राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के नंबर दो पदाधिकारी यानी सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने काशी में ज्ञानवापी और मथुरा में शाही ईदगाह के सर्वे को लेकर बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा है कि इन दोनों जगहों पर यानी काशी विश्वनाथ वाराणसी और श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा के पुनर्निर्माण के प्रयासों में भाग लेने से संघ अपने स्वंयसेवकों को नहीं रोकेगा। इसके पीछे उन्होंने यह तर्क दिया कि विश्व हिंदू परिषद और धर्म गुरुओं ने तीन मंदिरों के बारे में बात की थी, जिनमें से एक अयोध्या का मामला सुलझ गया है। (आरएसएस)
परंतु इनके अलावा हर मस्जिद के नीचे मंदिर खोजने और मस्जिदों की खुदाई करने को उन्होंने निरर्थक बताया। उन्होंने कहा, ‘अगर हम अन्य सभी मस्जिदों और संरचनाओं के बारे में बात करते हैं, तो क्या हमें 30 हजार मस्जिदों को खोदना शुरू कर देना चाहिए और इतिहास को पलटने का प्रयास करना चाहिए?
क्या इससे समाज में और अधिक शत्रुता और आक्रोश पैदा नहीं होगा? क्या हमें एक समाज के रूप में आगे बढ़ना चाहिए या अतीत में ही अटके रहना चाहिए? हम इतिहास में कितनी दूर तक पीछे चले गए हैं’?
उनके इस बयान से कोई तीन साल पहले जून 2022 में संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था, ज्ञानवापी विवाद में आस्था के कुछ मुद्दे शामिल हैं और इस पर अदालत का फैसला सर्वमान्य होना चाहिए। परंतु हर मस्जिद में शिवलिंग ढूंढने और प्रतिदिन एक नया विवाद खड़ा करने की जरूरत नहीं है’।
इसका मतलब है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ में इस बात पर सहमति है कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा और काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी को लेकर अयोध्या जैसे किसी आंदोलन का समर्थन करना है लेकिन इनके अलावा किसी और मस्जिद की खुदाई करने और उसके नीचे मंदिर तलाशने की जरुरत नहीं है क्योंकि उससे समाज में ‘अधिक शत्रुता और आक्रोश’ बढ़ेगा।
इससे पहला सवाल तो यही पैदा होता है कि समाज में कितनी ‘शत्रुता और आक्रोश’ की इजाजत हो सकती है और कितनी से ज्यादा बढ़ेगी तो उसे अधिक माना जाएगा?
क्या अयोध्या, मथुरा और काशी के आंदोलन से जो ‘शत्रुता और आक्रोश’ बढ़ेगा, उसे सहन कर लिया जाएगा लेकिन उससे ज्यादा बढ़ेगा तो उसे सहन नहीं किया जा सकेगा? यह सवाल इसलिए है क्योंकि 1991 में बने धर्मस्थल कानून के दायरे से अयोध्या को बाहर रखा गया था लेकिन देश के बाकी सभी धर्मस्थलों की 1947 वाली यथास्थिति बनाए रखने की बात कही गई थी।
अब यह कानून चुनौतियों का सामना कर रहा है और उसे बदलने की मांग हो रही है। अगर वह बदला जाता है या उस कानून के होने के बावजूद धर्मस्थलों की प्रकृति बदलने के आंदोलन चलते हैं तो वह सिर्फ मथुरा और काशी तक सीमित नहीं रहने वाला है।
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तभी यह संघ और उसके पदाधिकारियों का भोलापन ही है जो वे समझते हैं कि उनके अपील कर देने से लोग शांत हो जाएंगे और मस्जिदों के नीचे मंदिर तलाशना बंद हो जाएगा। आखिर जून 2022 में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सभी मस्जिदों के नीचे शिवलिंग ढूंढने से मना किया था तो उसके ढाई साल बाद नवंबर 2024 में उत्तर प्रदेश के संभल में जामा मस्जिद को लेकर क्यों विवाद हुआ? संभल की जामा मस्जिद के सर्वे और उसके बाद हुई हिंसा की संघ किस रूप में व्याख्या करेगा? (आरएसएस)
क्या संघ के पदाधिकारी मानेंगे कि हिंदू समाज व्यापक रूप से अब उनकी बातों पर ध्यान नहीं दे रहा है और जो काम एक बार शुरू हो गया है उसे रोकने की क्षमता अब संघ में नहीं है? ध्यान रहे संभल की जामा मस्जिद के मामले में किसी न किसी रूप में न्यायपालिका से लेकर राज्य सरकार तक सब शामिल हैं। ऐसा नहीं है कि यह कोई स्वंयस्फूर्त आंदोलन है। उसे व्यवस्थित तरीके से मदद की जा रही है। आम हिंदू का संघ की बातों पर ध्यान नहीं देना तो समझ में आता है लेकिन भाजपा संगठन, उसकी सरकारें और हिंदू संगठन भी उसकी बात नहीं सुन रहे हैं यह कैसे माना जाए! (आरएसएस)
यह कैसे हो सकता है कि संघ के शीर्ष पदाधिकारियों की ओर से कहा जाए कि हर मस्जिद में शिवलिंग ढूंढने या 30 हजार मस्जिदों की खुदाई करके उनकी पहचान बदलने के आंदोलन की जरुरत नहीं है और विश्व हिंदू परिषद या बजरंग दल के लोग इस पर ध्यान न दें? इस अपील के बावजूद वे अपना काम जारी रखें?
