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04-04-2025 Vol 19

गौ पूजन की सजीव परंपरा

गोवर्धन पूजा के दिन वरुण, इंद्र, अग्नि आदि प्रकृति पूजा, अन्न पूजा, परिवार पूजा, पशुधन और संपत्ति आदि की पूजा की जाती है। गायों का श्रृंगार करके उनकी आरती की जाती है, और उन्हें फल, मिठाइयां खिलाई जाती हैं। गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की प्रतिकृति बनाकर उसकी पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा की जाती है। इसे अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है। यह सामाजिक रूप से एक सम्मिलित परिवार के मध्य आपसी प्रेम, प्रतिष्ठा, एकता और मेल-मिलाप की प्रधानता का दिन है।

4 नवम्बर 2023 को गोवर्द्धन पूजा

भगवान श्रीकृष्ण ने कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन इन्द्र का मानमर्दन कर गिरियज्ञ अर्थात गिरिराज पूजन किया था। और गोवत्स पूजन अर्थात गौ पूजन की सजीव परंपरा आरंभ की थी। वर्तमान में भी यह परंपरा जीवित है, और इसे गौ संवर्द्धन से संबंधित होने के कारण गोवर्द्धन पूजा के नाम से जाना जाता है। इसीलिए दीपावली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा किए जाने की पौराणिक परिपाटी है। वर्तमान में गोवर्धन पूजा के दिन वरुण, इंद्र, अग्नि आदि प्रकृति पूजा, अन्न पूजा, परिवार पूजा, पशुधन और संपत्ति आदि की पूजा की जाती है। गायों का श्रृंगार करके उनकी आरती की जाती है, और उन्हें फल, मिठाइयां खिलाई जाती हैं। गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की प्रतिकृति बनाकर उसकी पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा की जाती है। इसे अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है। यह सामाजिक रूप से एक सम्मिलित परिवार के मध्य आपसी प्रेम, प्रतिष्ठा, एकता और मेल-मिलाप की प्रधानता का दिन है।

उल्लेखनीय है कि श्रीकृष्ण को यूं ही षोडश कलायुक्त योगीश्वर श्रीकृष्ण नहीं कहा गया है। उनका सम्पूर्ण जीवन ही आपसी प्रेम, प्रतिष्ठा, सौहार्द, एकता, मेल- मिलाप हेतु जनकल्याण कारी कार्य को समर्पित है। और उनकी जीवन की हर कथा कुछ पृथक संदेश देती है, और उन सबमें कुछ न कुछ आध्यात्मिक तथ्य, गूढ रहस्य अवश्य छुपे हुए हैं। पौराणिक वर्णनों के अनुसार श्रीकृष्ण के शैशव काल में गोकुल में घटित घटना, यथा- पूतना वध, शकट विपर्यय, तृणावर्त, यमलार्जुन भंगी आदि उत्पातों के लगातार घटित होते रहने के कारण अज्ञात आशंका के डर से नंदादि गोकुलवासी गोकुल छोड़कर वृंदावन चले गए थे।

उस समय गोकुल में वृकोत्पाद अर्थात भेड़ियों का उत्पात अधिक बढ़ जाने के कारण गोपों ने वह स्थान छोड़ अधिक सुखप्रद व सुरक्षित स्थान वृंदावन में शरण लेना उपयुक्त समझा था। परंतु वृंदावन आने पर भी श्रीकृष्ण के साथ घटनाओं का तारतम्य बना ही रहा। वृंदावन में श्रीकृष्ण ने तीन असुरों का वध किया- वत्सासुर, वकासुर और अघासुर। वत्सासुर वत्स रूप में था, वकासुर पक्षी रूप में और अघासुर सर्प रूप में। गोपालकों के लिए अनिष्टकर जीव -जंतुओं को नाश कर देना उपयुक्त समझकर बलवान श्रीकृष्ण ने उनका नाश कर दिया। परंतु यह कथा न तो महाभारत में अंकित है, और न ही उसके अंत में अंकित खिल भाग हरिवंश में ही प्राप्य है। श्रीकृष्ण कथा के लिए प्रसिद्ध विष्णु पुराण में भी यह कथा नहीं है। लेकिन असुरों की इस कथा में तथ्य कुछ अवश्य हैं, जिनके कारण अन्य पुराणों में इनका वर्णन हुआ है।

