क्या गांधीजी होते तो आज आईपीएल चलने देते? आईपीएल से जुड़ी या उसमें चल रही जुए या सट्टेबाजी पर गांधीजी का क्या रवैया होता? अपन ने उनसे, और खुद से भी सवाल किया कि, क्या आईपीएल में क्रिकेट नहीं खेली जा रही?
पहलगाम में हुई दुखद घटना का विरोध हैदराबाद में हुए आईपीएल मैच खेलते खिलाड़ियों ने कंधे पर काली पट्टी बांध कर अहिंसा के आत्मबल से जताया। और सारा देश विरोध की एकजुटता में शामिल दिखा। समाज जीवन और मृत्यु के अनिर्णायक खेल को उसकी पूरी नैसर्गिकता में समझता है। जीवन न तो सोशल मीडिया की भेड़चाल से चलता है, न ही टीवी की बेवजह बहस से भड़कता है। समय की नजाकत समझते हुए, सभी की सुरक्षा के लिए देशवासियों में सदबुद्धि रहने की प्रार्थना से भी चलता है। … और चलता रहा है।
दिल्ली विश्वविद्यालय के डीएवी कॉलेज के राजनीति शास्त्र के युवा प्राध्यापक भानू कुमार ने अचानक संदेह जताते हुए सवाल किया, जैसा आजकल हर बात पर उठाया जा रहा है। क्या गांधीजी होते तो आज आईपीएल चलने देते? आईपीएल से जुड़ी या उसमें चल रही जुए या सट्टेबाजी पर गांधीजी का क्या रवैया होता? अपन ने उनसे, और खुद से भी सवाल किया कि, क्या आईपीएल में क्रिकेट नहीं खेली जा रही? गांधी-विचार के विस्तार व विज्ञान पर जाने से पहले, कुछ और भी समझना फायदेमंद रहेगा।
इसकी हिस्ट्री या सत्तानीति पर नहीं, इसके विकास की अवधारणा पर आते हैं। जब भी क्रिकेट पहली बार खेला गया – एक बल्ला और एक गेंद ही रही होगी। खेलने का उद्देश्य भी बल्ले से रन बनाना, और गेंद से बल्लेबाज को आउट करना ही रहा होगा। खेल या जीवन की लड़ाई को साधन-साध्य के सिद्धांत से, अहिंसक तौर पर आनंद लेते हुए खेलना, देखना व प्रेम करना भी इसके बाद ही हुआ। फिर खेल जैसे जैसे खेला गया, उसके नीति-नियम व कानून बनते गए। उसकी तकनीक व शैली गढ़ी गयी। उसके आंकड़े जमा किए गए। उसका इतिहास लिखा गया। तब जा कर, खेल के प्रति भावना पैदा हुई। प्रेम जगा और उसके प्रति नॉस्टैल्जिया भी पनपा। दुनिया को मानवता व जैविकता का ठिकाना मानने-देखने वालों ने भी महान अनिश्चित संभावना के इस खेल को अपनाया। और क्रिकेट, लोगों के जीवन जीने का जरिया बना।
गांधीजी का क्रिकेट खेल के प्रति सीधा योगदान, अन्य सभी बातों की तरह मानवता के मानस पटल पर अच्छे से दर्ज है। मुंबई रहते हुए गांधीजी लगातार टीमों के सम्प्रदाय के नाम पर खेलने का सवाल उठाते। आजादी के आंदोलन के लिए सभी को एकजुट, जागरूक करते। लेकिन क्रिकेट रोकने या खेल न चलने देने की कोई बात सामने नहीं आयी। सन् 1930 में लंबे मुंबई प्रवास के दौरान ऐसा कुछ तो हुआ जब साम्प्रदायिक प्रतिस्पर्धा चार-साल के लिए रद्द हुई। और फिर सन् 1934 में राज्यों की रणजी ट्रॉफी की शुरुआत हुई जो आजतक लोकप्रियता में चल रही है। इसलिए खेल को रोकना गांधीजी ने कभी न सोचा, न चाहा होगा।
क्रिकेट का प्रारूप कैसा भी हो – टेस्ट, एकदिवसीय या बीसमबीस, खेली तो सभी में क्रिकेट ही जाती है। इसी का एक प्रारूप बीसमबीस या टी20 है जिसमें आइपीएल यानी इंडियन प्रीमियर लीग आज एक अति लोकप्रिय प्रतिस्पर्धा हो गयी है। इतनी लोकप्रिय कि देश में ही नहीं विदेश में भी खेल के अर्थ-विकास के लिए उसकी भरपूर हिस्सेदारी हो गयी है। खेल से नए दर्शक जुड़ते गए। बच्चे जोश में खेलने लगे। लगातार युवा प्रतिभा उभर रही है। रोजगार के नए आयाम निकल कर आ रहे हैं। अब ऐसे अर्थमय, अति लोकप्रिय खेल से बाजार कैसे दूर रह सकता है।
बीसमबीस हर तरह से टीवी पर दिखाए जाने के लिए सबसे माकूल प्रारूप मान लिया गया है। कोविड महामारी के दौरान जब विज्ञापन मिलना मुश्किल हुआ तो सपनों से खिलवाड़ करने वाले, जुआ खिलाने वाले खेल में विज्ञापन दे कर घुस आए। महामारी से उभरने, बीसमबीस चलाने, और टीवी पर प्रसारित होने के लिए सट्टेबाजी को भी एक खेल मान लेने वालों से घोर गलती हुई। अनेक युवा आज इसकी लत में पड़ गए हैं। आईपीएल सिक्के का ही यह दुखदायी पहलू है।
सत्ता की मनमर्जी और समाज की मौजमर्जी के कारण सट्टे का बाजार भी चला है। अंधाधुंध विकास की चाहत में समाज का एक हिस्सा अंधभक्ति में पड़ गया है। गांधीजी आईपीएल में क्रिकेट के साथ लगे इस घुन के विरोध में समाज को आगाह करते, आग्रह रखते या फिर आंदोलन भी करते। क्योंकि अच्छे साधन से ही सही साध्य पाया जा सकता है। पहलगाम हो या हैदराबाद, शांति के साध्य के लिए साधन भी शुद्ध ही रहे।