ऋग्वेद में अन्य ऋषियों की अपेक्षा महर्षि अंगिरा व उनके वंशधरों तथा शिष्य-प्रशिष्यों के ही सबसे अधिक मंत्र हैं, अथवा इनका सर्वाधिक उल्लेख हुआ है। महर्षि अंगिरा से सम्बन्धित वेश और गोत्रकार ऋषि ही ऋग्वेद के नवम मण्डल के द्रष्टा हैं। नवम मण्डल के साथ ही ये अंगिरस ऋषि प्रथम, द्वितीय, तृतीय आदि अनेक मण्डलों के तथा कतिपय सूक्तों के द्रष्टा ऋषि हैं। जिनमें से महर्षि कुत्स, हिरण्यस्तूप, सप्तगु, नृमेध, शंकपूत, प्रियमेध, सिन्धुसित, वीतहव्य, अभीवर्त, अंगिरस, संवर्त तथा हविर्धान आदि मुख्य हैं।
19 सितंबर- अंगिरा जयंती
दिव्य अध्यात्मज्ञान, योगबल, तप साधना एवं मन्त्रशक्ति के लिए विशेष रूप से प्रतिष्ठित ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के मानस पुत्र थे। वसिष्ठ, विश्वामित्र तथा मरीचि आदि सप्तर्षियों के साथ परिगणित महर्षि अंगिरा को प्रजापति भी कहा गया है। महर्षि अंगिरा की पत्नी दक्ष प्रजापति की पुत्री स्मृति (श्रद्धा) थीं। ऋषि अंगिरा ने ही सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी। वाणी और छंद के प्रथम ज्ञाता भी यही हैं। मान्यतानुसार महर्षि अंगिरा की तपस्या और उपासना इतनी तीव्र थी कि इनका तेज और प्रभाव अग्नि की अपेक्षा बहुत अधिक बढ़ गया। उस समय अग्निदेव भी जल में रहकर तपस्या कर रहे थे।
अंगिरा के तपोबल के सामने अपनी तपस्या और प्रतिष्ठा तुच्छ होते देख अग्निदेव दु:खी हो अंगिरा के पास गये और कहने लगे- आप प्रथम अग्नि हैं, मैं आपके तेज़ की तुलना में अपेक्षाकृत न्यून होने से द्वितीय अग्नि हूँ। मेरा तेज़ आपके सामने फीका पड़ गया है, अब मुझे कोई अग्नि क्र नाम से सम्बोधित नहीं करेगा। तब महर्षि अंगिरा ने सम्मानपूर्वक उन्हें देवताओं को हवि पहुँचाने का कार्य सौंपा। साथ ही पुत्र रूप में अग्नि का वरण कर लिया। तत्पश्चात वही अग्निदेव ही बृहस्पति नाम से अंगिरा के पुत्र के रूप में प्रसिद्ध हुए, जो देवताओं के गुरु थे। उतथ्य तथा महर्षि संवर्त भी इन्हीं के पुत्र हैं। महर्षि अंगिरा मन्त्रद्रष्टा, योगी, संत तथा महान भक्त हैं। अंगिरा-स्मृति नामक इनका स्मृति ग्रंथ भी है, जिसमें सुन्दर उपदेश तथा धर्माचरण की शिक्षा दी गई है।
वैदिक ग्रंथों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि ऋग्वेद में अन्य ऋषियों की अपेक्षा महर्षि अंगिरा व उनके वंशधरों तथा शिष्य-प्रशिष्यों के ही सबसे अधिक मंत्र हैं, अथवा इनका सर्वाधिक उल्लेख हुआ है। महर्षि अंगिरा से सम्बन्धित वेश और गोत्रकार ऋषि ही ऋग्वेद के नवम मण्डल के द्रष्टा हैं। नवम मण्डल के साथ ही ये अंगिरस ऋषि प्रथम, द्वितीय, तृतीय आदि अनेक मण्डलों के तथा कतिपय सूक्तों के द्रष्टा ऋषि हैं। जिनमें से महर्षि कुत्स, हिरण्यस्तूप, सप्तगु, नृमेध, शंकपूत, प्रियमेध, सिन्धुसित, वीतहव्य, अभीवर्त, अंगिरस, संवर्त तथा हविर्धान आदि मुख्य हैं। ऋग्वेद में 114 सूक्तों में निबद्ध नवम मण्डल पवमान-मण्डल के नाम से विख्यात है। इसकी ऋचाएँ पावमानी ऋचाएँ कहलाती हैं। इन ऋचाओं