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05-04-2025 Vol 19

यम को दीपदान के बहाने यमी की आलंकारिक कथा

यम अर्थात यमराज मृत्यु के देवता हैं, जो नरक चतुर्दशी की सायंकाल में दीपदान करने वाले को असमय अकाल मृत्यु कष्ट से बचाते हैं। यद्यपि वैदिक विद्वान वेद में इतिहास का अंश होना नहीं स्वीकारते, तथापि कतिपय विद्वान यम के इस पौराणिक कथा का संबंध वेद में आए यम- यमी संवाद प्रकरण के यम से जोड़ते है। ऋग्वेद के दशम मण्डल का दशम सूक्त यम-यमी सूक्त है। इस सूक्त के मन्त्र कुछ वृद्धि सहित तथा कुछ परिवर्तनपरक अथर्ववेद 18/1/1-16 में भी अंकित हैं।

11 नवंबर – नरक चतुर्दशी

अवैध दीपावली से एक दिन पूर्व कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी के दिन सायंकाल में यम को दीपदान की पौराणिक परिपाटी है। यह यम अर्थात यमराज मृत्यु के देवता हैं, जो नरक चतुर्दशी की सायंकाल में दीपदान करने वाले को असमय अकाल मृत्यु कष्ट से बचाते हैं। यद्यपि वैदिक विद्वान वेद में इतिहास का अंश होना नहीं स्वीकारते, तथापि कतिपय विद्वान यम के इस पौराणिक कथा का संबंध वेद में आए यम- यमी संवाद प्रकरण के यम से जोड़ते है। ऋग्वेद के दशम मण्डल का दशम सूक्त यम-यमी सूक्त है। इस सूक्त के मन्त्र कुछ वृद्धि सहित तथा कुछ परिवर्तनपरक अथर्ववेद 18/1/1-16 में भी अंकित हैं। वैदिक विद्वानों के अनुसार वेद में मानव इतिहास नहीं है, और इस सूक्त में नियोग प्रकरण को आलंकारिक रूप में पति -पत्नी के मध्य सम्पन्न संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यहाँ यम-यमी का परस्पर सम्बन्ध पति-पत्नी रूप में है। लेकिन सायणादि भाष्यकारों के द्वारा वेद के इन यम-यमी को भाई-बहन के रूप में प्रस्तुत कर इस सूक्त का अर्थ अश्लीलता परक किए जाने के बाद एक नए विवाद का आरंभ हुआ, और धर्म विद्वेषी, विधर्मी तत्वों को वेद पर आक्षेप करने व मजाक उड़ाने का अवसर मिल गया।

ऐसे धर्मद्वेषियों के अनुसार यम तथा यमी विवस्वान् के पुत्र-पुत्री हैं। वे एकांत में होते हैं, तो  यमी यम से सहवास की इच्छा प्रकट करती हैं। यमी अनेक तर्क देती है, किन्तु यम उसके प्रस्ताव को निषेध कर देता है। जबकि प्रो. मोक्षमूलर आदि विदेशी विद्वान कहते हैं- यम-यमी कोई मानवीय सृष्टि के पुरुष- स्त्री न थे, बल्कि दिन का नाम यम और रात्रि का नाम यमी है। इस सूक्त में इन्हीं दोनों से विवाह विषयक वार्तालाप है। लेकिन इसे दिन और रात्रि का रूप देना गलत है, क्योंकि मोक्षमूलर के अनुसार यम और यमी दोनों के दिन और रात होने पर उन दोनों का भिन्न-भिन्न कालों में होना सिद्ध है। और दिन और रात का मिलन असंभव ही है। इस प्रकार सिद्ध है कि विदेशी विद्वानों के इस कल्पना में दोष है। इनके इस सोच का आधार इस संसार का आरंभ भाई- बहन से होने की मान्यता ही है। हिब्रू मतानुसार आदम और ईव मानव जाति के आदि माता-पिता माने जाते हैं, इनके अनुसार ये दोनों भाई -बहन ही थे। यथावत यही विचार ईसाईयत और इस्लामियत मानने वालों का भी है। इस विचार के लोग अपने मत में प्रचलित हर मान्यता को सत्य मानते हैं और दूसरे में अमान्य असत्य बात को सत्य सिद्ध करने पर लगे रहते हैं। वेदों के अनर्गल अर्थो का प्रचार करने में लगे रहते हैं।

