं। थरूर को कोई कम वोट नहीं मिले एक हजार से ऊपर। जीतने वाले खरगे को 7897 वोट। लेकिन कठपुतली अध्यक्ष बताने के बावजूद उन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने फिर टिकट दिया। इस बार पिछले तीन चुनावों के मुकाबले सबसे कम वोटों करीब 18 हजार से जीते मगर पार्टी ने जिताया।

अब यहां एक बात और साफ करना जरूरी है। थरूर की लोकप्रियता की जो लोग बात करते हैं वह बताएं कि क्या वे ई श्रीधरन जो मेट्रो मेन कहलाते हैं उनसे ज्यादा लोकप्रिय हैं? श्रीधरन केरल में विधानसभा का चुनाव हार गए।

दरअसल केरल की राजनीति उत्तर भारत से बिल्कुल अलग है। वहां पार्टी प्रमुख होती है। व्यक्ति नहीं। बीजेपी का वहां अस्तित्व नहीं है इसलिए उससे चुनाव लड़कर श्रीधरन हार गए। अगर वे कांग्रेस या लेफ्ट से लड़ते तो उनके मतदाताओं के आधार पर वे जीत जाते। यह बताना इसलिए जरूरी है कि लोग बार बार कह रहे हैं कि थरूर तिरुअनंतपुरम से चार बार जीते। इसे ऐसे समझना चाहिए कि वहां से कांग्रेस चार बार जीती।

थरूर अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। कांग्रेस जिसने प्रधानमंत्री मोदी की हाल की अमेरिकी यात्रा जिसके बाद भी वहां से भारतीय हथकड़ी बेड़ी में आए की आलोचना कर रही है। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी मोदी पर सवाल उठाए जा रहे हैं। क्योंकि उसके बाद प्रेसिडेन्ट ट्रंप ने बहुत गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि मिलियन डालर (करोड़ों रुपया) माय डियर फ्रेंड मोदी को दिए गए। वे कहां हैं उसका क्या उपयोग दुरुपयोग हुआ मोदी कुछ नहीं बोल रहे। न अपने दोस्त ट्रंप के दावों का खंडन कर रहे हैं।

ऐसे में थरूर मोदी की अमेरिकी यात्रा को सफल बताकर क्या मैसेज दे रहे हैं। मैसेज साफ है। कांग्रेस के लोग न पढ़ पाएं अलग बात है। गोदी मीडिया पढ़ रहा है इसलिए उनकी तारीफ के पूल बांधे हुए है। बाल मोदीजी के पाले में है। बहुत सारे लोग लाइन में लगे हैं। मोदीजी को जिनकी उपयोगिता दिखती है लेते हैं। बाकी को वहीं (कांग्रेस में) काम करने के लिए छोड़ देते हैं। अंदर रहकर कांग्रेस को ज्यादा नुकसान पहुंचाते है। अभी हरियाणा चुनाव हरवा दिया। इससे पहले राजस्थान। यह दो राज्य बीजेपी ने नहीं जीते कांग्रेस के अंदर के लोगों ने हरवाए।

राहुल कहते हैं चले जाओ। मगर जाएगा कोई नहीं। जो लोग पार्टी का नुकसान कर रहे हैं उन्हें निकलाने की हिम्मत राहुल और खरगे को दिखानी होगी। कह रहे हैं 2025 संगठन का साल है। अगर संगठन का साल है तो संगठन मजबूत और वफादार लोगों का बनाना होगा। तभी संगठन का मतलब है। नहीं तो ढीला-पोला तो चलता रहेगा।

शकील अख़्तर

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स के पूर्व राजनीतिक संपादक और ब्यूरो चीफ। कोई 45 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव। सन् 1990 से 2000 के कश्मीर के मुश्किल भरे दस वर्षों में कश्मीर के रहते हुए घाटी को कवर किया।

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