मस्जिदों पर दावे और आरएसएस संघ की रणनीति: दो संभावित पहलू
इसके दो मतलब निकलते हैं। पहला तो यह कि संघ की ओर से सिर्फ बयान दिया जा रहा है, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी और केंद्र की भाजपा सरकार की पोजिशनिंग के लिए जरूरी है। यानी यह जुबानी जमाखर्च है और संघ वास्तव में हर मस्जिद के नीचे मंदिर खोजने के अभियान को रोकना नहीं चाहता है। ऐसा पहले कई मामलों में देखा गया है। आरएसएस के आलोचक अक्सर इन बातों की ओर ध्यान दिलाते रहे हैं कि वहां कई तरह की बातें एक समय में की जाती हैं। (आरएसएस)
जरूरी नहीं है कि जो कहा जा रहा है वह करने के लिए हो। कई बार कहने और करने का एजेंडा अलग अलग होता है। इसका मतलब है कि संघ के शीर्ष पदाधिकारी और भाजपा के सर्वोच्च नेता संत की तरह बोलें, सामाजिक सद्भाव की बात करें, इतिहास से छेड़छाड़ नहीं करने की नसीहत दें और दूसरी ओर अनुषंगी संगठन धर्मस्थलों की पहचान बदलने का व्यवस्थित अभियान चलाएं।
अगर ऐसा नहीं है तो इसका दूसरा मतलब यह निकलता है कि समाज में कट्टरता और नफरत का जो भस्मासुर पैदा किया गया वह इतना मजबूत हो गया है कि अब संघ या किसी के भी वश में नहीं है कि वह उसे रोक सके। ध्यान रहे न्यूटन की गति का पहला नियम कहता है कि किसी काम को शुरू करने के लिए बहुत बल लगाने की जरुरत होती है। लेकिन एक बार शुरू हो जाने के बाद वह काम तब तक चलता रहता है, जब तक शुरू करने के लिए लगाए गए बल से ज्यादा बड़ा बल लगा कर उसको रोका नहीं जाए। (आरएसएस)
इसका मतलब है कि भाजपा, संघ और अन्य हिंदुवादी संगठनों ने जितना बल लगा कर अयोध्या का आंदोलन शुरू किया था और मथुरा व काशी पर जितना बल लगाया था, उससे हिंदू समाज में एक बदलाव शुरू हुआ। उससे हर मस्जिद के नीचे मंदिर खोजने की धारणा बनी और इससे इतिहास का बदला लेने की कट्टर भावना मजबूत होती गई। वह धारणा और कट्टरता इतनी मजबूत हो गई है कि संघ उसे नहीं रोक पा रहा है। अगर उसे रोकना है तो ज्यादा बड़े बल की जरुरत है।
यह वास्तविकता है कि जमीनी स्तर पर जो कुछ हो रहा है उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। अब मस्जिदों के नीचे मंदिर खोजने का अभियान किसी एक संगठन द्वारा व्यवस्थित तरीके से वैसे नहीं चलाया जा रहा है, जैसे अयोध्या का आंदोलन चला था। अब सैकड़ों की संख्या में स्वंयभू संगठन और हिंदू धर्मध्वजा वाहक पैदा हो गए हैं। वे व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ रहे हैं और इस इतिहास के आधार पर मस्जिदों, मदरसों या ताजमहल व कुतुबमीनार जैसी संरचनाओं पर दावेदारी कर रहे हैं। (आरएसएस)
अदालतों में ऐसे महत्वाकांक्षी या प्रतिबद्ध विचारधारा वाले न्यायिक अधिकारी बहाल हो गए हैं, जो व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के ज्ञान के आधार पर दायर की गई याचिकाओं पर आदेश दे रहे हैं। उसके बाद सोशल मीडिया की ताकत से ऐसे मुद्दों पर जनमत का निर्माण किया जा रहा है। और सबको पता है कि एक बार जब जनमत बनना शुरू हो जाता है तो उसे रोकना किसी संगठन या व्यक्ति के वश में नहीं रह जाता है। तभी स्थिति चिंताजनक हो गई है और संघ की सदिच्छा भर से नहीं बदलने वाली है। अगर इसे बदलना है तो सामाजिक सद्भाव और समरसता के लिए बड़े जन आंदोलन की जरुरत होगी।
Pic Credit: ANI