‘आंधी‘ फिल्म मूलतः राजनीतिक उठापटक के स्पष्ट संकेतों से पूर्ण फिल्म है। इसके पात्र बाहरी और आंतरिक स्थिति में निरंतर संघर्षों से जूझते रहते हैं। पूरी फिल्म की संवेदना असहज संबंध पर आधारित है। आरती देवी की कथा के साथ फिल्म में जो ट्रीटमेंट‘ किया गया है, वह उपन्यास की मूल संवेदना से विलग है। उपन्यास में वह उतनी संवेदनशील रूप में चित्रित नहीं हो पाती, जितनी फिल्म में हुई है।
13 फरवरी को ‘आंधी’ फिल्म के 50 साल पूरे होने पर विशेष
डॉ. मनीष कुमार चौधरी
हिंदी सिनेमा के इतिहास में सन् 1975 कई सफल फिल्मों के लिए एक यादगार वर्ष के रूप में जाना जाता है। इस वर्ष प्रदर्शित फिल्मों में रमेश शिप्पी कृत ‘शोले, के. सेतु माधवन की ‘जूली’, विजय शर्मा की ‘जय संतोषी मां’, बासु चटर्जी की ‘रजनी गंधा’ और तस्कर हाजी मस्तान के जीवन से प्रेरित यश चोपड़ा की ‘दीवार’ ने जहां व्यावसायिक सफलता का कीर्तिमान स्थापित किया वहीं समानांतर सिनेमा की एक चर्चित प्रस्तुति श्याम बेनेगल की ‘निशांत’ रही। गुलजार निर्देशित ‘आधी’ भी इसी वर्ष की एक विशिष्ट फिल्म है।
वस्तुतः गुलजार का व्यक्तित्व एक कालजयी फिल्मकार का है। संबंध व संवेदना के सिद्धहस्त फिल्मकार के रूप में जाने जाने वाले गुलजार की भाषा, शैली तथा विषयवस्तु में एक विशिष्ट काव्यात्मकता हमेशा उपस्थित रही है। ‘आंधी’ फिल्म इसका समर्थ उदाहरण है। ‘आंधी’ फिल्म मूलतः राजनीतिक उठापटक के स्पष्ट संकेतों से पूर्ण फिल्म है। इसके पात्र बाहरी और आंतरिक स्थिति में निरंतर संघर्षों से जूझते रहते हैं।
पूरी फिल्म की संवेदना असहज संबंध पर आधारित है। आरती देवी की कथा के साथ फिल्म में जो ट्रीटमेंट’ किया गया है, वह उपन्यास की मूल संवेदना से विलग है। उपन्यास में वह उतनी संवेदनशील रूप में चित्रित नहीं हो पाती, जितनी फिल्म में हुई है। उपन्यास में जिस मालती (आरती देवी) को भाव दशा के बड़े क्षीण संकेत उपलब्ध हैं, वह फिल्म में अधिक मुखरता के साथ उपस्थित हैं दाम्पत्य सुख के विलगाव और उसकी अप्राप्यता की परिधि में जेके और आरती देवी, दोनों वेदना की समान भूमि पर खड़े हैं। आरती देवी की वेदना का जब जब बयान होता है, कैमरे की दृष्टि क्षेत्र में उसकी उदास भंगिमा उभरती है। जेके के चरित्र को दो रूपों में दिखलाया गया है। प्रथमतः एक प्रेमी और पति के रूप में, दूसरा होटल मैनेजर के रूप में। दोनों स्थिति में जेके का अभिनय पक्ष दमदार रहा है। विशेषकर प्रेमी और पति के रूप में जेके अधिक सहज दिख पड़ता है। प्रस्तुति के ढांचे में फेरबदल करने से फिल्म में जेके के आंतरिक व्यक्तित्व की निर्मिति प्रभावित हुई है। इसे पटकथा लेखक और निर्देशक के प्रयास की सीमा माना जा सकता है। यहां उल्लेखनीय है कि ‘आंधी फिल्म के पटकथा, गीत, संवाद व निर्देशक की भूमिका में गुलजार ही हैं।
