लोकसभा के बाद हुए कई राज्यों के विधानसभा चुनाव के जो नतीजे आए हैं उनसे देश की राजनीति में नया विमर्श भी शुरू हुआ है और ऐसा लग रहा है कि विपक्ष की राजनीति में नए सिरे से ध्रुवीकरण के प्रयास भी शुरू होंगे। हो सकता है कि अभी तुरंत नहीं शुरू हो लेकिन अगले साल होने वाले दो विधानसभा चुनावों के बाद निश्चित रूप से विपक्ष में नया ध्रुवीकरण देखने को मिलेगा। इसका पहला संकेत तृणमूल कांग्रेस के नेता कल्याण बनर्जी ने दिया है। कल्याण बनर्जी ने कहा है कि विपक्षी पार्टियों को अब अगले चुनाव के लिए ममता बनर्जी को चेहरा मान लेना चाहिए। third front
उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से यह नहीं कहा कि कांग्रेस के सुप्रीम लीडर राहुल गांधी का चेहरा जनता के बीच काम नहीं कर रहा है, लेकिन उनके कहने का मतलब यही था। ये वही कल्याण बनर्जी हैं, जो एक समय संसद परिसर में राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ की नकल उतार रहे थे तो राहुल गांधी उनकी वीडियो बना रहे थे। ध्यान रहे हाल ही में ममता बनर्जी ने पार्टी संगठन में कल्याण बनर्जी का कद बढ़ाया है। ऐसे में उनके कहने का मतलब गंभीर है।
कांग्रेस की राजनीति: चुनावी रणनीतियां, गठबंधन के समीकरण और महाराष्ट्र की हार
असल में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन के अच्छा प्रदर्शन करने और उसके बाद राज्यों के चुनाव में कांग्रेस के बहुत खराब प्रदर्शन की वजह से कुछ स्वाभाविक निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं। उनमें से एक निष्कर्ष तो यह है कि कांग्रेस अकेले अपने दम पर भाजपा से नहीं लड़ पाती है। जहां भी उसका सीधा मुकाबला भाजपा से होता है वह बुरी तरह से हारती है। दक्षिण के राज्यों का मामला अपवाद है। दूसरा निष्कर्ष यह है कि कांग्रेस अब लगभग पूरी तरह से सहयोगी पार्टियों पर आश्रित हो गई है।
तीसरा निष्कर्ष यह है कि लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस का मनोबल लौटा तो उसने सहयोगी पार्टियों को दबाने का सिलसिला शुरू कर दिया, जिसका अनिवार्य नतीजा महाराष्ट्र की हार है। लोकसभा चुनाव के समय महाराष्ट्र में शिव सेना ज्यादा सीटों पर लड़ी थी। गठबंधन में उसको 21, कांग्रेस को 17 और एनसीपी को 10 सीटें दी गई थीं। लेकिन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जबरदस्ती शिव सेना से ज्यादा सीटें लीं और उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं घोषित किया। third front
यह सही है कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अपने हिस्से की 17 में से 13 सीटों पर जीत गई और शिव सेना 21 पर लड़ कर भी सिर्फ नौ ही सीट जीत पाई। लेकिन यह अंकगणित का हिसाब है। अगर राजनीति के लिहाज से देखें तो शिव सेना को महत्व देने का लाभ गठबंधन की दोनों पार्टियों को मिला था। उन्हें शिव सैनिकों के वोट मिले थे। परंतु विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अड़ गई कि वह सबसे ज्यादा सीटों पर लड़ेगी क्योंकि लोकसभा में उसकी स्ट्राइक रेट बहुत अच्छी है।
कांग्रेस की कमजोरियां और भाजपा से मुकाबले में विफलता: सहयोगियों पर निर्भरता और रणनीतिक गलतियाँ
कांग्रेस की इस जबरदस्ती में सीटों की बंदरबांट हुई। शरद पवार भी जरुरत से ज्यादा सीटें ले गए और उद्धव ठाकरे की शिव सेना को कांग्रेस से नीचे कर दिया गया। कांग्रेस ने दूसरी गलती यह कर दी कि उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया। शरद पवार के कहने के बावजूद ऐसा नहीं किया गया। इससे शिव सैनिकों के साथ साथ कट्टर हिंदू वोट भी महाविकास अघाड़ी से दूर हटे और वे भाजपा व उसके गठबंधन के साथ चले गए।