में सोम देवता की महिमापरक स्तुतियाँ हैं, जिनमें यह बताया गया है कि इन पावमानी ऋचाओं के पाठ से सोम देवताओं का आप्यायन होता है। उल्लेखनीय है कि परमात्मा ने सर्वप्रथम चतुर्थ वेद अथर्ववेद का ज्ञान महर्षि अंगिरा को दिया था। अंगिरा ने वह ज्ञान ब्रह्मा को दिया। अथर्ववेद को ब्रह्मवेद भी कहा जाता है। अथर्ववेद में देवताओं की स्तुति के साथ ही चिकित्सा, विज्ञान और दर्शन से संबंधित मन्त्र हैं। अथर्ववेद की बड़ी महिमा है। अथर्ववेद के ये त्रिषप्ताः परियन्ति के प्रथम मंत्र अथर्ववेद 1/32/3 में कहा गया है –
यस्य राज्ञो जनपदे अथर्वा शान्तिपारगः।
निवसत्यपि तद्राराष्ट्रं वर्धतेनिरुपद्रवम्।।
अर्थात- जिस राजा के राज्य में अथर्ववेद जानने वाले विद्वान शान्ति स्थापन के कर्म में निरत
रहते हैं, वह राष्ट्र उपद्रव रहित होकर निरन्तर उन्नति करता जाता है।
अथर्ववेद में मन्त्रों के साथ विभिन्न प्रायोगिक उपयोग, उपचार, सुरक्षा और संपदा के लिए प्रार्थनाएं, व्याधि निवारण, वशीकरण और प्रभावशाली मंत्र आदि दिए गए हैं। अथर्ववेद का अर्थ होता है अथर्वण के वेद। अथर्वण एक ब्राह्मण कुल का ऋषि था, जिन्होंने इस वेद के मंत्रों को ग्रहण किया था। इसमें मनुष्य के जीवन के विभिन्न पहलुओं, उपचारों, अद्भुत शक्तियों और विशेष आयामों का वर्णन किया गया है। अथर्ववेद का महत्वपूर्ण कार्य उपचार, रक्षा, स्वास्थ्य, शांति, भयनिवारण, सुख-शांति, समृद्धि और शारीरिक-मानसिक रोगों के निदान के लिए मंत्रों का उपयोग करना है। लोगों को शक्ति, उर्जा, सुख, समृद्धि, सुरक्षा और प्राचीन सामर्थ्यों का अनुभव कराना है। अथर्ववेद के मन्त्रों में अद्भुत शक्तियों, आध्यात्मिकता के अवधारणाओं, उपचार, यन्त्र, टोटके और वर्तमान जीवन के विभिन्न पहलूओं का वर्णन है। इस वेद में विज्ञान, आयुर्वेद, ज्योतिष, शास्त्रीय गणित, रसायन, संगणक विज्ञान, भूगर्भ विज्ञान और भूत-प्रेतों संबंधी ज्ञान आदि भी मिलता है।
अंगिरस का उल्लेख अथर्ववेद, वैष्णव सम्प्रदाय, गीता कर्म जिज्ञासा,चार्वाक दर्शन,बृहदारण्यकोपनिषद, भृगु, छान्दोग्य उपनिषद, ऋभुगण एवं राष्ट्रकूट वंश में अंकित है। अंगिरस शब्द का निर्माण भी अग्नि धातु से ही हुआ है। इनकी उत्पत्ति भी आग्नेयी अर्थात अग्नि की कन्या के गर्भ से मानी जाती है। पौराणिक मत में इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से मानी जाती है। श्रद्धा, शिवा, सुरूपा मारीची एवं दक्ष की स्मृति, स्वधा तथा सती नामक कन्याएँ इनकी पत्नियाँ मानी जाती हैं, परंतु ब्रह्मांड एवं वायु पुराणों में सुरूपा मारीची, स्वराट, कार्दमी और पथ्या मानवी को अथर्वन की पत्नियाँ कहा गया है। छांदोग्य उपनिषद में श्रीकृष्ण के गुरु घोर अंगिरस का वर्णन है, लेकिन ये अंगिरा से भिन्न हैं। अंगिरस अथवा अंगिरा नाम के ऋषि का उल्लेख वेदों से लेकर अनेक पौराणिक ग्रंथों में मिलने से स्पष्ट है कि यह एक नहीं, अनेक व्यक्तियों का नाम है। इन्हें ऋग्वेद के अनेक मंत्रों का द्रष्टा बताया जाता है। अथर्ववेद के पाँच कल्पों में से अंगिरस कल्प के द्रष्टा भी यही हैं।
