डीपसीक ने सस्ते में यह मॉडल इसलिए तैयार किया, क्योंकि उसने इसके लिए कम क्षमता के और पुराने मॉडल के चिप का इस्तेमाल किया। तो सवाल उठा है कि आधुनिकतम चिप के नाम पर जो महंगी कीमत एनविडिया जैसी अमेरिकी कंपनियां वसूल रही हैं, उनकी उपयोगिता क्या है। इसी सवाल ने शेयर बाजारों में सबसे ज्यादा उथल-पुथल मचाई है।….पूरी चर्चा का सार यह है कि चीन दुनिया में प्रचलित कहानियों को पलटने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ा है। इसी कारण इससे जोरदार झटके लगे हैं। मगर, आने वाले समय में संभव है कि ऐसे झटके रोजमर्रा की कहानी बन जाएं।
पहले सिलिकॉन वैली में सॉफ्ट इंजीनियर रह चुके और अब अमेरिका के अरबपति बिजनेसमैन मार्क एंड्रीसेन ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) मॉडल डीपसीक आर-1 को तकनीक युग का स्पुतनिक क्षण कहा है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने इसे सिलिकॉन वैली के लिए चेतावनी बताया है, हालांकि उन्होंने चीन में इतना सस्ता मॉडल के तैयार होने को अच्छी घटना कहा। डीपसीक ऐप के असर से अमेरिका के शेयर बाजार में मची उथल-पुथल तो अब बहुचर्चित घटना बन चुकी है। कहा गया है कि ये वो क्षण हो सकता है, जहां डॉटकॉम बबल के फटने जैसी परिघटना सामने आ जाए। संदर्भ साल हजार में 2000 इंटरनेट कंपनियों के शेयर भाव एवं बाजार मूल्य में पहले तेज बढ़ोतरी और फिर अचानक आई भारी गिरावट का है। क्या चिप एवं एआई कारोबार से जुड़ी ‘शानदार सात’ कही जाने वाली अमेरिकी टेक कंपनियों के लिए वही स्थिति पैदा होने वाली है, कयास इस सवाल पर लगाए गए हैं।
डीपसीक एआई ऐप के लॉन्च होने के बाद से अमेरिकी मीडिया में ऐसी टिप्पणियों और चर्चोओं की भरमार है।
इस ऐप की मुख्य रूप से इन खूबियों ने अमेरिकी एआई कंपनियों के लिए चुनौती पैदा की हैः
– चीनी कंपनी डीपसीक ने ये मॉडल सिर्फ 55 से 60 लाख डॉलर के खर्च से बना दिया। जबकि अमेरिका में तैयार चैटजीपीटी, जेमिनी या लामा लैंग्वेज मॉडल प्रत्येक कम से कम छह बिलियन डॉलर की लागत से बनाए गए।
– खुद डॉनल्ड ट्रंप ने इस चर्चा का उल्लेख किया कि सस्ते में तैयार ऐप उसी कुशलता से सेवाएं दे सकता है, तो फिर महंगी लागत की क्या जरूरत होगी।
– डीपसीक ने सस्ते में यह मॉडल इसलिए तैयार किया, क्योंकि उसने इसके लिए कम क्षमता के और पुराने मॉडल के चिप का इस्तेमाल किया। तो सवाल उठा है कि आधुनिकतम चिप के नाम पर जो महंगी कीमत एनविडिया जैसी अमेरिकी कंपनियां वसूल रही हैं, उनकी उपयोगिता क्या है। इसी सवाल ने शेयर बाजारों में सबसे ज्यादा उथल-पुथल मचाई है।
– चीनी कंपनी ने अपने मॉडल की तकनीकी बारीकियों और उसे तैयार करने की प्रक्रिया को ऑपन सोर्स में डाल दिया। यानी कोई भी उसे देख सकता है और चाहे तो उसकी नकल कर सकता है। इस तरह डीपसीक ने परदादारी और पेटेंट की पूरी धारणा पर ही चोट की है।
