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05-04-2025 Vol 19

कहानी कला की मास्टरक्लास है ‘एडोलसेंस’

समाज को समझना ये ज़रूरी है कि तकनीकी विकास होते रहेंगे  और उपभोक्ताओं के ट्रेंड्स बदलते रहेंगे, यहां सबसे ज़रुरी है हमें अपने बच्चों में ऐसे मूल्य डालना कि उनके डिसिजन मेकिंग में संतुलन और मज़बूती हो। बच्चों और टीनएजर्स को अब ज्ञानऔर उपदेशदेने वाले पेरेंट्स नहीं, बल्कि उनको प्यार और एम्पथी से समझ कर इमोशनल हॉट-स्पॉट शेयर करने वाले दोस्त चाहिए। बाक़ी वो ख़ुद संभाल लेंगे।  एडोलसेंस‘, स्टोरीटेलिंग की एक ज़रूरी मास्टरक्लासहै। देख लीजिएगा।  

सिने-सोहबत

सिनेमा हो या सीरीज़, दिल तक तभी उतर सकती है जब फ़िल्मकार उसमें ज़िंदगी की हक़ीक़त के साथ-साथ उसे बिना लाग लपेट के परोसने की हिम्मत दिखा सकें। आज के सिने-सोहबत में हाल ही में नेटफ़्लिक्स पर चार एपिसोड्स में आई वेब सीरीज़ है, ‘एडोलसेंस’, जो सही मायनों में दर्शकों को झकझोर कर रख देती है। ये किसी भी दूसरे टीनएज क्राइम ड्रामा से काफी अलग है। ‘एडोलसेंस’ अंग्रेज़ी में किशोरावस्था, यानी उस उम्र को कहते हैं, जिसमें बच्चे अपनी आगे की ज़िंदगी को जीने के लिए कई तरह की लाइफ स्किल्स सीख रहे होते हैं। भावनात्मक स्तर पर भी ये स्टेज काफ़ी संवेदनशील और मुश्किलों से भरा होता है। साथ ही सोशल मीडिया के दौर ने इस स्टेज की मुश्किलें बढ़ाने में कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ी है।

‘एडोलसेंस’ की कहानी एक 13 साल के बच्चे के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसके ऊपर ये इलज़ाम है कि उसने अपने साथ पढ़ने वाली एक लड़की का कत्ल कर दिया है। शो के पहले ही सीन में पुलिस हाथों में गन लेकर एक घर में घुसती है। घर का दरवाजा तोड़ा जाता है और 13 साल के इस बच्चे को गिरफ्तार कर लिया जाता है। मामला जुवेनाइल है, ज़ाहिर है ऐसे में बच्चे के साथ उसके माता-पिता का होना भी जरूरी है। भले ही बच्चे पर संगीन आरोप लगा है लेकिन नाबालिग होने की वजह से उसे पुलिस स्टेशन लाकर उसके अधिकारों के बारे में बताया जाता है। उसके पिता साथ आते हैं और उन्हें एक वकील भी दिया जाता है। शो में कहानी भले ही सरल है, लेकिन जिस तरह से इसे प्रस्तुत किया गया है, उसमें इतनी लेयर्स हैं कि दर्शकों का दिमाग घूम जाता है। हर परत सही समय पर खुलती है और दिखाया जाता है कि कैसे कानून, पुलिस, कोर्ट और वकील आपसी तारतम्यता से इस तरह के केस पर पूरे संतुलन से अपना-अपना काम करते हैं। ‘एडोलसेंस’ के लेखक हैं जैक थोर्ने और निर्देशक हैं फ़िलिप बरनतिनि।

शो के चारों एपिसोड्स एक से सवा घंटे के हैं। अपनी संवेदनशील कथ्य के अलावा इस शो की चर्चा इसकी रोचक शिल्प को लेकर भी हो रही है। इस शो का हर एपिसोड सिंगल लॉन्ग शॉट है, जिसे सिनेमाई भाषा में कंटीन्यूअस शॉट भी कहा जाता है, यानी पूरे शो के हर एपिसोड में कैमरा जैसे शुरू होता है वैसे ही चलता जाता है। बिना किसी कट के लॉन्ग शॉट में पूरा एक-सवा घंटे के सभी एपिसोड्स निकल जाते हैं। ये दिखने में जितना आसान लगता है, एक्टिंग और सिनेमा की नज़र से उतना ही मुश्किल काम है।