अथर्ववेद के प्रारंभकर्ता होने के कारण इनकी अथर्वा भी कहते हैं। पहले ये मनुष्य योनि में थे, जो बाद में देवता बन गए। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार आंगिरस नामक एक ऋषि को छोटी अवस्था में ही बहुत ज्ञान हो जाने के कारण उनसे सम्बन्धित सभी रिश्तेदार उनके पास अध्ययन करने लग गए थे। एक दिन पाठ पढ़ाते-पढ़ाते आंगिरस ने कहा -पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्य तान्। यह सुनकर सब वृद्धजन क्रोध से लाल हो गए और कहने लगे कि यह लड़का उदंड हो गया है। उसको उचित दण्ड दिलाने के लिए उन लोगों ने देवताओं से शिकायत की। देवताओं ने दोनों ओर की बातों को सुनकर यह निर्णय लिया कि आंगिरस के द्वारा कही गई बात ही न्याय है। क्योंकि सिर के बाल के सफ़ेद हो जाने से ही कोई मनुष्य वृद्ध नहीं कहा जा सकता, देवगण तरुण होने पर भी ज्ञानवान होने वालों को वृद्ध कहते हैं।
स्वायंभुव मन्वंतर में अंगिरा को ब्रह्मा के सिर से उत्पन्न बताया गया है। दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्री स्मृति का इनसे विवाह किया था। वैवस्वत मन्वंतर में ये शंकर के वरदान से उत्पन्न हुए और अग्नि ने अपने पुत्र के समान इनका पालन-पोषण किया। चाक्षुष मन्वंतर में दक्ष प्रजापति की कन्याएँ सती और स्वधा इनकी पत्नियाँ थीं। भागवत पुराण में स्यमंतक मणि की चोरी के प्रसंग में इनके श्रीकृष्ण से मिलने, शरशैया पर पड़े भीष्म पितामह के दर्शनों के लिए भी अपने शिष्यों के साथ जाने की कथा भी अंकित है। स्मृति ग्रंथों व महाभारत में अंगिरस स्मृति का उल्लेख मिलता है। उपनिषद में इनको ब्रह्मा का ज्येष्ठ पुत्र बताया गया है, जिन्हें ब्रह्म विद्या प्राप्त हुई। शौनक को इन्होंने विद्या के दो रूपों परा तथा अपरा से परिचित कराया था। इस प्रकार ऋग्वेद से लेकर पुराणों तक में एक नाम अंगिरा का उल्लेख होना यह सिद्ध करता है कि इस नाम की या तो कोई वंश परम्परा थी या कोई गद्दी। इसी कुल में भारद्वाज और गौतम भी हुए। यह कुल आग्नेय नाम से प्रसिद्ध था।
अथर्ववेद का प्राचीन नाम अथर्वानिरस है। इनके पुत्रों के नाम हविष्यत्, उतथ्य, बृहस्पति,बृहत्कीर्ति, बृहज्ज्योति, बृहद्ब्रह्मन् बृहत्मंत्र, बृहद्भास, मार्कंडेय और संवर्त बताए गए हैं। इनकी साथ कन्याओं -भानुमती, रागा (राका), सिनी वाली, अर्चिष्मती (हविष्मती), महिष्मती, महामती तथा एकानेका (कुहू) के भी उल्लेख प्राप्य हैं।नीलकंठ आदि वैदिक विद्वानों के अनुसार बृहत्कीत्यादि सब बृहस्पति के विशेषण हैं। आत्मा, आयु, ऋतु, गविष्ठ, दक्ष, दमन, प्राण, सद, सत्य तथा हविष्मान् इत्यादि को अंगिरस के देवपुत्रों की संज्ञा से अभिहित किया गया है। भागवत के अनुसार रथीतर नामक किसी निस्संतान क्षत्रिय को पत्नी से इन्होंने ब्राह्मणोपम पुत्र उत्पन्न किए थे। याज्ञवल्क्य स्मृति में अंगिरसकृत धर्मशास्त्र का भी उल्लेख है। अंगिरा की बनाई आंगिरसी श्रुति का महाभारत में उल्लेख हुआ है।