भोपाल। भाजपा के सशक्त राष्ट्रीय नेतृत्व के चुनावी फैसलों से कभी सारे घर के बदल डालो गुजरात फार्मूले की खूब चर्चा रही.. तो कभी परिस्थितियों जन्म समझौते कर राज्यों से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में अपने निर्णय से मोदी और शाह की जोड़ी ने खूब चौंकाया.. गुजरात में चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री से लेकर उम्मीदवारों में एक झटके से बड़ा बदलाव यदि सफलता के साथ जीत की गारंटी साबित हुआ .. तो हिमाचल से ले कर कर्नाटक में भाजपा की रणनीति पर सवाल भी खड़े हो चुके हैं.. ऐसे में लोकसभा चुनाव से पहले पांच राज्यों के चुनाव में मध्य प्रदेश में 3 महीने पहले सामने आई उम्मीदवारों की क्रमशः दो सूची और एक अतिरिक्त उम्मीदवार ने सूबे की सियासत में हलचल मचा दी है.. सत्ता वापसी के बहुत करीब खुद को मान बैठी कांग्रेस के रिएक्शन यह बताने के लिए काफी है कि उसे नए सिरे से सोचने को मजबूर किया है… वह बात और है कि जो दिक्कत कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर कमलनाथ सरकार का हिस्सा बन चुके भाजपा उनकी घेराबंदी कर रही तो कांग्रेस के पास सब ज्यादा विकल्प नहीं बचते.. सिंधिया और समर्थकों की बगावत के बाद दिग्विजय और कमलनाथ की जोड़ी ने कांग्रेस को विपक्ष में रहते जिस तरह एकजुट और आक्रामक रखा उसके बाद बड़े चेहरों को टिकट देना नेतृत्व की मजबूरी साबित हो सकती है..इधर भाजपा में तो मानो सन्नाटा पसर गया है.. जीने पिछले कुछ माह में मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव लड़ने जिताने और एकजुटता लाने की जिम्मेदारी सौंप गई थी.. उन्हें खुद नहीं मालूम था कि ऐन टाइम पर उन्हें विधानसभा के चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतार दिया जाएगा.. हारी हुई सीट यानी भाजपा ने कांग्रेस के सिटिंग विधायकों के खिलाफ घेराबंदी के लिए जिस तरह मोदी सरकार के तीन मंत्रियों के साथ-सात सांसदों को दूसरी सूची में शामिल कर मैदान में उतार दिया.. उसके साथ ही बड़ा सवाल खड़ा हो गया है की हारी हुई सीट जो अभी बची है.. क्या वहां भी गुजरात फार्मूले से अलग यू टर्न लेते हुए भाजपा इसी लाइन पर आगे बढ़ेगी.. या कोई नई रणनीति इन सीटों पर देखने को मिलेगी..
कई लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां कांग्रेस का दिग्गज नहीं है और राज्यसभा सांसद को लेकर जोखिम नहीं ले सकते क्योंकि विधानसभा चुनाव के बाद सीट संख्या का नया गणित निर्णायक भूमिका निभा सकता है.. तो सवाल के साथ जिज्ञासा भाजपा के मंत्री विधायक वाली सीटों को ले कर मोदी शाह की रणनीति आखिर यहां क्या होगी.. तमाम विकल पी खुले हुए हैं लेकिन हर हाल में चुनाव जीतने की जिद कर बैठे भाजपा नेतृत्व ज्यादा जोखिम लेंगे तो किस हद तक.. क्या नए चेहरों को मौका दिया जाएगा.. और यहीं से विष्णु दत्त की टीम में शामिल प्रदेश पदाधिकारी से लेकर जिला नेताओं की लॉटरी खुलेगी.. इसके लिए तीन चार पांच बार के विधायकों के लिए क्या कोई क्राइटेरिया बनेगा.. या बड़ी बेदर्दी से सर्वे रिपोर्ट और सोशल इंजीनियरिंग को ध्यान में रखते हुए अपने क्षेत्र के दिग्गजों का टिकट काटकर एक बड़ा संदेश पूरे प्रदेश में चुनाव को लेकर दिया जाएगा.. संदेश पार्टी के कार्यकर्ता को अपनी व्यक्तिगत नाराजगी और गिले शिकवे भुला कर कमल खिलाने का दिया जाएगा.. या फिर समझौते और समन्वय की सियासत भाजपा को अपने पुराने चेहरों पर ही दम लगाने को मजबूर करेगी.. वर्तमान मंत्री विधायक के खिलाफ एंटी इनकमेंसी की जो खूब चर्चा रही है.. वह दूर हो गई या कम हो सकती है.. व्यक्तिगत मंत्री विधायक सरकार के खिलाफ नाराजगी को दूर करने में क्या सांसद जिन्हें उम्मीदवार बनाया गया जो कम इन वेटिंग के बड़े दावेदार भी माने जाते अब विधानसभा चुनाव उम्मीदवार बनाकर सरकार के खिलाफ नाराजगी बीते दिन की पुरानी बात साबित होगी.. समय-समय पर मुख्यमंत्री शिवराज 121 बैठकों में इनमें से कई विधायकों को अपने क्षेत्र में अपनी स्थिति में सुधार लाने की सलाह भी देते रहे हैं.. तो कई विधायकों के खिलाफ अनियमितता, भ्रष्टाचार, और पार्टी कार्यकर्ताओं की अनदेखी के आरोप की शिकायतें पार्टी के प्रदेश ही नहीं राष्ट्रीय नेतृत्व तक भी पहुंचाई गई..
