44 बरस में हुए इन 18 आयोजनों में हुई कार्यवाही का मेरा तजु़र्बा कहता है कि अहमदाबाद में हो रहे कांग्रेस के 19वें शिखर सम्मेलन के ऐलान भी फ़ौरी तौर पर ख़ासे चौंकाने वाले होंगे। मुझे राहुल गांधी की नेकनीयती पर कोई शक़ नहीं है, मगर कांग्रेस की अहमदाबादी-गुलेल से इस बार होने वाली प्रस्तर-वर्षा कितनी दूरी तय करेगी, यह दरअसल उन के सिपाहसालारों की सद्इच्छा पर निर्भर करेगा। मैं पूरी तरह आश्वस्त हूं कि राहुल तो अपना पाशुपतास्त्र अब धारण कर चुके हैं। उन्होंने अगले ढाई साल में होने वाले 10 राज्यों के विधानसभा चुनावों की तैयारियों का मानचित्र क़रीब-क़रीब तैयार कर लिया है।
आज से दो दिन बाद, दो दिन के लिए, गुजरात के अहमदाबाद में कांग्रेस महासमिति का 86वां अधिवेशन शुरू होगा। अंतिम दिन बुधवार को इस अधिवेशन से कौन-सी शंखध्वनि निकलेगी, सुनना-देखना बाक़ी है। मैं कांग्रेस के 78वें महाधिवेशन से अब तक हुए सभी महाधिवेशनों, अधिवेशनों, विशेष अधिवेशनों और चिंतन-मंथन शिविरों की कार्यवाही का चश्मदीद रहा हूं। बंबई में हुआ 78वां अधिवेशन कांग्रेस के जन्म-शताब्दी वर्ष का आयोजन था। उस के बाद 3 महाधिवेशन, 4 अधिवेशन, 7 विशेष अधिवेशन और 3 चिंतन-मंथन शिविर आयोजित हो चुके हैं।
44 बरस में हुए इन 18 आयोजनों में हुई कार्यवाही का मेरा तजु़र्बा कहता है कि अहमदाबाद में हो रहे कांग्रेस के 19वें शिखर सम्मेलन के ऐलान भी फ़ौरी तौर पर ख़ासे चौंकाने वाले होंगे। मुझे राहुल गांधी की नेकनीयती पर कोई शक़ नहीं है, मगर कांग्रेस की अहमदाबादी-गुलेल से इस बार होने वाली प्रस्तर-वर्षा कितनी दूरी तय करेगी, यह दरअसल उन के सिपाहसालारों की सद्इच्छा पर निर्भर करेगा।
मैं पूरी तरह आश्वस्त हूं कि राहुल गांधी तो अपना पाशुपतास्त्र अब धारण कर चुके हैं। उन्होंने अगले ढाई साल में होने वाले 10 राज्यों के विधानसभा चुनावों की तैयारियों का मानचित्र क़रीब-क़रीब तैयार कर लिया है। 780 ज़िलों में से तक़रीबन 700 के कांग्रेसी ज़िला-अध्यक्षों को दिल्ली बुला कर राहुल गांधी ने तीन दिनों तक तफ़सील से उन की बातें सुनीं।
वे ज़िला इकाइयों को पार्टी की केंद्रीय कार्यसमिति के समकक्ष अधिकारसंपन्न बनाने का मन बना चुके हैं। उन्होंने अपना यह इरादा साफ़ कर दिया है कि चुनावों में उम्मीदवारों के नाम तय करते वक़्त संबंधित ज़िले के अध्यक्ष को भी केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में आमंत्रित किया जाएगा। इस पर कुनमुनाने वाले कुछ वरिष्ठ नेताओं को राहुल झिड़की भी पिला चुके हैं।
2027 के अंत तक बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, केरल पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात के अलावा मणिपुर और पुदुचेरी में विधानसभा चुनाव होंगे। बिहार में इसी साल के आख़ीर में चुनाव हैं। बंगाल, असम, केरल और पुदुचेरी में अगले बरस की गर्मियों में चुनाव होंगे। पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मणिपुर के चुनाव भी ‘27 की मई से पहले हो जाएंगे और उस साल के अंत में गुजरात भी मत-कुरुक्षेत्र में चला जाएगा।
गुजरात को तो राहुल ने ढाई साल पहले ही इतना ताताचट कर दिया है कि कांग्रेस के विरोधियों के तलुवे अभी से जलने लगे हैं और ढुलमुल कांग्रेसी भी ताताथैया कर रहे हैं। पिछले महीने राहुल गांधी ने गुजरात में पूरी तरह बेलाग हो कर कह दिया कि कांग्रेस के कई कद्दावर लोग भारतीय जनता पार्टी से मिले हुए हैं और लगता है कि 40-50 लोगों को पार्टी से निकलना पड़ेगा।
राहुल गांधी के ये तेवर देख कर मुझे लगता है कि अहमदाबाद में हो रहा अधिवेशन कई मायनों में संग-मील साबित होने वाला है। इसलिए और भी कि कांग्रेस के 139 साल के इतिहास में अहमदाबाद में इस से पहले महज़ दो बार ही पार्टी-अधिवेशन हुए हैं। अहमदाबाद में पहला अधिवेशन 122 साल पहले 1902 के दिसंबर महीने में हुआ था और दूसरा अधिवेशन 1921 के दिसंबर में। यानी अहमदाबाद में तीसरी बार कांग्रेस का अधिवेशन 103 साल बाद हो रहा है।
