क्या अमित शाह के बयान से एक बार फिर ‘ना कोई घुसा है, ना कोई घुसा हुआ है’ वाले प्रधानमंत्री के बयान की पुष्टि नहीं होती है? आशंका है कि चीन इसका उसी तरह दुरुपयोग करेगा, जैसा जून 2020 में उसने किया था।
भारतीय मीडिया में गृह मंत्री अमित शाह के अरुणाच प्रदेश में दिए गए बयान को चीन को दो-टूक संदेश के रूप में पेश किया गया है। शाह ने वहां कहा कि कोई भारत की एक इंच जमीन पर भी अब कब्जा नहीं जमा सकता। इसके अलावा शाह ने रुणाचल प्रदेश में 48 अरब रुपए की परियोजनाओं का शिलान्यास भी किया। अमित शाह ने कहा कि इन परियोजनाओं से भारत की सीमाओं की सुरक्षा और बेहतर होगी। ये वे इलाका है, जिसे चीन अपना बताता है और हाल ही में वहां की कई जगहों के नाम भी बदल दिए थे। चीन की इस कार्रवाई के तुरंत बाद अमित शाह का अरुणाचल प्रदेश जाना और वहां परियोजनाओं का उद्घाटन करना अवश्य इस राज्य के बारे में भारत के चिर-परिचित रुख की पुनर्घोषणा है। इस रूप में इसे एक जरूरी पहल माना जाएगा। लेकिन शाह ने भारत की प्रादेशिक अखंडता के बारे में जो दावा किया, वह विवादास्पद है।
इसलिए कि इससे एक बार फिर ‘ना कोई घुसा है, ना कोई घुसा हुआ है’ वाले प्रधानमंत्री के बयान की पुष्टि होती है। जबकि तब से आज तक इस सवाल का जवाब नहीं मिला है कि अगर स्थिति ऐसी है, तो फिर गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प किसलिए हुई थी और उसके बाद लगभग डेढ़ दर्जन दौर की वार्ता किसलिए हुई है? ये घटनाएं लद्दाख सेक्टर में हुई थीं। उधर अरुणाचल में भी चीनी घुसपैठ की खबरें इस दौर में आती रही हैँ। अनेक कूटनीति विशेषज्ञों का आकलन है कि गलवान घाटी की घटना के बाद प्रधानमंत्री के दिए बयान से चीन के साथ बातचीत में भारत का पक्ष कमजोर हुआ। चीन ने अपने को निर्दोष बताने के लिए उस बयान का खूब उपयोग किया। आशंक है कि अब गृह मंत्री के बयान को भी भारत सरकार के उसी पुराने रुख की पुष्टि समझ कर चीन लद्दाख सेक्टर में अपनी घुसपैठ को वैधता देने की कोशिश करेगा। इसीलिए भारत सरकार के वरिष्ठ पदाधिकरियों से अपेक्षा यह है कि वह उन देशों को कठघरे में रखने की रणनीति के अनुरूप बयान दे, जिनसे भारत के संबंध शत्रुतापूर्ण हैं।