मध्य प्रदेश की 230 सीट वाली वर्तमान विधानसभा मैं भाजपा ने फिलहाल एक तिहाई उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है.. यानी सीट में इजाफा और कांग्रेस का मनोबल गिरने और आपसी कलह बढ़ाने के उद्देश्य से भाजपा ने कांग्रेस के कई दिग्गजों को उनके अपने विधानसभा क्षेत्र में बांधने का प्रयास किया है तो कमलनाथ समेत दूसरे छत्रपों पर दबाव बढ़ा दिया है कि वह भी चुनाव मैदान में उतरे.. फिलहाल भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व में एक साथ कई संदेश दिए हैं जिसमें सबसे बड़ा संदेश हर हाल में मध्य प्रदेश में सरकार बनाना है.. करो या मरो की नीति पर आगे बढ़ेंगे सरकार बनाने के लिए सीनियर जूनियर अनुभवी युवा कोई मायने नहीं रखता लेकिन विरासत की राजनीति खासतौर से नेता पुत्रों की दावेदारी पर विराम लगाने का संदेश भी दिया है.. सवाल खड़ा होना लाजमी है गुजरात की ऐतिहासिक जीत में जिस गुजरात फार्मूला ने बड़ी भूमिका निभाई थी क्या मध्यप्रदेश में वह मॉडल फिट साबित नहीं हो रहा.. यानी बदलती परिस्थितियों में चुनौतियों का अंबार और चुनाव जीतने के लिए या यू कहे कि कांग्रेस की घेराबंदी के लिए नए चेहरों पर गांव लगाने का भाजपा जोखिम नहीं लेगी..तो क्या गारंटी अनुभवी कांग्रेस पर भारी साबित होंगे.. भाजपा हाई कमान का यह फैसला जरूरी तो फिर इसकी वजह क्या.. कहीं यह मजबूरी बनकर सामने तो नहीं आया.. तो क्या भाजपा 2018 की स्थिति में खुद को खड़ा पा रही है..
कांग्रेस वादे के अनुरूप जो चाह कर भी अपने उम्मीदवारों की सूची घोषित नहीं कर पाई.. भाजपा ने हारी हुई सीट पर 79 उम्मीदवारो की तीन सूची जारी कर उस कांग्रेस पर दबाव बनाने का प्रयास किया.. दिल्ली में दखल रखने वाले मोदी की टीम के सदस्य हो या फिर अमित शाह के भरोसेमंद कई चेहरों को राष्ट्रीय राजनीति से दूर राज्य की राजनीति में उतार दिया गया है.. इनमें से कई प्रदेश में अपनी भूमिका से संतुष्ट नहीं थे तो नई भूमिका में विधायक से सांसद बनकर दिल्ली का रुख करने को मजबूर हुए थे.. करीब दो दशक के शिवराज के राज में जो चेहरे दिल्ली में स्थापित हो गए थे अब कई साल बाद विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे.. चुनाव पहले भी यह नेता लड़ चुके और जीते मंत्री भी बने लेकिन इस बार पीढ़ी परिवर्तन के दौर से गुजर रही भाजपा में जब नेता पुत्रों के भविष्य पर फिलहाल विराम तब ये अनुभवी नई चुनौती के साथ राज्य की राजनीति में लौट रहे.. शिवराज के समकक्ष इन नेताओं को कभी मुख्यमंत्री का दावेदार माना जाता रहा.. उत्तराधिकारी साबित होने से पहले अब इन्हें खुद चुनाव जीतना और दूसरों को जिताना भी होगा.. एक साथ यहीं पर कई सवाल खड़े हो जाते हैं.. सीएम इन वेटिंग के ये दावेदार आखिर किसके मंसूबों पर पानी फेरेंगे.. कांग्रेस उम्मीदवार को पराजित कर अपनी स्वीकार्यता साबित करेंगे..या फिर 23 का सिरमौर साबित होने के लिए पार्टी के अंदर महत्वाकांक्षाओं की टकराहट के चलते उनकी अनिवार्यता पर सवाल खड़े होंगे..
