भोपाल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चित्रकूट में मफ़तलाल के मंदिर में हुए समारोह में भाग लिया, उनकी कुछ घंटों की यात्रा का खर्च सिर्फ 90 से 97 लाख का खर्च जिला प्रशासन को आया है! वैसे अयोध्या के राम मंदिर का निर्माण संभव हुआ सुप्रीम कोर्ट के फैसले से, पर निर्माण का खर्च भारत सरकार दे रही है। पर निर्माण कार्य में विश्व हिन्दू परिषद का ही बोलबाला है ! वैसे इसकी सदारत एक आईएएस अफसर नृपेन्द्र मिश्रा कर रहे है, जिन्हें अपनी सेवा मे लाने के लिए मोदी जी ने नियुक्ति के नियमो को ही बदल डाला था ! तो यह है अयोध्या में मंदिर के निर्माण की तथा – कथा !
देश के प्रमुख तीर्थ स्थानों में औद्योगिक घराने बिरला समूह के राधा कृष्ण के मंदिर है – परंतु इन मंदिरों को उनके देवता के नाम से नहीं वरन निर्माण करता के नाम से ही जाना जाता है। कानपुर में भी ऐसा ही एक मंदिर है जो अभी भी बन ही रहा है –
उसका भी परिचय उद्योग समूह जेके के नाम से जाना जाता है.! राधा कृष्ण ही इस मंदिर के मुख्य देवता है.! देश के मशहूर मंदिर तिरुपति में देवता बालाजी है परंतु कहलाते वे भी है तिरुपति के बाला जी.! हालांकि अब तो तिरुपति मंदिर प्रबंध स्थानम ने देश के दस से अधिक स्थानों पर बालाजी के मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण कार्य कर लिया है, और इन सभी स्थानों को तिरुपति के बालाजी के ही नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की श्रंखला की ही भांति अहमदाबाद के प्रसिद्ध स्वामी नारायण मंदिर की भी शाखायें भी देश – विदेश तक में है। अभी अमेरिका में बहुत भव्य मंदिर का समारोहपूर्वक उद्घाटन हुआ है, कहते हैं इसके निर्माण में करोड़ों रुपये नहीं वरन डालर खर्च हुए हंै।
इनके मंदिरों की विशेषता यह है कि इनके मुख्य देवता इस पंथ के प्रवर्तक हैं। बताते है कि इनके प्रवर्तक उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के एक स्थान छपिया से घनश्याम पांडे लगभग सौ वर्ष पूर्व गुजरात चले गए थे। एवं वहां उन्होंने अपने पंथ की स्थापना की। जिसे आज स्वामी नारायण के नाम से जाना जाता है। इनकी भी गुजरात में अनेक शाखायें हैं, जिनके प्रबंध में अहमदाबाद मुख्यालय का नियंत्रण रहता है। हाल ही में सूरत में इनके मंदिर के पुजारी को एक अपराध के सिलसिले में बंदी बनाया गया था। जिसे बाद में अहमदाबाद मुख्यालय एनआर निकाल दिया था। वैसे दुबई में भी इनके मंदिर को वहां के शासन से भूमि प्रदान की थी, जिस पर भव्य मंदिर का निर्माण हुआ है। जिसे हिन्दू मंदिर के रूप मे जाना जाता है। वैसे इनके मंदिरों में देवताओं की भी मूर्तियां होती है, जिनको श्रद्धालु पूजा – अर्चना करते हंै।
अपने देवताओं के नाम से जिन मंदिरों को जाना जाता है, उनमें अधिकाशतः दक्षिण में है। जहां भक्तों के अनुसार गैर सनातनी लोगों का बाहुल्य है। जिसको लेकर द्रविड़ मुनेत्र कडगम के नेता बहुत आलोचक रहते हैं। उनके अपने कारण है, वे सनातन धर्म में ब्राह्मणों के वर्चसव और परिणामस्वरूप पिछड़े और दलित वर्ग के साथ हुए भेदभाव और अन्यायपूर्ण बर्ताव को लेकर आज भी असन्तुष्ट है। परंतु आंध्र में मीनाक्षी मंदिर को उसकी देवी के नाम से जाना जाता है। चिदम्बरम जिले में अनेक मंदिर है जो अपने देवता के नाम से ही जाने जाते हंै, ना कि अपने निर्माणकर्ता के नाम से। इसी प्रकार देश के सबसे धनी मंदिर पदनाभ स्वामी मंदिर का नाम लिया जा सकता है, त्रिवेन्द्रम स्थित इस मंदिर का निर्माण वहां के राजाओं द्वारा सदियों पहले कराया गया था। जिसमें अकूत धन और सोना और जवाहरात है।
इसके तहखाने में एक द्वार ऐसा है जिसको किसी चाबी से नहीं खोला जा सकता। वरन केवल किस मंत्र के उच्चारन से ही खुल सकता है परंतु उस मंत्र की जानकारी मंत्री के अरचकों और पुजारियों को नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस मंदिर का अधिकार पुनः त्रिव्ङ्कुर के राजघराने को दे दिया है। पहले अन्य बड़े मंदिरों की ही भांति इस का प्रशासन राज्य सरकार के पास था। कहते हैं इस मंदिर में इतनी संपत्ति है कि देश के रिजर्व बैंक के पास भी उतना सोना नहीं होगा। अब आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि धर्म मे कितना दम है। इसीलिए हिन्दू – हिन्दू किया जा रहा है और मंदिर – मंदिर किया जा रहा है। पर क्या इससे देश की अशिक्षा और गरीबी को मिटाने मे कोई मदद मिल सकती है ? शायद नहीं, क्यूंकि मूर्ति और मंदिर के प्रति यह श्रद्धा प्रातः कालीन दर्शन के समय के बाद तो आम आदम रोजी – रोटी और कपड़ा तथा मकान के सवालों से जूझने में लग जाता है।