गुजरात राज्य में होने वाला भी यह पांचवा ही अधिवेशन है। 117 साल पहले दिसंबर 1907 में सूरत में कांग्रेस अधिवेशन हुआ था। मगर उसे तकनीकी तौर पर कांग्रेस अधिवेशन मानें-न-मानें, तय करना ज़रा मुश्क़िल है। इसलिए कि गरम दल के लाल, बाल और पाल यानी लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल तथा नरम दल के सुरेंद्र नाथ बनर्जी और गोपाल कृष्ण गोखले के बीच ज़द्दोजहद में मामला ऐसा फंस गया था कि सूरत के अधिवेशन को तकनीकी तौर पर निलंबित घोषित कर दिया गया था।
बाद में भावनगर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, 1961 के दिसंबर में। तो 63 बरस से कांग्रेस का कोई अधिवेशन गुजरात राज्य में भी नहीं हुआ है। इन 63 साल में से 30 साल से तो गुजरात में कांग्रेस की सरकार भी नहीं बन पाई है। 4 मार्च 1990 के बाद से गुजरात में कांग्रेस की गोद सूनी पड़ी है। माधवसिंह सोलंकी वहां कांग्रेस के अब तक के अंतिम मुख्यमंत्री थे।
राहुल गांधी का गुजरात में कांग्रेस की संभावनाओं पर आकलन
राहुल गांधी का मानना है कि गुजरात में हर दो मतदाताओं में से क़रीब-क़रीब एक कांग्रेस का समर्थन करता है और अगर कांग्रेस अपने वोट पांच फ़ीसदी भी बढ़ा ले तो भारतीय जनता पार्टी गुजरात में हार जाएगी। राहुल गांधी का कहना है कि अगर कांग्रेस ने तेलंगाना में इस बार अपने वोट 22 प्रतिशत बढ़ा लिए तो गुजरात में 5 प्रतिशत वोट क्यों नहीं बढ़ाए जा सकते?
राहुल गांधी की दलील में दम है। गुजरात में कांग्रेस का वोट 40 प्रतिशत के आसपास है। आप पूछ सकते हैं कि 2022 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में तो कांग्रेस को सवा 27 प्रतिशत वोट ही मिले थे? मगर ध्यान रखिए कि ऐसा आम आदमी पार्टी की बदनीयती की वज़ह से हुआ था। भाजपा के उम्मीदवारों की जीत आसान बनाने के लिए अरविंद केजरीवाल ने गुजरात में कांग्रेस के लिए बेहतर माने जाने वाले निर्वाचन क्षेत्रों में वोट काटने के लिए चुन-चुन कर अपने उम्मीदवार उतारे थे।
आम आदमी पार्टी 2022 में 12.9 प्रतिशत वोट ले गई और यह कारण रहा कि कांग्रेस को 27.3 प्रतिशत वोट ही मिल पाए। वरना 2012 में कांग्रेस को 38.9 और 2017 में 41.4 प्रतिशत वोट मिले थे। भाजपा को पिछले विधानसभा चुनाव में 50 फ़ीसदी से कुछ ज़्यादा वोट ज़रूर मिले थे, मगर राहुल का यह आकलन एकदम सही है कि अगर कांग्रेस अपने मतों में 5 फ़ीसदी का भी इज़ाफ़ा कर ले तो भाजपा के बांस उलटे वडनगर को लद जाएंगे।
राहुल को यह भी जानते ही हैं कि पिछले चुनाव में कांग्रेस का सब से अच्छा स्ट्राइक रेट उत्तर गुजरात में था – 19.2 प्रतिशत। दूसरे क्रम पर केंद्रीय गुजरात में था – 7.9 प्रतिशत। तीसरे क्रम पर था सौराष्ट्र-कच्छ में 5.6 प्रतिशत। और, कांग्रेस का सब से खराब प्रदर्शन रहा था दक्षिण गुजरात में – जहां स्ट्राइक रेट सिर्फ़ 2.9 प्रतिषत था।
आम आदमी पार्टी की वज़ह से कांग्रेस को सब से ज़्यादा नुकसान हुआ सौराष्ट्र-कच्छ के इलाके में और दक्षिण गुजरात में ही हुआ था। सौराष्ट्र-कच्छ में आम आदमी पार्टी का स्ट्राइक रेट कांग्रेस से काफी ज़्यादा था और दक्षिण गुजरात में यह रेट बराबरी पर था।
एक ज़माने में गुजरात के 80 प्रतिशत विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल करने वाली कांग्रेस अब महज़ 9 प्रतिशत सीटों पर ही जीत हासिल कर पा रही है। राहुल जानते हैं कि 2022 के चुनाव में 182 सदस्यों वाली गुजरात विधानसभा में कांग्रेस के जो 17 विधायक जीत कर आए थे, वे 12 कैसे रह गए? राहुल को यह अहसास है कि पांच फ़ीसदी वोट तभी बढ़ सकते हैं, जब कांग्रेस उन नेताओं को बाहर खदेड़ दे, जिन की धड़कनों में, लालच के कारण या डर के मारे, नरेंद्र भाई मोदी और अमित भाई शाह बसे हुए हैं।
राहुल समझ गए हैं कि अगर इस में कोताही हुई तो घर के भेदी जिस तरह पिछले कई दशकों से कांग्रेस की नैया को साबरमती में डुबो रहे हैं, 2027 के दिसंबर में भी उसे नर्मदा मैया में तिरोहत कर देंगे। इसलिए राहुल खुला खेल अहमदाबादी खेलने पर उतर आए हैं।
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