नई दिल्ली। गुजरात दंगों से जुड़े बिलकिस बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार की कार्रवाई पर फिर सवाल उठाए हैं। सर्वोच्च अदालत ने इस मामले के 11 दोषियों की रिहाई पर कहा कि, दोषियों की रिहाई पर प्राधिकरण ने स्वतंत्र विवेक का इस्तेमाल कैसे किया? आखिरकार प्राधिकरण कैसे रिहाई देने की सहमति पर पहुंचा? सहमति वाली राय कैसे बनाई गई? अदालत ने कहा कि, सहमति वाली राय बनाने में भी विवेक का स्वतंत्र प्रयोग होना जरूरी है। इसे व्यापक कारणों से समर्थित करने की जरूरत नहीं है।
जब अदालत के सामने यह बताया गया कि रिहा किया गया एक व्यक्ति वकील था और वह प्रैक्टिस कर रहा है तो अदालत ने इस पर हैरानी जताई और कहा कि कोई सजायाफ्ता व्यक्ति कैसे प्रैक्टिस कर सकता है? बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में भीड़भाड़ को लेकर भी सवाल उठाए। उसने कहा- हम चाहते हैं कि भारत में 14 साल की सजा पूरी कर चुके सभी कैदियों के लिए सुधारात्मक सिद्धांत हो। हमारी जेलें खचाखच भरी क्यों हैं? ऐसे कैदियों को भी छूट का लाभ मिले।
सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश देते हुए गुजरात सरकार और दोषियों के वकीलों से कहा कि दोषियों की रिहाई के आदेश को चुनौती दी जा सकती है। अदालत ने दोषियों की इस दलील को खारिज कर दिया कि कौन सी छूट नीति लागू होगी और किस राज्य का अधिकार है, यह मुद्दा सुलझ चुका है और इसे दोबारा नहीं खोला जा सकता। अदालत ने कहा बिलकीस ने कभी भी छूट आदेश को चुनौती नहीं दी और इसलिए वह ऐसा कर सकती है। छूट आदेश को चुनौती देने के लिए कोई रोक नहीं है।
सर्वोच्च अदालत के सवालों के जवाब में दोषियों का कहना है कि महाराष्ट्र में सुनवाई करने वाले निचली अदालत के जज से भी सलाह ली गई थी, जबकि राज्य ने कहा कि सजा माफी के मामले में केवल गोधरा जज से सलाह ली गई थी। इस मामले में अब सुनवाई 31 अगस्त को होगी। पिछली सुनवाई में भी जस्टिस बीवी नागरत्ना ने गुजरात सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा था कि आखिर यह छूट की नीति चुनिंदा लोगों के लिए ही क्यों है? उन्होंने कहा था, सुधार का अवसर सिर्फ कुछ कैदियों को ही नहीं, यह मौका तो हर कैदी को दिया जाना चाहिए।