इस तरह के शॉट के अलग फायदे होते हैं। ये ऐसा है, जैसे आप अपनी आंखों से कोई कहानी घटते देख रहे हैं और उसमें कोई ब्रेक नहीं है। ऐसे शॉट से कहानी और दर्शक में कनेक्ट बढ़ाया जाता है। ‘एडोलसेंस’ की स्क्रीनप्ले और कहानी इतनी मंझी हुई है कि आप एक पल के लिए भी अपनी नजरें हटा नहीं पाएंगे।

वैसे तो इस शो के चारों एपिसोड्स एक से बढ़ कर एक हैं लेकिन इसका थर्ड एपिसोड सबसे दमदार है। इस एपिसोड में एक सीन आता हैं, जहां जैमी मिलर यानी वो बच्चा जिस पर कत्ल का आरोप है एक साइकॉलोजिस्ट से बात कर रहा है। सेट पर जैमी का किरदार निभाने वाले एक्टर ओवेन कूपर ने इस एक लॉन्ग शॉट में जिस तरह से एक्टिंग की है वो दर्शकों की कल्पना से कोसों दूर है। धड़कनें बढ़ जातीं हैं। ओवन के चेहरे पर जिस तरह के एक्सप्रेशंस आते हैं और जैसे उन्होंने हर बदलते एक्प्रेशन को परफॉर्म किया है, ये अपने आप में एक मास्टरक्लास है। ये पूरा एपिसोड भी सिंगल शॉट है, यहां साइकॉलोजिस्ट और जैमी के बीच बातचीत हो रही है। ये सीन इतना जोरदार और हेवी हो जाता है कि जैसे उनकी बातचीत खत्म होने के बाद साइकॉलोजिस्ट गहरी सांस लेती हैं वैसे ही दर्शकों को भी राहत महसूस होती है।

शो का अंत काफी इमोशनल है। शो में जैमी के पिता एडी मिलर का रोल निभाने वाले एक्टर स्टीफन ग्राहम का एक एक सीन हृदयविदारक है। स्टीफन एक बेहद उम्दा कलाकार हैं और ये बात पूरे शो में बखूबी दिखती है। शो के आखिरी एपिसोड में एडी अपनी पत्नी से कहते हैं कि आखिर कोई भी मां-बाप ये 24 घंटे कैसे देख सकते हैं कि उनका बच्चा अपने कमरे में दरवाजा बंद करके क्या देख रहा है? या फिर आज के जेनरेशन में बच्चे इंस्टाग्राम पर किस तरह के स्लैंग्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और उनका क्या मतलब है? आखिर कैसे किसी पिता को पता लगेगा कि वो एक अच्छे पिता हैं भी या नहीं? ये और उनका ब्रेकडाउन सीन आपको अंदर से इतना खाली कर देगा कि आप बस बिलख कर रह जाएंगे, लेकिन बिलकुल असहाय सिवाए ये सोचने के आखिर गलती किसकी है?

मेंटल हेल्थ, किशोरावस्था, बूलिंग, ख़ुदकुशी और अपराध पर ये इतना शानदार शो है कि ये कई दिनों तक दर्शकों को झकझोरता रख सकता है। ‘एडोलसेंस’ देखने से ऐसा अहसास हुआ जो कई बार होता है। उसका समाधान बस किसी के हाथ में नहीं होता। हम कई बार अनजाने में किसी को इतना हर्ट करते रहते हैं कि वो इंसान जब कुछ बड़ा कदम उठा लेता है तब हमें पता चलता है। कई बार किसी के जाने के बाद इस बात का अहसास होता है कि क्या हमारा ऐसा कदम उठाना उस शख्स की जान बचा सकता था, या किसी अनहोनी को रोक सकता था। फिर कई बार ये अहसास होता है कि नहीं हम कुछ नहीं बदल सकते थे। ‘एडोलसेंस’ के मेकर्स ने मानो कलेजा निकाल कर स्क्रीन पर रख दिया हो।

