औरंगजेब के क्रूरता में किए-धरे को अपन हिस्ट्री तो मान सकते हैं लेकिन क्या इससे औरंगजेब के समयकाल का इतिहास जान सकते हैं? फिर क्यों, कैसे और किस लिए छह-सौ साल पहले के अतीत को उठा कर आज के वर्तमान को बिगड़ने दे रहे हैं?
जो लिखा-गढ़ा जाता है वह हिस्ट्री हो जाता है और जो पढ़ा-समझा जाता है वह इतिहास होता है। ऐसा अपना मानना है। हिस्ट्री के गिने-चुने पात्र होते हैं मगर इतिहास में पूरा समाज पात्रता निभाता है। इसलिए हिस्ट्री कुछ एक सत्ताधारियों का औजार बनता है तो इतिहास समयकाल की सनातनी समझ। साधारण तौर पर अपन हिस्ट्री का हिंदी में अनुवाद इतिहास से ही कर देते हैं। हिस् स्टोरी (उनकी कहानी) को अपन उस समय की हिस्ट्री मान लेते हैं। और इतिहास (यह जो हुआ) उसकी खोज भी हिस्ट्री से ही करते हैं। लेकिन क्या अपने पढ़ने-लिखने, सोचने-समझने व विचार-विवेक करने में इस बेमिज़ाज अनुवाद की कमजोरी नहीं झलकती?
इतिहास संस्कृत से लिया गया शब्द है। इसलिए इसका संधि-विच्छेद हो सकता है। अगर अंग्रेजी के हिस्ट्री का अगर कोई संधि-विच्छेद करना हो तो हिस् + स्टोरी ही होगा। बनावटी बुद्धिमता भी संधि-विच्छेद करने में असमर्थ रही। और यह सिर्फ हिंदी या अंग्रेजी का अंतर भेद ही नहीं रहा है बल्कि इसका अनुवाद में ही अनर्थ भी हुआ है। तो क्या अपन ऐसे अनुवाद पर भरोसा कर के शब्दों के सही अर्थ निकाल सकते हैं? औरंगजेब के क्रूरता में किए-धरे को अपन हिस्ट्री तो मान सकते हैं लेकिन क्या इससे औरंगजेब के समयकाल का इतिहास जान सकते हैं? फिर क्यों, कैसे और किस लिए छह-सौ साल पहले के अतीत को उठा कर आज के वर्तमान को बिगड़ने दे रहे हैं?
कार्ल मार्क्स के साहित्य को नए सिरे से खोजने में लगे ब्रिटिश राजनीतिक सिद्धांतकार एलेक्स कैलिनिकोस का मानना है कि “इतिहास का सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत दृष्टिकोण सबसे बचकाना भी है।” आज अपने ही यहां यह बताया जाता है कि भारत की हिस्ट्री कम्युनिस्ट विचारधारा के इतिहासकारों ने लिखी है। जिसके कारण अपने सनातन को इतिहास में कोई जगह नहीं मिल पायी। लेकिन हिस्ट्री रचे जाने के स्वरूप को समझें तो अतीत का जानना, सिर्फ आज को अच्छा या बेहतर बनाने भर के लिए ही हो सकता है। मगर क्या आज का अच्छा या बेहतर होना अतीत को कुरेदते रहने भर से हो सकता है? क्योंकि अतीत पर न तो अति गर्व किया जा सकता है और न ही उसके प्रति शर्म में जीवन बिताया जा सकता है।
हिस्ट्री को हर कभी जगाने वाले अपने प्रधानमंत्री ने संसद में जताया कि महाकुंभ ने शानदार पैमाने पर राष्ट्रीय चेतना का पुनर्जागरण किया। जिसकी तुलना उनने स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण, 1857 की क्रांति, भगत सिंह की शहादत, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के ‘दिल्ली चलो’ आवाहन और महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह के लिए ‘डांडी यात्रा’ से ही कर दिया। इतिहास का ऐसा बेमेल परिदृश्य क्यों बेहुदा तक बचकाना नहीं माना जाए? यहां तक तो सही है कि उत्सव ही समाज में उत्साह भरते हैं। लेकिन अपने वर्तमान को सब के अतीत से जोड़ने की भूल भी दर्शाते हैं। क्योंकि भारत या ऐसे किसी भी समाज की ‘एकता की शक्ति’ तो उसके वर्तमान के व्यवहार में ही प्रदर्शित होती है। अपना सनातन या इतिहास न तो वीभत्स है न ही भीड़तंत्र की हिस्ट्री ही हो सकता है।
इसी दौरान औरंगज़ेब की कब्र को लेकर महाराष्ट्र में सत्ता संघर्ष का भीड़तंत्र चल रहा है। महाराष्ट्र राज्य की सभी नगर नियमों के टलते आ रहे चुनाव भी होने हैं। नागपुर के एक छोटे इलाके में जुटी हिंदू-मुस्लिम भीड़ में आपस में नारेबाजी और झड़प हुई। पुलिस पर पत्थरबाजी चली। कानून तोड़ कर गाड़ियों में आग लगाई गयी। मीडिया ने दिखाया कि नागपुर में दंगे हुए। शहर में कर्फ्यू लग गया। अगर अतीत से आज अपने को यही सीखना है तो आने वाली पीढ़ियां में क्या सनातन की सही समझ रह पाएगी? अतीत और आज के बीच तुलना करने पर, हम कह सकते हैं कि अतीत बीता हुआ समय है। अतीत से निकली सीख को, विवेक द्वारा आज में उपयोग करने पर ही स्वस्थ भविष्य गढ़ा जा सकता है। वर्तमान में विवेक से जीना ही भविष्य को भी व्यवस्थित करता हैं।
आध्यात्म के महाकुंभ ने अगर राष्ट्रीय चेतना को जगाया है तो वही जागरूकता ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की एकात्मता में भी दिखनी चाहिए। तभी वह भारत की एकता के लिए अमृत हो सकता है। अध्यात्म अगर अतीत को प्रकाश में लाता है तो महाकुंभ से समाज का प्रबोध जरूर जागा होगा। और समाज का जागना ही सत्ता के लिए खतरे की घंटी है।