Shardiya Navratri 2024: शारदीय नवरात्रि का पवित्र पर्व चल रहा है और आज शारदीय नवरात्रि का दूसरा दिन है. नवरात्रि का दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी की उपासना की जाती है. दूसरा दिन देवी ब्रह्मचारिणी को समर्पित माना गया है. मान्यता है कि मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से जीवन में सुकून और शांति बनी रहती है. मां ब्रह्मचारिणी की कृपा अगर भक्तों पर पड़ जाए तो उन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त करने में जरा भी कठनाई नहीं होती है. ब्रह्म का मतलब तप और चारिणी का मतलब आचरण. ऐसे में तप का आचरण करने वाली मां को ब्रह्मचारिणी कहते हैं. माता को साक्षात ब्रह्मा का रूप भी मानते हैं. आइये जानते हैं कि मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का सही तरीका क्या है और इस दिन की पूजा विधि क्या है.
देवी पार्वती ने महादेव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था. ब्रह्म शब्द का अर्थ है तपस्या और ब्रह्मचारिणी का अर्थ है तपस्या का आचरण करने वाली. कठोर तप की वजह से देवी को ब्रह्मचारिणी नाम मिला. हमारे शरीर में सप्त चक्र बताए गए हैं और इनमें अलग-अलग देवियों का वास माना जाता है. देवी ब्रह्मचारिणी हमारे शरीर के स्वाधिष्ठान चक्र में रहती हैं. ब्रह्मचारिणी स्वयं सफेद वस्त्रों में दर्शन देती हैं, इसलिए देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा सफेद कपड़े पहनकर करने चाहिए.
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मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप
देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल है.
देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात बह्मा का रूप है.
देवी बिना किसी वाहन के ही दर्शन देती है.
देवी को भगवती दुर्गा, शिवस्वरूपा, गणेशजननी, नारायणी, विष्णुमाया, पूर्ण ब्रह्मस्वरूपिणी के नाम से जाना जाता है.
मां ब्रह्मचारिणी की कठोर तपस्या की कथा
मां ब्रह्मचारिणी की कथा उनके अद्वितीय तप और भक्ति की मिसाल है. देवी ब्रह्मचारिणी ने हिमालय के घर में पुत्री रूप में जन्म लिया और नारद जी के उपदेश का पालन करते हुए महादेव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठेर तपस्या की. उनकी तपस्या इतनी कठिन थी कि उन्हें ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया. एक हजार वर्षों तक मां ने केवल फल-फूल खाकर और सौ वर्षों तक जमीन पर शाक खाकर अपना निर्वाह किया. उन्होंने खुले आकाश के नीचे, धूप और वर्षा के बीच कष्ट सहन करते हुए भगवान शिव की आराधना की. (Shardiya Navratri 2024)
इस कठिन तपस्या के दौरान उन्होंने कई वर्षों तक केवल टूटे हुए बिल्व पत्र खाए. मां ब्रह्मचारिणी ने निर्जल और निराहार रहकर अपनी साधना जारी रखी, जिससे उनका शरीर क्षीण हो गया. उनकी माता मैना अत्यंत दुखी होकर उन्हें इस कठिन तपस्या से विरक्त करने का प्रयास करती रहीं, और तभी से देवी का नाम उमा भी पड़ गया.
मां ब्रह्मचारिणी की इस कठोर तपस्या ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया. और देवता, ऋषि-मुनि सभी उनकी महान तपस्या की सराहना करने लगे. ब्रह्माजी ने उनकी तपस्या की प्रशंसा करते हुए आकाशवाणी की कि इतनी कठिन तपस्या आज तक किसी ने नहीं की. उन्होंने देवी को आशीर्वाद दिया कि उनकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी, और भगवान शिव जल्द ही उन्हें पति रूप में प्राप्त होंगे. इसके बाद मां ब्रह्मचारिणी अपने घर लौट आईं और कुछ समय बाद महादेव शिव के साथ उनका विवाह संपन्न हुआ.
पूजा का महत्व
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से भक्तों को बहुत लाभ होता है. उन्हें लक्ष्य प्राप्ति में सफलता मिलती है. माता की आराधना करने से संयम, बल, और आत्मविश्वास में इजाफा होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है. मां ब्रह्मचारिणी को ज्ञान का भंडार माना जाता है और इनकी कृपा वालों के व्यक्तित्व में तेज आता है.