उल्लेखनीय है कि प्रकाश अर्थ वाली वद् धातु से वत्स प्रकाश्यवादी अथवा निन्दक अर्थ  देता है। कौटिल्य अर्थ वाली वनक् धातु से बनकर वक् शब्द कुटिल शत्रु का द्योतक है। पाप अर्थ वाली अघ् धातु से बनकर अघ शब्द पापी का सूचक है। श्रीकृष्ण ने किशोरावस्था प्राप्त करने के पूर्व ही इन तीन प्रकार के शत्रुओं को पराजित कर दिया था। यजुर्वेद के माध्यनन्दिनी शाखा के 11/80 वें अग्निचयन मंत्र में शत्रु निपात के लिए प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि  हे अग्ने! जो हमारे अराति, द्वेषी, निंदक एवं जीघांसु हैं, उन चार प्रकार के शत्रुओं को भस्म करें। इस मंत्र में उपरोक्त तीन प्रकार के शत्रुओं के अतिरिक्त अराति अर्थात जो धन नहीं देते, अर्थात प्रवंचक के निपात का भी संकेत है।

महाभारत, पुराण आदि ग्रंथों में अंकित कथाओं से श्रीकृष्ण की महिमा ही ऐसी बनती है कि ब्रह्मा भी उसे समझने में असमर्थ प्रतीत होते हैं। भागवत पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने के लिए एक दिन ब्रह्मा ने अपनी माया से गायों को छिपा दिया, तो श्रीकृष्ण ने उनकी दूसरी सृष्टि ही कर डाली। एक बार श्रीकृष्ण ने शैवों के शिव के विषपान की भांति दावानल का ही पान कर लिया। श्रीकृष्ण की इस अग्निपान की कथा वैष्णवों में बहुत प्रचलित है। इसी प्रकार कालियदमन की कथा है, जो महाभारत में तो अंकित नहीं है, परंतु उसके अंत में अंकित हरिवंश और विष्णु पुराण में इसके सूत्र अवश्य है। इस अतिमनोहरी रूपक का विस्तार भागवत पुराण में हुआ है। यमुना के किसी हृद में कालिय नाग नामक विषधर का निवास था।। विष्णु पुराण में उसके फन तीन, हरिवंश में पाँच और भागवत पुराण में एक सहस्त्र फन बताए गए हैं। उसकी विष ज्वाला से यमुना के किनारे तक के तृणलता झुलस जाते थे।

इसीलिए वृन्दावनस्थ जीवों की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण जल में कूदकर और नाग को नाथकर उसके फन में चढ़ बाँसुरी बजाने लगे। कृष्णसलिला कालिंदी कालसरिता है। इसके आवर्तों में सर्प के समान प्रच्छन्न, कुटिल एवं विषपूर्ण मनुष्य के शत्रु रहते हैं। आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक उसके तीन फन हैं, अथवा अनर्थ मूल पाँच इंद्रियाँ उसके पाँच फन हैं। अथवा सहस्त्र फन असंख्य अमंगल हैं। श्रीकृष्ण अपने चरण कमलों में उनको दबाकर जब अभयबंशी बजाते हैं, तो मानव की आशा बंधती दिखाई देती है। इस कृष्ण सलिला काल सरिता के आवर्त के मध्य अमंगल भुजंग के मस्तक पर आरूढ़ होकर अभयवंशी वादन करने वाली पौराणिक कथा व रूप वर्तमान में अति पूजनीय है। गिरियज्ञ की कथा भी अत्यंत प्रसिद्ध है। गिरियज्ञ की यह कथा कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को होने वाली गोवर्द्धन पजा से संबंधित है। कथा के अनुसार गोपजनों के द्वारा वर्षांत में किए जाने वाले इंद्रयज्ञ को श्रीकृष्ण ने बंद कर दिया और उसके स्थान पर गोपूजन व गोवर्द्धन पर्वत पूजन का प्रारभ कर दिया।