अनेक पिछलग्गू भारतीय लेखकों ने भी इन विदेशी विद्वानों की देखा- देखी इन मन्त्रों के व्याख्यान को अलंकार बनाकर यम-यमी को दिन-रात सिद्ध किया है। किसी ने नहीं सोच कि  न कभी दिन-रात को विवाह की इच्छा हुई और न कोई इनके विवाह के निषेध से अपूर्वभाव ही उत्पन्न होता है। विद्वानों ने इस सूक्त का भिन्न- भिन्न अर्थ ग्रहण किया है। यास्काचार्य ने यमी का निर्वचन लिंगभेद मात्र से यम से माना है। यमो यच्छतीत सतः। अर्थात यम को यम इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह प्राणियों को नियन्त्रित करता है। निरुक्त चन्द्रमणिभाष्य के अनुसार यम प्राण को कहते हैं, क्योंकि यह जीवन प्रदान करता है।

ऋग्वेद 10/10/8 की व्याख्या करते हुए निरुक्त के एक अन्य भाष्यकर्ता स्कन्दस्वामी ने यम-यमी को आदित्य और रात्रि माना है। कुछ अन्य विद्वानों ने यम-यमी को पति-पत्नी, दिन- रात्रि  और वायु-विद्युत का बोधक माना है। शतपथ ब्राहमण में अग्नि तथा पृथ्वी को यम-यमी कहा गया है। प्रसिद्ध वैदिक विद्वान पंडित भगवद्दत्त ने यम को अग्नि, आदित्य, वायु, मध्यम तमोभाग तथा यमी से पृथ्वी और माध्यमिका वाक् अर्थ ग्रहण किये हैं। कतिपय विद्वान यम को पुरुष- जीवात्मा तथा यमी को प्रकृति मानते हैं। कुछ विद्वानों ने इन्हें सहोदर भाई- बहन न दिखा कर सगोत्र दिखाने का प्रयास किया है। स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुसार इस सूक्त में पति-पत्नि का संवाद है, न कि भाई-बहन का। महर्षि पाणिनि अपनी व्याकरण अष्टाध्यायी 4/1/48 में यम- यमी शब्द के बारे में कहते हैं- पुंयोगादाख्याम्। इस सूक्त से यमी शब्द में ङीष् प्रत्यय हुआ है। इससे पत्नी का भाव ही द्योतित होता है। क्योंकि यम-यमी का अर्थ भाई-बहन लिए जाने पर यम-यमा ऐसा प्रयोग होना चाहिए था, जबकि ऐसा प्रयोग नहीं है।

वर्तमान में भी आचार्य की स्त्री के लिए आचार्या अथवा आचार्याणी, इन्द्र की स्त्री के लिए इन्द्राणी आदि प्रसिद्ध है। आचार्या अथवा आचार्याणी से आचार्य की बहन अथवा इन्द्राणी से इन्द्र की बहन स्वीकार नहीं की जाती है। ऐसे ही यमी शब्द से पत्नी और यम शब्द से पति स्वीकार करना चाहिए। इस प्रकार यम की स्त्री यमी ही सिद्ध होगी। ऐसे में सायण ने यम-यमी संवाद को भाई- बहन का संवाद कहकर अपनी इच्छानुसार ही कल्पित अर्थ को जन्म दे दिया है। इस गलत अर्थ को स्वीकार कर लेने के कारण आज भी पाश्चात्य विद्वानों के आक्षेप तथा विधर्मियों के विवाद सदैव हम सबके समक्ष उपस्थित होते रहे हैं। मानव समाज में शिष्टाचार और सभ्यतापूर्वक सम्बन्धों की परम आवश्यकता है। भाई-बहन का ऐसा पशु तुल्य व्यवहार वैदिक कदापि नहीं हो सकता।