अपेक्षाएं हाई कमान की पूरी होगी या खुद के मंसूबों पर पानी नहीं फिरे इसकी चिंता उनके खुद के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है..मोदी शाह का तिलस्म इन सभी दिग्गज चेहरों की जीत की गारंटी या अभी भी शिवराज फेक्टर पार्टी के लिए जरूरी से ज्यादा मजबूरी साबित होगा.. मुख्यमंत्री शिवराज मोदी के भोपाल दौरे के बाद बुलाई गई कैबिनेट की बैठक के बाद खासतौर से अधिकारियों और सहयोगी मंत्रियों का सहयोग के लिए शुक्रिया अदा कर चुके हैं.. भावुक शिवराज ने अपनी सरकार की उपलब्धियां को जिस तरह सामने रखा उसके अपने सियासी मायने भी निकल जा सकते हैं.. शिवराज ने पिछली बार अलग और विपरीत परिस्थितियों में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी..फिलहाल मध्य प्रदेश में सिंधिया फैक्टर से 15 महीने बाद सरकार में लौटी भाजपा के लिए 23 का चुनाव आसान नहीं माना जा रहा था.. फिर भी संदेश स्पष्ट मिशन 2024 को ध्यान में रखते हुए मोदी शाह कोई जोखिम लेने को तैयार नहीं.. लोकसभा से पहले राज्यों में अपनी सरकार ही नहीं बनाना बल्कि राज्यों से नए कीर्तिमान स्थापित कर बड़ा संदेश देने की भी है..
पिछली बार छत्तीसगढ़ राजस्थान के साथ मध्य प्रदेश में कमल नहीं खिल पाया था.. गुजरात से लेकर कर्नाटक तक सरकार और संगठन में प्रदेश अध्यक्ष से लेकर मुख्यमंत्री में बड़े बदलाव कर चुकी भाजपा मध्य प्रदेश में इस लाइन पर आगे नहीं बढ़ पाई.. अंततः जो जहां था वह वहां टिका रहा.. अनुभवी शिवराज और युवा विष्णु दत्त की जोड़ी कदम ताल करने को मजबूर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह के अगल-बगल नजर आती है.. लेकिन पिछले 4- 5 पखवाड़े में पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने मोदी के चेहरे को सामने स्थापित कर सामूहिक नेतृत्व की नई रणनीति पर काम किया..हमेशा की तरह मोदी फ्रंट पर ग्लोबल लीडर के तौर पर स्थापित होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द पूरी राजनीतिक सिमट चुकी है.. फिर भी फेसलों के क्रियान्वन में बड़ी भूमिका निभाने के लिए कमरा बंद राजनीति की जिम्मेदारी अमित शाह निभा रहे .. फिर भी शिवराज मध्य प्रदेश की इंटरनल पॉलिटिक्स में कभी बैक फुट पर नजर नहीं आए.. विकास यात्रा के जरिए पूरे प्रदेश का दौरा और माहौल उन्होंने बखूबी बनाया.. मोदी शाह से लेकर प्रदेश के सारे वरिष्ठ नेता शिवराज सरकार की उपलब्धियां को लेकर ही जनता के बीच जा रहे..लेकिन इस बार
जन आशीर्वाद यात्रामध्यप्रदेश में एक नहीं पांच.. समय अभाव से ज्यादा दूरगामी रणनीति का हिस्सा जिसके संकेत अब स्पष्ट तौर पर सामने आने लगे..क्यों कि मार्गदर्शन दे दिल्ली की पटकथा आगे बढ़ाने के लिए पहले ही प्रदेश चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव और सह प्रभारी अश्विनी वैष्णव की तैनाती के साथ प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव को पावर लैस कर दिया गया.. रथ यात्रा पर मोदी पर फोकस करते हुए 11 चेहरों को स्थान दिया गया.. प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त के नेतृत्व में भाजपा ने जन आशीर्वाद यात्रा ने माहौल बनाया और लाडली बहना योजना के जरिए पिछले कुछ महीने के बिगड़े माहौल को दुरुस्त भी किया गया.. दिग्गज नेताओं और छष्ट्रपों ने दौरा कर अपने चेहरे को चमकाया..