“मैं यहां आपकी समझ को समझने के लिए हूं…”, ब्रियोनी जो कि एक मनोवैज्ञानिक की भूमिका में हैं, एक दृश्य में जेमी से कहती हैं, और यही शो की मांग है- किशोर अपराध और उसके पीछे की मानसिकता को समझना।

यह देखना बेहद अचंभित होने जैसा है कि ये शो देखते हुए हम कैसे खुद को सहज वन-टेक कैमरा तकनीक के इस्तेमाल से इसकी इमर्सिव स्टोरीटेलिंग में डूबे हुए पाते हैं! यहां कैमरा किरदारों का नहीं, बल्कि उनके इमोशंस को बेहद बारीकी से फॉलो कर रहा है। इस सीरीज़ को देखते हुए आप इसे सबसे ज़्यादा तब महसूस करते हैं जब एक पिता टूट जाता है, जब एक वयस्क महिला एक किशोर के आक्रामक लहजे से हैरान हो जाती है, और जब एक असहाय मां अपने परिवार की खातिर खुद को नियंत्रित करने की कोशिश करती है। ‘किशोरावस्था’ और इसके बारे में सब कुछ इतना मज़बूत है कि यह आपको प्रभावित करना कभी बंद नहीं करता।

”एडोलसेंस’ एक सार्वभौमिक विषय को संबोधित करती है। यही वजह है कि इंडियन ऑडियंस भी इसे पूरी प्रासंगिकता के साथ हाथों हाथ ले रही है।

समाज में जब कभी भी कुछ नया आता है पहले उसे डर कर देखने की परंपरा रही है। जब केबल टीवी की शुरुआत हुई थी तो मिडिल क्लास की सबसे बड़ी चिंता यही थी कि अब बच्चे पढ़ाई लिखाई बंद कर देंगे। बाद में जब छोटे शहरों में भी इंटरनेट कैफ़े खुलने लगे तो उसे भी तकनीकी अय्याशी के अड्डे के रूप में देखा जाने लगा। फिर मोबाइल फ़ोन्स और स्मार्ट फ़ोन्स खलनायक बने और अब सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम) और एआई को कोसने वाले ‘रोना सम्प्रदाय’ की होड़ लगी है। समाज को समझना ये ज़रूरी है कि तकनीकी विकास होते रहेंगे  और उपभोक्ताओं के ट्रेंड्स बदलते रहेंगे, यहां सबसे ज़रुरी है हमें अपने बच्चों में ऐसे मूल्य डालना कि उनके डिसिजन मेकिंग में संतुलन और मज़बूती हो। बच्चों और टीनएजर्स को अब ‘ज्ञान’ और ‘उपदेश’ देने वाले पेरेंट्स नहीं, बल्कि उनको प्यार और एम्पथी से समझ कर इमोशनल हॉट-स्पॉट शेयर करने वाले दोस्त चाहिए। बाक़ी वो ख़ुद संभाल लेंगे।  ‘एडोलसेंस’, स्टोरीटेलिंग की एक ज़रूरी ‘मास्टरक्लास’ है। देख लीजिएगा।  (पंकज दुबे मशहूर बाइलिंग्वल उपन्यासकार और चर्चित यूट्यूब चैट शो, “स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरिज़” के होस्ट हैं।)

पंकज शर्मा

स्वतंत्र पत्रकार। नया इंडिया में नियमित कन्ट्रिब्यटर। नवभारत टाइम्स में संवाददाता, विशेष संवाददाता का सन् 1980 से 2006 का लंबा अनुभव। पांच वर्ष सीबीएफसी-सदस्य। प्रिंट और ब्रॉडकास्ट में विविध अनुभव और फिलहाल संपादक, न्यूज व्यूज इंडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता। नया इंडिया के नियमित लेखक।

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