इस सूक्त के ग्यारहवें मन्त्र में आए भ्राता तथा स्वसा नाम पर विचार करने से इसके पूर्वापर प्रसंग को समझ जा सकता है। ऋग्वेद 10/ 10/10 में सन्तति उत्पत्ति में असमर्थ पति अपनी पत्नी को कहता है –

आ घा तो गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि।

उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्।।

-ऋग्वेद 10/10/10

अर्थात- हे सौभाग्यशालिनी! तू अन्य वीर्यवान पुरुष के बाहु का सहारा ले और इस प्रकार सन्तान उत्पन्न करने में असमर्थ मुझ पति से अतिरिक्त पति की इच्छा कर।

स्पष्ट है कि इन मन्त्रों में पति-पत्नी परक अर्थ का ही ज्ञान करना चाहिए। इसके अगले मन्त्र में  पत्नी पति की भर्त्सना करती हुई कहती है-

किं भ्रातासद्यदनायं भवाति किमुस्वसा किमुस्वसा यर्‍ॠनटी तिर्निगच्छात् ।

काममूता बह्‍वे तद्रपामि मे तन्वं सं पिपृग्धि।। -ऋग्वेद 10/10/11

अर्थात- क्या अब मै तुम्हारी पत्नी न होकर बहन हो गई हूँ? क्या तुम मेरे पति न होकर भाई हो, जो मैं अन्यत्र चली जाऊॅं?

अगले बारहवें मन्त्र में पति कहता है-

न वा उ ते तन्वा सं पपृच्यां पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात्।

अन्येन मत्प्रमुदः कल्पयस्व न ते भ्राता सुभगे वष्ट्येतत्।। -ऋग्वेद 10/10/12

अर्थात- जब मैं असमर्थ हो तुझे दूसरे पति से नियोग की आज्ञा दे दी तो तू मेरी बहन समान हुयी और मैं तेरा भाई समान। अतः मैं तूझे आदेश देता हूँ कि तू मुझ से अन्य श्रेष्ठ पुरुष का समागम कर।

स्वामी दयानंद सरस्वती सत्यार्थ-प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास के नियोग प्रकरण में उद्धृत इस सूक्त के एक मन्त्र का अर्थ करते हुए कहते हैं-

जब पति सन्तानोत्पत्ति में असमर्थ होवे तब अपनी स्त्री को आज्ञा देवे कि हे सुभगे! सौभाग्य की इच्छा कर क्योंकि अब मुझसे सन्तानोत्पत्ति न हो सकेगी।

इससे स्पष्ट है कि इस सूक्त में पति- पत्नी का संवाद है, न कि भाई-बहन का। सायण आदि के द्वारा भाई-बहन परक अर्थ किया जाना शायद उनके इस मन्त्र भाव को न समझ पाना होगा। वैदिक विद्वानों के अनुसार यह आलंकारिक वर्णन है। यम-यमी मानुषी सृष्टि के स्त्री या पुरुष नहीं हैं। इस सूक्त में नियोग प्रकरण को समझाने के लिए यम-यमी को पति-पत्नी के रूप में प्रस्तु किया गया है। यह सम्पूर्ण कृत सामान्य स्थिति के लिए नहीं वरन नियोग पद्धति का है। स्वामी दयानन्द कृत सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ सम्मुल्लास में अंकित नियोग के समस्त नियम-उपनियम व अधिकार और सूक्त के मंत्रों के पूर्वापर मन्त्रार्थ की संगति से ऋग्वेद 10/10/11 में आए भ्राता और स्वसा शब्दों का अर्थ व भाव स्पष्ट हो जाता है। और सम्पूर्ण सूक्त की संगति पति-पत्नी परक मन्त्रार्थ ही सत्य ही प्रतीत होता है अन्यार्थ सभी कल्पना मात्र हैं। वेद  में सर्वत्र मर्यादित जीवन की बात की गई है। वेद में वर्णित ईश्वरीय आज्ञा का सदैव पालन करते रहने से भारतीयों का जीवन सदैव मर्यादित रहा हैं, लेकिन यह मिथ्या प्रचार किया जा रहा है कि वेद भाई-बहन, पिता-पुत्री के अवैध संबंधों की शिक्षा देते हैं।

अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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