फिर भी संभागीय मुख्यालयों पर मुख्यमंत्री शिवराज के नेतृत्व में ही इस यात्रा का समापन हुआ.. लेकिन इस बीच नरेंद्र तोमर कैलाश विजयवर्गीय, फग्गन सिंह , नरोत्तम मिश्रा प्रहलाद पटेल जैसे शिवराज के समकालीन नेताओं को सीएम इन वेटिंग के चेहरे के तौर पर प्रस्तुत किया जा चुका था.. फिर सभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में संपन्न हुए कार्यकर्ता महाकुंभ के साक्षी बने.. मोदी के दिल्ली रवाना होने के बाद जब ये नेता महाकुंभ में अपनी बड़ी भागीदारी और सफलता का जश्न मना रहे थे .. तभी सामने आई सूची ने इनमें से कई दिग्गजों को कांग्रेस के महारथियों के सामने चुनाव मैदान में उतार दिया.. मोदी सरकार के मंत्री नरेंद्र तोमर, फगन सिंह कुलस्ते समेत 7 सांसदों को विधानसभा का टिकट देकर बता दिया कि पार्टी शायद उन्हें जीत की गारंटी मान बैठी है.. इनमें चुनाव प्रबंधन की कमान संभालने वाले नरेंद्र सिंह को दिमनी तो भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को इंदौर की उस सीट से उतरा जहां कांग्रेस से ज्यादा संजय शुक्ला का दबदबा भाजपा की परेशानी बढ़ाता रहा है.. कैलाश का नाम राऊ सीट से कांग्रेस के युवा तेजतर्रार नेता राहुल के करीबी जीतू पटवारी के खिलाफ भी चर्चा में था लेकिन वहां भाजपा अपना उम्मीदवार घोषित कर चुकी है.. भाजपा अब इन चेहरों को चुनाव मैदान में उतार कर उनके अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में बड़ा चेहरा बनाकर भाजपा संभवत क्षेत्र विशेष की राजनीति में कांग्रेस पर दबाव बनाने की कोशिश करेगी..
क्योंकि इसमें सोशल इंजीनियरिंग भी देखी जा सकती.. आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग ज्यादा कम पड़ती रही है इसलिए फग्गन सिंह यदि आदिवासी बड़े नेता तो पिछड़े वर्ग के पहले पटेल से लोधी समुदाय को एकजुट करने की अपेक्षा रखी गई होगी.. कांग्रेस की ताकत और क्षत्रियों के नेता दिग्विजय सिंह के सामने नरेंद्र सिंह को ठाकुर राजनीति में उनका वर्चस्व स्थापित करने के लिए बड़ा चेहरा बनाकर प्रस्तुत किया है.. ग्वालियर चंबल से बाहर भी नरेंद्र सिंह को यह बड़ी जिम्मेदारी निभानी होगी.. एक और बड़ा संदेश परिवार वाद के मुद्दे से नेता पुत्रों के चुनाव लड़ने के मंसूबों पर पानी फिर सकता है..इसी के साथ नरेंद्र पुत्र देवेंद्र प्रताप सिंह रामू भैया की देवदारी यदि खटाई में पड़ गई तो अब कैलाश के विधायक पुत्र आकाश की विधानसभा नंबर दो पर दूसरे दावेदारों की नजर टिक गई.. नेता पुत्रों के सबसे बड़े दावेदार गोपाल भार्गव के पुत्र अभिषेक भार्गव भी पहले ही चुनाव न लड़ने का ऐलान पहले ही कर चुके.. उधर प्रहलाद पटेल की उम्मीदवारी उनके अपने भाई जालम सिंह जो वर्तमान में विधायक का टिकट काटकर सुनिश्चित की गई है.. वह बात और है जयंत मलैया के पुत्र सिद्धार्थ को जरूर उम्मीद है कि उनका रास्ता खोला जाएगा.. पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के भतीजे राहुल सिंह लोधी को कुछ दिन पहले ही शिवराज कैबिनेट में शामिल किया गया था.. तेजी से बदलती राजनीति के बीच सांसद और केंद्रीय मंत्री के चुनाव लड़ने के फैसले से संदेश गोपाल भार्गव के साथ अजय बिश्नोई जयंत मलैया और दूसरे अनुभवी नेताओं के लिए भी की चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहे..
विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी ने केंडिडेट्स की जो दूसरी लिस्ट जारी की है..इसमें 39 सीटों के लिए प्रत्याशियों के नामों का ऐलान किया गया है..खास बात ये है कि बीजेपी ने इस लिस्ट में तीन केंद्रीय मंत्रियों को टिकट दिया है.
.इनमें मुरैना की दिमनी सीट से नरेंद्र सिंह तोमर, नरसिंहपुर से प्रह्लाद पटेल और निवास से फग्गन सिंह कुलस्ते को प्रत्याशी बनाया गया है..बीजेपी अपने चार सांसद को भी विधानसभा चुनाव लड़ा रही है..जबलपुर पश्चिम से राकेश सिंह, सतना से गणेश सिंह, सीधी से रीति पाठक और गाडरवारा से उदय प्रताप सिंह को प्रत्याशी बनाया गया है..चौकाने वाली बात तो ये है कि बीजेपी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को इंदौर विधानसभा क्रमांक 1 से टिकट दिया गया है..छिंदवाड़ा से विवेक बंटी साहू को उतारा गया है.. भाजपा इस विस चुनाव में कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहती और कांग्रेस के मजबूत किलों को भी भेदना मिशन में शामिल है..इसलिए इस बार भाजपा ने सभी अटकलों को विराम देते हुए अपने सभी वे योद्वा मैदान में उतार दिए हैं जिन्होंने पिछली भाजपा सरकारों को बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया था…ये वो चहरे हैं जिनका विरोध भी कार्यकर्ता नहीं कर पाएंगे और संतुलन के साथ भाजपा कांग्रेस के दिग्गजों की घेराबेदी भी कर लेगी…इन दिग्गजों को विस चुनाव 2023 के मैदान में उतारने के पीछे भाजपा के शीर्ष नेताओं की बड़ी तगड़ी रणनीति ये है कि कांग्रेस के दिग्ग्जों को उनके घर में घेर दिया जाए जिससे कांग्रेस के नेताओं पर मानसिक दबाव बनाया जा सके.. छिंदवाड़ा से कमलनाथ के खिलाफ बंटी साहू जिन्होंने मुख्यमंत्री रहते उपचुनाव में कमलनाथ को बड़ी चुनौती दी थी..सतना से सांसद गणेश सिंह को टिकट,जबलपुर पश्चिम से राकेश सिंह को टिकट देना कांग्रेस के मजबूत नेता पूर्व वित्त मंत्री तरूण भनोत की मुसीबत बढ़ाना है…सीधी से विवादों के चलते वरिष्ठ नेता केदार शुक्ला को फिलहाल घर बैठाकर संसद रीति पाठक को टिकट देने के पीछे भी एक बड़ी रणनीति भाजपा की है…सतना जिले की मैहर विधानसभा सीट से बीजेपी सर दर्द साबित हो रहे उनके अपने विधायक नारायण त्रिपाठी का टिकट काट दिया गया है…बीजेपी ने यहां से श्रीकांत चतुर्वेदी को अपना प्रत्याशी बनाया है..नारायण त्रिपाठी कुछ दिन पहले ही अपनी अलग पार्टी बन चुके हैं..यहां भी मुकाबला रोचक होगा… तीसरी सूची के इकलौते नाम के साथ गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के बड़े नेता स्वर्गीय मनमोहन बट्टी की पुत्री मोनिका को अमरवाड़ा यानि कमलनाथ के प्रभाव वाले क्षेत्र में उम्मीदवार घोषित कर दिया गया.. जो कुछ दिन पहले ही भाजपा में शामिल हुई थी..