महाराष्ट्र में 75 सीटों पर कांग्रेस और भाजपा का आमने सामने का मुकाबला हुआ था। इसमें से कांग्रेस सिर्फ 10 सीट जीत पाई। वह 65 सीटें न सिर्फ हारी, बल्कि उनमें से सात सीटें ऐसी हैं, जिन पर वह दूसरे स्थान पर भी नहीं रही। यानी कम से कम सात सीटों पर महाराष्ट्र के मतदाताओं ने भाजपा के मुकाबले कांग्रेस को दूसरे नंबर की पार्टी भी नहीं माना। इससे पहले हरियाणा में भी आमने सामने के मुकाबले में भाजपा ने लगातार तीसरी बार कांग्रेस को हराया और अपनी सरकार बनाई। इसी तरह जम्मू कश्मीर में कांग्रेस सिर्फ सात सीट जीत पाई। उसमें भी जम्मू क्षेत्र में जहां उसका सीधा मुकाबला भाजपा से था वहां उसे सिर्फ एक सीट मिली। बाकी छह सीटें उसने कश्मीर घाटी में जीती। third front
झारखंड में भी गठबंधन की तीन बड़ी पार्टियों में सबसे खराब स्ट्राइक रेट कांग्रेस का रहा। वह 30 सीटों पर लड़ी और 16 पर जीती, जबकि हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा 41 सीटों पर लड़ कर 34 सीटों पर जीती और राजद ने छह सीटों पर लड़ कर चार पर जीत हासिल की।
कांग्रेस की स्थिति और विपक्षी गठबंधन की संभावनाएँ: तीसरे मोर्चे की ओर बढ़ते कदम
लोकसभा और उसके बाद चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों के विश्लेषण से ये निष्कर्ष प्रमाणित हो रहे हैं कि कांग्रेस आमने सामने के मुकाबले में भाजपा को नहीं हरा पाती है, वह सहयोगियों पर आश्रित है और जरा सी ताकत बढ़ती है तो सहयोगियों को दबाने लगती है। तभी विपक्षी पार्टियां अब नए सिरे से ध्रुवीकरण पर विचार करेंगी।
कांग्रेस को भी इस बारे में सोचना चाहिए कि जब 2024 के लोकसभा चुनाव में उसने ज्यादा सीटों की मांग नहीं की और अब तक के इतिहास की सबसे कम 328 सीटों पर लड़ने को तैयार हो गई तो उसको इसका बड़ा फायदा मिला। इससे पहले सवा चार सौ सीट लड़ कर वह 50 सीट जीत रही थी तो 328 सीट लड़ कर 99 जीत गई। यह दूसरी पार्टियों के लिए ज्यादा सीट छोड़ने और उनके साथ बेहतर गठबंधन बनाने की वजह से संभव हुआ। लेकिन लोकसभा की जीत ने कांग्रेस का दिमाग खराब कर दिया।
उसको लगा कि उसका समय आ गया, जबकि हकीकत यह है कि प्रादेशिक पार्टियों ने अपने संगठन और भाजपा विरोध की अपनी राजनीति में कांग्रेस को पुनर्जीवन दिया है। इसलिए अब वो पार्टियां नए समीकरण पर विचार करेंगी।
Also Read: Rahul Gandhi Sambhal Visit: संभल जा रहे राहुल-प्रियंका को पुलिस ने गाजीपुर बॉर्डर पर रोका
अगले साल दो राज्यों के चुनाव हैं। दिल्ली और बिहार में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। दोनों के नतीजों के बाद तीसरे मोर्चे की कवायद तेज होगी। अगर दिल्ली में अरविंद केजरीवाल चुनाव जीतते हैं तो वे भी इसकी पहल कर सकते हैं। वे पहले से ममता बनर्जी के संपर्क में हैं। सबको ममता बनर्जी की महत्वाकांक्षा के बारे में पता है। वे पहले भी तीसरा मोर्चा बनाने के प्रयास कर चुकी हैं। अभी जो विपक्षी गठबंधन है ‘इंडिया’ उसकी नींव बिहार में पड़ी थी। नीतीश कुमार ने ऐसे गठबंधन की पहल की थी और बिहार में विपक्षी पार्टियों की पहली बैठक कराई थी। तभी इस साल के चुनाव नतीजों पर नजर रखने की जरुरत है। बिहार से फिर वैसी ही पहल हो सकती है, जैसी 2023 में नीतीश ने की थी।
यानी कांग्रेस को साथ रखते हुए एक मजबूत विपक्षी गठबंधन बनाने की। लेकिन इसके अलावा एक संभावना यह है कि कांग्रेस को छोड़ कर विपक्षी पार्टियां तीसरे मोर्चे की पहल करें। इसमें अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, के चंद्रशेखर अनिवार्य रूप से होंगे। अखिलेश यादव और जगन मोहन रेड्डी को भी इसमें जोड़ने का प्रयास किया जा सकता है। ऐसे में कांग्रेस के पास राजद, जेएमएम, डीएमके, शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिव सेना बचेगी। बहरहाल, तीसरा मोर्चा कैसा होगा इसकी तस्वीर अभी धुंधली है लेकिन चार राज्यों में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के बाद इसकी रूपरेखा बनने लगी है।