‘आंधी’ फिल्म का राजनीतिक परिदृश्य अत्यंत जीवंत है। निर्देशक गुलजार ने अपने समय की राजनीति को अभिव्यक्ति दी है। यह फिल्म उस वक्त प्रदर्शित हुई थी जब श्रीमती इंदिरा गांधी देश में आपात स्थिति लागू कर चुकी थीं। फिल्म की नायिका (सुचित्रा सेन) के व्यक्तित्व और कार्य प्रणाली में इंदिरा गांधी की छवि साफ झलकती है। सेंसर बोर्ड की आपत्तियों के बाद भी अंततः इसे प्रदर्शन की अनुमति दी गई। सेंसर बोर्ड की आपत्ति एवं तत्कालीन सत्ता की नाराजगी के कारण ही इस फिल्म को ‘मास्को फिल्म फेस्टिवल’ से वापस बुला लिया गया था। ‘आंधी’ गुलजार द्वारा निर्देशित प्रथम विवादास्पद फिल्म है। गुलजार ने चुनाव के समाजशास्त्र को सेल्युलाइड पर उतारने का भरसक प्रयास किया है। फिल्म के पहले दृश्य में चुनाव प्रचार दिखलाया गया है। इस तरह फिल्म का आरंभ बिंदु ही राजनीतिक परिदृश्य है।
‘आंधी फिल्म का गीत और संगीत पक्ष कई स्तरों पर कृति की संवेदना को निर्मित करने और तराशने का उपकरण है। गीतों का वजन सहज स्वाभाविक और स्थिति अनुकूल है। मन बहलाव के लिए गीतों को फिल्म में लादा नहीं गया है। ‘आंधी’ फिल्म के दृश्यबंधों में अद्भुत स्वाभाविकता और विश्वसनीयता है। चुनाव प्रचार, होटल का परिवेश, राजनीति का वातावरण इन सबकी ऐसी जीवंत प्रस्तुति हिंदी सिनेमा में प्रायः दुर्लभ है।
फिल्म को ध्वनि एवं प्रकाश व्यवस्था के कलात्मक प्रयोग के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। इसमें प्रकाश व्यवस्था का सर्जनात्मक प्रयोग हुआ है। इस तथ्य को, ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं’ गीत में देखा जा सकता है। हिंदी फिल्मों में गुलजार एक परम्परा हैं, एक ऐसी परम्परा जो हमें अपने साथ ले चलने के लिए निरंतर खींचती है। हमारी अनुभूतियों को उठाती है और उन्हें बेजान होने से बचाने का अवसर प्रदान करती है। वह अंतःमन को स्पर्श करती है, जेहन में गूंजती है और हर बार अपने में खो जाने की मांग करती है।
‘आंधी’ फिल्म अपनी सम्पूर्णता में ‘काली आंधी’ उपन्यास से काफी हद तक भिन्न है और सूक्ष्म रूप से ‘काली आंधी’ उपन्यास की फिल्म प्रस्तुति नहीं कह सकते। इस असहमति के बावजूद उपन्यास की संवेदना को निर्मित करने वाले कई तत्व यहां अपनी समर्थ भूमिका में उपस्थिति बनाए हुए हैं। इस तथ्य की सापेक्षता में इसे हम फिल्म रूपांतरण की श्रेणी में रख सकते हैं। मूल रचना के वैशिष्ट्य के लिए सिनेमाई समतुल्यों की अन्वेषण का भी प्रशंसनीय प्रयास यहां दृष्टिगोचर होता है। अपनी सीमाओं के बावजूद इसकी निर्देशकीय क्षमता प्रभावित करती है। यह फिल्म व्यवसायिकता के घोर दबाव के बीच भी कलात्मक प्रतिबद्धता को प्रस्तावित करता है जो साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्मों के लिए सुखद और उत्साहवर्द्धक संदेश है। ‘तीसरी कसम’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘सूरज का सातंवा घोड़ा’ को ध्यान में रखते हुए हिंदी सिनेमा जगत में ‘आंधी’ फिल्म अपनी सार्थकता को रेखांकित करती है।
समय, समाज और राजनीति की विद्रूपताओं पर गहरा प्रहार करने के साथ साथ यह फिल्म जीवन के नितांत वैयक्तिक संबंध के अनुशासन को भी दृश्य पटल पर अंकित करती है। आज के परिवेश में फिल्मकार मात्र मनोरंजन प्रधान फिल्मों के द्वारा अपने रचनात्मक दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता है। समाज के प्रति सजग और स्वस्थ दृष्टि को रखकर ही सोद्देश्य फिल्मों का निर्माण संभव है।