(https://x.com/profwolff/status/1884656000944250981
इस सिलसिले में डीपसीक कंपनी के सीईओ लियांग वेनफेंग की यह टिप्पणी गौरतलब हैः “जारी लीक को तोड़ देने वाली टेक्नोलॉजी के मामले में क्लोज्ड सोर्स अस्थायी किला है। यहां तक कि ओपनएआई के क्लोज्ड सोर्स नजरिए के बावजूद वह दूसरों को आगे बढ़ने से नहीं रोक पाया है। हमारा मूल्य हमारी टीम में निहित है, जो जानने-सीखने की प्रक्रिया के जरिए ज्ञान हासिल करती है और आगे बढ़ती है। हमारा असली किला है संगठन का निर्माण एवं निरंतर आविष्कार करने की संस्कृति। ओपन सोर्स में रख देने और दस्तावेजों को प्रकाशित करने से हमारा कोई नुकसान नहीं होता। तकनीक- विशेषज्ञों का उसका अनुकरण करना हमारी उपलब्धि है। ओपन सोर्स में ज्ञान को डालना व्यापारिक के बजाय सांस्कृतिक कदम अधिक है। कुछ देना सम्मान पाने का एक रूप है। इससे एक अनूठी संस्कृति तैयार होती है, जो प्रतिभाओं को आकर्षित करती है।”
दरअसल, यही नजरिया है, जिसने अमेरिका सहित दुनिया के दूसरे हिस्सों को हिला दिया है। और इसी संदर्भ में स्पुतनिक क्षण से डीपसीक के लॉन्च होने की तुलना ध्यान खींचती है। स्पुतनिक अंतरिक्ष में पहुंचा सबसे पहला यान था। चार अक्टूबर 1957 को जब सोवियत संघ इसे अंतरिक्ष में भेजने में सफल रहा, तो पूरी पूंजीवादी दुनिया हिल गई थी। तब तक उसे अहसास ही नहीं था कि कम्युनिस्ट सोवियत संघ तकनीक के मामले में इस हद तक आगे बढ़ चुका है- उस मुकाम तक जहां अभी वह भी नहीं पहुंचा है।
अब सोशलिस्ट व्यवस्था वाले एक दूसरे देश ने तकनीक के उस क्षेत्र में अनूठी उपलब्धि हासिल की है, जिस पर अभी तक सिर्फ अमेरिका का वर्चस्व माना जाता था। नतीजतन अमेरिकन कंपनियों ने धारणा बना रखी थी कि एआई कोई अद्भुत-सी चीज है, दो बड़ा निवेश, अत्यंत बारीक तकनीकी ज्ञान, ऊर्जा एवं जल की भारी खपत आदि की मांग करती है। ये सारे पहलू जुटाना किसी अन्य देश के वश में नहीं है। डीपसीक ने इसी धारणा को तोड़ डाला है। यह टेक युग का स्पुतनिक क्षण है या नहीं, इस पर अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन ऐसा अमेरिका में महसूस किया गया है, तो उसकी वजहें हैं।
वैसे तो पूरे पश्चिम, लेकिन खासकर अमेरिकी नजरिए में आत्म श्रेष्ठता का भाव इतना अधिक भरा होता है कि उसमें बाकी दुनिया में क्या सकारात्मक हो रहा है, उसे नजर नहीं आता। वरना, चीन में हुई यह प्रगति उन्हें इतनी ज्यादा नहीं चौंकाती! चीन क्रमिक रूप से उत्पादन शृंखला में चढ़ते हुए आधुनिक तकनीक में ना सिर्फ तेजी से पश्चिम की बराबरी कर रहा है, बल्कि कई मामलों में उसे पीछे भी छोड़ रहा है। इस बात के उदाहरण हाल में बहुतायत सामने आते रहे हैं।
