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28-02-2025 Vol 19

2023: जोड़ियां कौन, किस पर कितनी, क्यों भारी..

मध्य प्रदेश मिशन 2023 के लिए भाजपा के प्लान को 2024 को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जा रहा है.. हाईकमान की दिलचस्पी से ज्यादा हस्तक्षेप साफ देखा जा सकता है.. 2003 के बाद हुए चुनाव से अलग भाजपा सत्ता में रहते कुछ अलग और कई चुनौतियों से जूझ रही है.. इन चुनाव में कई मोर्चों पर समस्या का समाधान निकालने के लिए रणनीति बनाई जा रही है.. चुनाव जीतने के लिए कई फैक्टर प्रभावी पर राष्ट्रीय नेतृत्व से लेकर प्रदेश नेतृत्व और डबल इंजन की सरकार सारे विकल्प खोलकर आगे बढ़ने का मानस बना चुकी है.. जातिगत समीकरण, विकास बनाम भ्रष्टाचार, जीत के लिए टिकट का क्राइटेरिया.. बहुत मायने रखता है जब परिवार की राजनीति खासतौर से नेता पुत्र पुत्रियों पर संभावनाओं पर मोदी और नड्डा दोनों विराम लगा चुके..

पीढ़ी परिवर्तन के दौर से गुजर रही भाजपा में महत्वाकांक्षा की टकराहट हो या फिर दिल्ली में मोदी, शाह, की जोड़ी की तर्ज पर मध्यप्रदेश में शिवराज के साथ जोड़ीदार समय के साथ बदलते गए.. यहां मोदी शाह नड्डा की तर्ज पर तिकड़ी भी भरोसे की कसौटी पर स्थापित नहीं हो पाई.. संघ और राष्ट्रीय नेतृत्व से जुड़े नीति निर्धारक भी जब स्थितियां अनुकूल नहीं कर पाए तो फिर अमित शाह को सीधा हस्तक्षेप करना पड़ा.. संदेश दिल्ली से भी वोट दे सकते थे लेकिन भोपाल में आकर उन्होंने अपने इरादे और प्रदेश नेतृत्व से उम्मीद जता दी.. फिलहाल मध्य प्रदेश के सीएम इन वेटिंग की दौड़ में शामिल लगभग सभी नेता इस बैठक का हिस्सा बने.. बदलते राजनीतिक परिदृश्य में सांसद, मंत्री विधायक पदाधिकारियों पर भारी कई जोड़ियां भाजपा में ऊपर से नीचे व्यवस्था को प्रभावित करती हुई देखी जा सकती है.. जो चुनाव प्रभारी की नियुक्ति के पहले तक समस्याओं को चिन्हित तो कर लेते थे लेकिन कार्यकर्ताओं की नजर में समाधान समय रहते नहीं निकाला जा सका.. राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिव प्रकाश से लेकर क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल की जोड़ी हो या फिर प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव की पंकजा मुंडे, रामशंकर कथारिया ही क्यों न हो ….

पंकजा महाराष्ट्र की धरती से फिलहाल भाजपा से दूरी बनाने का संदेश दे चुकी है.. 2023 का चुनाव लड़ने और लड़ाने के लिए ये सभी सक्रिय लेकिन सवालों के घेरे में.. प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा के साथ संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा की जोड़ी पर नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले युवा नेतृत्व और कार्यकर्ताओं का दबाव देखा जा सकता है.. संगठन महामंत्री सुहास भगत के जाने के बाद अस्तित्व में आई इस जोड़ी के बीच भी बेहतर तालमेल की संभावनाएं तलाशी जा रही है.. शिव विष्णु और हितानंद की तिकड़ी पर बड़ा दारोमदार लेकिन संभागीय संगठन महामंत्री की व्यवस्था खत्म होने के बाद कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं और उनकी नाराजगी को दूर करना संगठन के लिए नई चुनौती बनकर सामने है.. प्रबंधन के मोर्चे पर चुनाव के दौरान संगठन मंत्री की भूमिका का विकल्प भी भाजपा को निकालना होगा.. मुख्यमंत्री शिवराज और संसदीय मंत्री सरकार के प्रवक्ता, संकटमोचक नरोत्तम मिश्रा के साथ सरकार की जोड़ी भी अलग-अलग कारणों से ही सही सुर्ख़ियों में जरूर बनी रहती है.. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की चुनावी रणनीति के लिए पहली मीटिंग के बाद चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव और अश्वनी वैष्णव की जोड़ी सब पर भारी नजर आने लगी है.. मोदी सरकार के यह दोनों मंत्री संगठन के फोरम पर सक्रिय होकर चुनावी बिसात का क्रियान्वयन करेंगे.. पीएमओ कनेक्शन को प्रदेश भाजपा समझने को मजबूर होगी.. शायद पिछले चुनाव की तुलना में इस चुनाव में हाईकमान की भूमिका और प्रभावी ही नहीं निर्णायक साबित होने वाली है..