फिल्म की गति कहीं अवरोधित नहीं होती है। पूरी लयात्मकता के साथ दृश्यों का क्रम नियोजन रखा गया है। एक ओर जहां चुभते हुए संवाद मानस को झकझोर देते हैं, वही दूसरी ओर गहरी भावनाओं में लिपटी, मर्मस्पर्शी संवाद अंतःमन को छू लेते हैं। ‘आंधी’ फिल्म अपने व्यावसायिक आवरण में प्रस्तुत होते हुए भी कलात्मक मूल्यों के आंतरिक सौंदर्य को सुरक्षित रखती है। यहां साहित्य की संवेदनात्मक, मार्मिक तथा मानव हृदय से जुड़े हर्ष विषाद की जैसी काव्यात्मक अभिव्यक्ति हुई है, वह अपने आप में एक अद्वितीयता का प्रतीक बन गई है।
फिल्म का गीत और संगीत पक्ष निःस्संदेह, मूल रचना की स्वाभाविकता में अंतर्निहित गीतात्मकता को एक अन्य माध्यम में जीवंत करने का सफल प्रयास है। इसके द्वारा ‘काली आंधी’ उपन्यास की स्टाइल और ‘टोन’ को उसके संपूर्ण सत्य में पकड़ने की कोशिश की गई है। यानी गीत और संगीत का प्रयोग यहां बाजार व फिल्मों की तर्ज पर नहीं हुआ है, बल्कि यह रूपांतरण के सर्वाधिक महत्वपूर्ण दायित्व मूल रचना की विशेषताओं के लिए समतुल्यों की खोज के निर्वाह का उदाहरण है। गीतकार गुलजार के शब्द लोक हृदय के उफानों, सुखों, इच्छाओं तथा यथार्थ के प्रति उत्पन्न आवेगों को इस तरह बांटते प्रतीत होते हैं कि हम उन्हें देखने, सुनने, महसूसने लगते हैं। प्रस्तुत गीतों में रिश्तों के ताने बाने को, उनकी जटिलताओं को, जहां उनके मूल स्वरूप में पकड़ा गया है, वहां उनमें व्याप्त कोमलतम भावनाओं की सरलतम अभिव्यक्ति दी गई है। यह सरलता न सिर्फ अपने कहन में खींचती है, बल्कि प्रकृति के बिम्बों से युक्त होने की वजह से आत्यंतिक अनुभूति की तरह मन में उत्तर जाती है। रिश्तों की जरूरत का हिस्सा भी उतनी ही कशिश से सामने आता है, जितना उसकी टूटन से उपजे दुःख I
जहां तक बिम्बों, प्रतीकों का प्रश्न है तो गुलजार चांद के बगैर काम नहीं चलाते, ‘तुम जो कह दो तो आज की रात चांद डूबेगा नहीं’। चांद से करीबी, गुलजार की इतनी गहरी है कि उनके एक संग्रह का नाम ‘एक बूंद चांद’ तो दूसरे का ‘चांद पुखराज का’ रखा है। रूमानी रिश्तों को प्रकट करने के लिए उनके नायाब तरीके हैं सुस्त कदम रस्ते, तेज कदम राहें, पत्थर की हवेली और शीशे के घरौंदों तक पहुंचने वाले कुछ तेज कदम, कुछ सुस्त कदम राहों के बीच, मोड़ों पर गीतकार के अपने आत्यंतिक पल ठहरे हुए हैं। उनके गीतों में रिश्ते के प्रियत्व के छिन जाने पर हाहाकारी विलाप के स्वर नहीं, दहकती खामोशी के अहसास जीवंत होते हैं। अहम के पिघलने का या जिदों के छोटे होते जाने का अहसास एक सनाकेदार पल में घटित होता है: ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं, तेरे बिना जिंदगी भी लेकिन, जिंदगी नहीं’।(लेखक दिल्ली यूनिवर्सिटी के दौलत राम कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)