मगर अमेरिकी नजरिए में उन सबको “चुराई गई तकनीक” से कुछ कदम की प्रगति भर माना गया है। जबकि चीन ने एआई और रोबोटिक्स के अलावा अक्षय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक कारों, हाइपरसोनिक तकनीक, 5.5जी आदि में अप्रतिम उपलब्धियां हासिल की हैं। जल्द ही विमान के बाजार में वह अमेरिका और यूरोप के वर्चस्व को चुनौती देने वाला है। और इन सबसे जुड़े उत्पादों में एक समान पहलू है- सबका बाकी जगहों पर तैयार होने वाली चीजों से सस्ता होना।
(https://x.com/NewRulesGeo/status/1884632937557094598)
चीन ने उत्पादन आपूर्ति शृंखला तैयार करने और फिर धीरे-धीरे उच्च तकनीक के क्षेत्र में प्रगति करने के लिए सशक्त बुनियादी ढांचा तैयार किया है। इसका बहुत बड़ा हिस्सा तंग श्याओफिंग के दौर में ‘सुधार एवं खुलेपन’ की नीति अपनाए जाने के पहले के काल में तैयार हो चुका था। अब चीन जिस मुकाम पर है, उसकी कुछ बानगी देखिएः
– अभी हाल में मशहूर नेचर मैग्जीन ने विज्ञान एवं शोध क्षमता की कसौटियों पर दुनिया भर के विश्वविद्यालयों की एक सूची जारी की, जिसमें पहले दस में से सात स्थान चीन के विश्वविद्यालयों को मिले।
– ऑस्ट्रेलियाई थिंक टैंक- ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट (ASPI) की पिछले साल जारी हुई रिपोर्ट के अनुसार आज की 64 सबसे प्रमुख तकनीकों में चीन 57 में सबसे आगे है।
– ब्रिटिश पत्रिका द इकॉनमिस्ट ने पिछले वर्ष जून में अपनी एक कवर स्टोरी में चीन में हो रही वैज्ञानिक प्रगति का ब्योरा छापा था। साथ ही उससे अमेरिका के लिए पेश आ रही चुनौतियों का भी जिक्र उसने किया था। (https://www.economist.com/leaders/2024/06/13/how-worrying-is-the-rapid-rise-of-chinese-science)
– अभी हाल में अमेरिकी पत्रिका फॉरेन पॉलिसी ने एक विश्लेषण इस विषय पर छापा कि बड़ी तकनीकों के मामले में चीन ने क्या सही कदम उठाए। इसकी एक पंक्ति गौरतलब हैः ट्रंप के विपरीत शी जिनपिंग यह समझने में सफल रहे हैं कि बड़े कारोबारियों का नया वर्ग देश के राजनीतिक सिस्टम का अपहरण करने में सक्षम हो गया है। इस वाक्य का निहितार्थ यह है कि चीन ने कारोबार जगत पर नियोजन और राज्य का नियंत्रण बनाए रखा है, जबकि अमेरिका ने उसे खत्म कर दिया। आज जो सूरत बनी है, उसमें यह एक निर्णायक पहलू है। (https://foreignpolicy.com/2025/01/24/what-china-got-right-about-big-tech/)
ध्यान देः अमेरिकी टेक सेक्टर और मीडिया की चर्चाओं में इसी प्रश्न पर सबसे ज्यादा आश्चर्य व्यक्त किया गया कि डीपसीक ने आर-1 को इतनी कम लागत में कैसे तैयार कर लिया? अमेरिका में किसी उत्पादन के लिए जिस पैमाने पर लागत की जरूरत पड़ती है, उसके आदी लोगों के लिए यह हैरत लाजिमी है। लेकिन यह दरअसल, एक तरफ पूरी तरह निजीकृत और दूसरी तरफ राज्य नियोजित अर्थव्यवस्था का फर्क है। यह मुनाफे की भावना से प्रेरित निजीकृत अर्थव्यवस्था और सामूहिक उद्देश्य से प्रेरित अर्थव्यवस्था का अंतर है।