यह स्थिति संभवत मध्यप्रदेश में ऑल इज वेल नहीं होने के कारण निर्मित हुई है.. इसे एक दूसरे के खिलाफ कान भरने का नतीजा भी माना जा सकता.. संदेश साफ है पटकथा दिल्ली दरबार से लिखी जाएगी और इसे जमीन पर उतरवाने की जिम्मेदारी भूपेंद्र और अश्वनी को निभाना है.. किरदार के तौर पर मध्यप्रदेश के चेहरे सामने नजर आएंगे.. विजय संकल्प अभियान के इर्द-गिर्द इन नेताओं को पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ आगे बढ़ना होगा.. संगठन में नए सिरे से सक्रियता और कार्यकर्ताओं में जोश भरने से पहले इन नेताओं को जिस स्क्रिप्ट को सामने लाना है उसमें चुनिंदा नेताओं की भूमिका निर्धारित कर उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जाना है.. अमित शाह की मौजूदगी में संपन्न हुई पहली मीटिंग में भूपेंद्र अश्विनी के अलावा शिवराज, विष्णु दत्त ,हितानंद, नरेंद्र तोमर, ज्योतिरादित्य सिंधिया कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, नरोत्तम मिश्रा की मौजूदगी का मतलब साफ है कि क्षत्रपों और दिग्गजों के साथ संयुक्त फैसले के साथ पार्टी को आगे बढ़ना होगा.. अमित शाह की इस बैठक में शिव प्रकाश और अजय जामवाल की गैरमौजूदगी पर अटकलों का दौर जारी है.. सवाल खड़ा होना लाजमी है शिव प्रकाश और अजय जामवाल क्या भूपेंद्र यादव के नेतृत्व में होने वाली बैठक का हिस्सा बनेंगे..चुनाव संचालन के लिए कई महत्वपूर्ण समिति का गठन अधर में तो कई छोटी समितियों में समन्वय का अभाव दूर करने के लिए माथापच्ची जारी है.. भूपेंद्र यादव के 2 दिन के भोपाल प्रवास के आगे पीछे यह समितियां नए सिरे से अस्तित्व में लाई जा सकती है.. अमित शाह के जाने के बाद किसके लिए लंबी एक्सरसाइज भी पूरी हो चुकी.. जब सिंधिया दूसरे दिन ही फिर भोपाल पहुंचे और उससे पहले नरेंद्र, कैलाश विष्णु , नरोत्तम के साथ शिवराज की भी बैठकों का दौर चला था.. संदेश साफ है मध्यप्रदेश के हलचल के दमदार कद्दावर अनुभवी नेताओं यतीम अब जन आशीर्वाद यात्रा से आगे विजय संकल्प अभियान को ध्यान में रखते हुए 5 यात्राओं की रणनीति बना रही है..

संदेश कुछ सकारात्मक तो समस्या पुरानी जिनका कोई अभी तक समाधान नहीं निकला क्या उसे नजरअंदाज किया जा सकेगा.. ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजिमी है यात्रा विकास अभियान सौ बातों की झड़ी जाति समीकरण दुरुस्त करने के आगे क्या मध्य प्रदेश में एडजस्टमेंट के और दूसरे विकल्पों पर भी गौर किया जाएगा.. समन्वय सामंजस्य की सियासत को मजबूती देने के लिए जमीनी जमावट और दूसरे एडजस्टमेंट के साथ क्या मोदी मंत्रिमंडल में मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व का नए सिरे से पुनर्गठन और जेपी नड्डा की टीम में समुचित प्रभावी प्रतिनिधित्व के साथ बड़ा सवाल क्या शिवराज मंत्रिमंडल का पुनर्गठन और दो से तीन उपमुख्यमंत्री का एडजस्टमेंट, विष्णु दत्त शर्मा की टीम में अनुभवी नेताओं की आवश्यकता पार्टी नेतृत्व महसूस करेगा.. क्या जिन्हें विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ना या टिकट नहीं दिया जाएगा क्या उन चेहरों को मंत्रिमंडल से बाहर करने का साहस भाजपा जुटा पाएगी.. या इन्हे लोकसभा चुनाव 2024 लड़ने का इशारा दिया जाएगा.. यही नहीं विष्णु दत्त की टीम में शामिल उन महत्वाकांक्षी पदाधिकारियों और दूसरे नेताओं को संगठन से बाहर किया जा सकता है ..जो चुनाव के लिए टिकट की जोड़-तोड़ में अभी से जुट गए हैं..

या मंत्री नहीं बन पाने के कारण अभी तक एडजस्टमेंट तक सीमित होकर रह गए थे.. सवालों के घेरे में तो मीडिया मैनेजमेंट भी आ चुका है.. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया से आगे सोशल मीडिया में भाजपा की बढ़ती दिलचस्पी के लिए पार्टी में तमाम गुंजाइश से बनी हुई है.. भाजपा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मुख्यमंत्री केंद्रीय मंत्रियों और दूसरे महत्वपूर्ण नेताओं के टि्वट, फेसबुक पोस्ट को आगे नहीं बढ़ाया जाना चर्चा में आ चुका है.. लाख टके का सवाल क्या नरेंद्र सिंह तोमर ज्योतिरादित्य सिंधिया कैलाश विजयवर्गीय ही नहीं पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को कोई जिम्मेदारी चुनाव को ध्यान में रखते हुए सौंपी जा सकती है.. संदेश हाईकमान के भरोसे चुनाव में जाने का सामने आएगा या फिर सबसे मजबूत कैडर और प्रभावी संगठन का उदाहरण प्रस्तुत करता रहे मध्य प्रदेश के भाजपा नेता ही बड़ी भूमिका में मिलजुल कर आगे बढ़ते हुए नजर आएंगे..