इस समाचार को सुन इन्द्र ने अति क्रुद्ध होकर अतिवृष्टि से ब्रज को व्याकुल कर दिया, परंतु श्रीकृष्ण ने पर्वत को उठाकर गोपालकों को बचा लिया। पराजित होकर इन्द्र ने संधि कर ली। महाभारत के शिशुपाल वध प्रकरण में शिशुपाल के व्यंग्य में इस प्रसंग का कुछ संकेत है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को मूसलधार वर्षा से बचाने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उँगली पर उठाकर रखा और गोप-गोपिकाएँ उसकी छाया में सुखपूर्वक रहे। सातवें दिन भगवान ने गोवर्धन को नीचे रखा। और प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तभी से यह उत्सव अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा।

इस कथा के संभव -असंभव की बात को, जिसके लिए कुछ भी असंभव नहीं, जो अपनी इच्छामात्र से वर्षा कर और रोक सकता है, उस भगवान की लीला पर, उस इच्छामय की इच्छा पर छोड़कर सोचने पर इस कथा का मूल भाव यह प्रतीत होता है कि श्रीकृष्ण ने गोपों को इंद्रयज्ञ से हटाकर गिरियज्ञ में लगाया। इस कार्य- व्यापार पर विचार करने से से स्पष्ट होता है कि इस जगत का एक ही ईश्वर है, उससे भिन्न अन्य कोई देवता नहीं है। इन्द्र वर्षणे धातु से रक् प्रत्यय करने पर वर्षणकारी इन्द्र शब्द बनता है। परंतु इन्द्र अलग देवता नहीं है, बल्कि वह उसी ईश्वर की एक शक्ति है। वेदों में ईश्वर को भिन्न -भिन्न प्रकृति रूपों में स्मरण करके सूर्य, वरुण, अग्नि आदि प्राकृतिक पदार्थों के गुण, महत्व का वर्णन किया गया है। जिसके आधार पर प्राकृतिक पदार्थों से संबंधित इन मंत्रों के द्वारा ईश्वर की उपासना का प्रचलन हुआ।

कालांतर में वैदिक सत्य ज्ञान के सत्यार्थ से दूर होने के कारण समाज उपासना के वास्तविक अर्थ को भूलने लगा। द्वापर युग के अंत महाभारत काल तक तक इसकी विषम स्थिति दृष्टिगोचर होने लगी थी। यही कारण है की महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण को धर्म के वास्तविक अर्थ को समझाने की आवश्यकता आन पड़ी। गिरियज्ञ उस उपदेश का बालरूप है, प्राथमिक अवस्था है। ईश्वर सर्वभूतान्तरात्मा है, उसकी पूजा मेघ रूप में भी हो सकती है। पर्वत रूप में भी हो सकती है, और गोवत्स रूप में भी हो सकती है। मेघ, पर्वतादि जड़ पदार्थों के स्थान पर गोवत्स आदि परितोष ईश्वर पूजन का अधिक सजीव रूप ही है। गिरियज्ञ का मूल उद्देश्य यही है।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार गंगा की भांति गाय पवित्र होती है। गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है। लक्ष्मी के द्वारा सुख समृद्धि प्रदान किए जाने की भांति गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं। इनका बछड़ा खेतों को जोतकर उनमें अन्न  उगाता है। सम्पूर्ण मानव जाति के लिए पूजनीय और आदरणीय गौ के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोर्वधन की पूजा करते हुए इसके प्रतीक के रूप में गौ पूजन की परिपाटी है। मान्यता है कि गौ पूजन की सजीव परंपरा का वाहक दिवस गोवर्द्धन पूजा के दिन भगवान के रूप में माने जाने वाले गोवर्धन गिरि की पूजा अपने घर में करने से धन, धान्य, संतान और गोरस की वृद्धि होती है।

अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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