अचंभित विशेषज्ञों ने चीन की अर्थव्यवस्था के स्वरूप एवं वहां पहले तैयार बेहतरीन गुणवत्ता के अन्य उत्पादों की आर्थिकी पर नजर रखी होती, तो शायद उन्हें एआई के क्षेत्र में चीन की ताजा उपलब्धि से स्पुतनिक क्षण जैसा झटका नहीं लगता।
मुश्किल यह है कि पश्चिम और पश्चिमी मीडिया के प्रभाव में अपनी राय बनाने वाले दुनिया के अन्य हिस्सों के लोग भी अपने बनाए नैरेटिव के घेरे में बंधे हुए हैं। चीनी अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है, चीन की सोशलिस्ट व्यवस्था जल्द ही ढहने वाली है, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सख्त शासन से तहत वहां के लोग दुखी हैं, आदि जैसी कहानियां उसी नैरेटिव का हिस्सा रही हैं। अपनी कसौटी पर दूसरी तरह की व्यवस्था को मापने के इस नजरिए के लिए 1957 में हासिल हुई उपलब्धि पर यकीन करना कठिन हुआ था और आज भी हुआ है।
आखिर ये विशेषज्ञ इसी सोच के दायरे में पले-बढ़े हैं कि मुनाफा कमाने की प्रेरणा एवं पूंजीवादी उद्यमशीलता के बिना आविष्कार नहीं हो सकते हैं। कम्युनिस्ट व्यवस्था अपने-आप में अकुशल और अभावग्रस्त होती है, यह कहानी भी इस सोच का हिस्सा रही है।
चीन कम्युनिस्ट व्यवस्था नहीं है, ना ही सोवियत संघ था। अधिक से अधिक से यही कहा जा सकता है कि दोनों जगहों पर कम्युनिस्ट व्यवस्था की तरफ जाने के प्रयोग हुए हैं। सोवियत संघ ने अपनी तत्कालीन व्यवस्था को समाजवाद कहा था, चीन ने इसे चीनी प्रकृति का समाजवाद कहा है। बाजार का अस्तित्व मानव विकास के हर दौर में रहा है। हर सिस्टम में इसकी मौजूदगी रही है। मगर यह अलग-अलग रूपों में मौजूद रहा है। सोवियत संघ में यह अत्यंत नियंत्रित था। चीन में जिस रूप में यह मौजूद है, उसके लिए नियोजित बाजार शब्द कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। वैसे चीन अपनी व्यवस्था को मार्केट सोशलिज्म कहता है।
यह एक अलग किस्म का बाजार है। 1984 में, जब अभी सोशलिस्ट चीन में सुधार और खुलेपन के युग का शुरुआती दौर ही था, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन सर्वोच्च नेता तंग श्याओपिंग ने कहा था,
‘यह कहना गलत होगा कि बाजार सिर्फ पूंजीवादी समाज में ही होते हैं- इसका अस्तित्व सिर्फ पूंजीवादी बाजार अर्थव्यवस्था में होता है। हम समाजवाद के तहत बाजार अर्थव्यवस्था को विकसित क्यों नहीं कर सकते? बाजार विकसित करने का अर्थ पूंजीवाद का अनुपालन नहीं है। नियोजन को अपनी अर्थव्यवस्था का आधार बनाए रखते हुए हम भी बाजार अर्थव्यवस्था की शुरुआत कर रहे हैं। लेकिन यह समाजवादी बाजार होगा।’
डीपसीक की हासिल हुई उपलब्धि पर विचार करते हुए उपरोक्त कथन इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि आज उत्पादन क्षमता, मानव विकास सूचकांक, विज्ञान एवं तकनीक आदि के क्षेत्रों में प्रगति और इन सबके लाभ के अपेक्षाकृत अधिक न्यायपूर्ण वितरण के मामले में समाजवादी बाजार अर्थव्यवस्था हस्तक्षेप मुक्त खुली बाजार अर्थव्यवस्था को मात देती दिख रही है।
अमेरिका, अन्य पश्चिमी देशों, और आर्थिक प्रबंधन के मामले में उनकी राह पर चल रहे अन्य देशों को लगे ताजा झटके का राज़ यही है। अमेरिका के टेक अभिजात्य के लिए इस बात को गले उतारना मुश्किल नहीं होता कि चीन ने भी उनके समान एक जेनरेटिव एआई ऐप को बना लिया है। मगर उनके लिए यह स्वीकार करना कठिन हुआ है कि चीन में ऐसा उनके तौर-तरीकों और उनके नैरेटिव्स के विपरीत जाते हुए किया गया है। यह वैकल्पिक रास्ते का अनुकरण अब दूसरों ने भी किया, तो उसका सीधा मतलब हाई टेक क्षेत्र में पश्चिमी कंपनियों के अकूत मुनाफे के स्रोत में सेंध लगना होगा।
वैसे पश्चिमी सत्ता के कर्ता-धर्ताओं की चिंता इससे भी आगे है। अमेरिका में तैयार एआई जेनरेटिव ऐप राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक घटनाओं पर जो जवाब देते हैं, उन पर पश्चिमी नजरिए एवं हितों का साया होता है। इस तरह पुराने मीडिया की तरह नई तकनीक के साथ सामने आए माध्यम भी दुनिया का दिमाग नियंत्रित करने का माध्यम बने रहे हैं। इस बीच अब चीन के ऐप लोकप्रिय हुए, तो पश्चिमी नैरेटिव्स का वर्चस्व टूटेगा।
टिकटॉक के मामले में देखा गया कि इजराइल के हाथों गज़ा में हुए मानव संहार के बारे में इस वीडियो ऐप पर वैकल्पिक कहानियां लोगों को उपलब्ध हुईं। इससे अमेरिकी सत्ता तंत्र में गहरी व्यग्रता फैली। टिकटॉक पर रोक या जबरन उसे अमेरिकी कंपनी के हाथ बिकवाने की चली मुहिम के पीछे यह भी अहम पहलू रहा है। अब अगर चीन के जेनरेटिव एआई ऐप भी लोकप्रिय होते हैं, तो घटनाओं की सूचना के साथ-साथ उनके बारे में वैकल्पिक समझ एवं परिप्रेक्ष्य भी लोगों को उपलब्ध होगी।
यह अकारण नहीं है कि डीपसीक के बारे में पश्चिम मीडिया में हुई रिपोर्टिंग में इस पहलू का अनिवार्य उल्लेख हुआ है कि यह ऐप ताइवान या चीन से संबंधित मुद्दों पर अलग सूचना देता है। मगर इन माध्यमों में कभी यह जिक्र नहीं किया गया कि अमेरिकी ऐप भी पश्चिमी नजरिए एवं हितों के मुताबिक समझ ही यूजर्स को देते हैं।
फिर यह भी गौरतलब है कि ओपनएआई कंपनी की तरफ से पेश चैटजीपीटी की खास सेवाएं लेने के लिए ग्राहकी शुल्क देकर रजिस्ट्रेशन करना अनिवार्य है। जबकि डीपसीक आर-1 में सारी सेवाएं मुफ्त में उपलब्ध हैं। इसी तरह मुफ्त सेवाएं देने के नजरिए से चीनी कंपनियां आगे बढ़ीं, तो फिर पश्चिमी टेक अभिजात्य के मुनाफे का क्या होगा! इसी चिंता ने वहां के शेयर बाजारों में उथल-पुथल मचाई है।
तो इस पूरी चर्चा का सार यह है कि चीन दुनिया में प्रचलित कहानियों को पलटने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ा है। इसी कारण इससे जोरदार झटके लगे हैं। मगर, आने वाले समय में संभव है कि ऐसे झटके रोजमर्रा की कहानी बन जाएं।