भाजपा का असरदार जोड़ीदार कौन..?

भाजपा में नेताओं की भरमार चुनाव जीतने और जिताने वाले असरदार और प्रभावी.. महत्वाकांक्षी और जिद्दी.. पार्टी में दूसरे नेताओं की तुलना में मध्य प्रदेश की जोड़ी शिवराज सिंह चौहान और विष्णु दत्त शर्मा के अलावा दिल्ली में नरेंद्र तोमर और ज्योतिरादित्य की जोड़ी दूसरी जोड़ियों पर भारी ही नहीं प्रभावी भी साबित होती हुई देखी जा सकती.. नरोत्तम मिश्रा और कैलाश विजयवर्गीय दिल्ली में अमित शाह के निकट और भरोसेमंद जिनका चुनाव में भूमिका निभाने वाले मालवा के इंदौर से नाता.. नरोत्तम मिश्र इंदौर के प्रभारी जहां कैलाश राजनीति की नई संभावनाएं तलाश रहे. उमा भारती और प्रहलाद पटेल लोधी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते.. कई सीटों पर यह जोड़ी भी प्रभाव छोड़ती रही.. चुनाव के मुहाने पर खड़ी भाजपा के कई राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेताओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. लेकिन चुनाव में मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष और दिल्ली के दो केंद्रीय मंत्री को मुख्य किरदार माना जा सकता है.. सवाल इन जोड़ी के बीच किसमें बेहतर समन्वय कौन किसको ज्यादा सम्मान देता या कौन किसकी टांगे ज्यादा खींच लेता है..

मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष सरकारी और संगठन के कार्यक्रम में जनता और कार्यकर्ता के बीच बेहतर समन्वय की मिसाल प्रस्तुत जरूर करते हैं.. लेकिन अंदर खाने अनबन से लेकर मतभेदों की चर्चा भी अब बाहर आने लगी है.. वह बात और है कि वरिष्ठ, अनुभवी शिवराज कहां विष्णु के सर पर कई बार देखा गया तो विष्णु ने भी पांव छूकर आशीर्वाद लेने में कोई हिचक नहीं दिखाई.. तस्वीरें कार्यक्रम से आगे हवाई जहाज में भी गले मिलते हुए देखी जा चुकी है.. पर भोपाल से लेकर दिल्ली तक दोनों के बीच सबकुछ ठीक-ठाक पार्टी में ही इस पर सवाल खड़े करने वाले मिल जाएंगे.. अगर यह सच है तो पार्टी नेतृत्व को यह सोचना होगा कि कमजोर शिवराज हो या फिर हाथ बांध दिए गए विष्णु चुनाव में पार्टी के लिए कितने उपयोगी और असरदार साबित होंगे.. शिव विष्णु भाजपा के नीति निर्धारक और सरकार और संगठन की दशा और दिशा को रेखांकित करने वाली बड़े चेहरे..

लेकिन मोदी मंत्रिमंडल के 2 सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया और नरेंद्र सिंह तोमर दोनों ग्वालियर चंबल का प्रतिनिधित्व करते हैं.. दोनों कई चुनाव में एक दूसरे के सामने खड़े देखे जा चुके.. कमलनाथ सरकार के तख्तापलट के बाद इन दोनों नेताओं की जुगलबंदी से उपचुनाव में पार्टी को जीत भी हासिल हुई.. ग्वालियर अंचल की राजनीति में दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा मुद्दों की टकरा हट विकास का श्रेय लेने की होड़ और समर्थकों को समायोजित करने की चुनौती के बावजूद दिल्ली में दोनों मोदी शाह के दरबार में साफ-साफ तो भोपाल आते ही कदमताल करते हुए दिखते हैं.. अंदर खाने तमाम मतभेदों के बावजूद भोपाल की धरती पर सिंधिया नरेंद्र सिंह को आगे लाकर उनके स्वागत की मानव कमान संभाल लेते.. शिवराज के उत्तराधिकारी की दौड़ में विष्णु दत्त तो सीएम इन वेटिंग के बड़े चेहरों में ज्योतिरादित्य नरेंद्र तोमर की दावेदारी से इनकार नहीं किया जा सकता..वो कहते है ना जोड़ियां तो उपरवाला बनाता है…लेकिन सियासत में जोड़ियां खुद ही बनानी होती हैं….चुनाव में जोड़ी बनाने भर से भी काम नहीं चलता…वो जोड़ीदार वाकई एक दूसरे का कितना साथ निभाते हैं…कितना साथ चल पाते हैं…कितना भरोसा निभाते हैं…ये तो उन जोड़ियों की कामयाबी से तय होता है…देश और प्रदेश की सियासत में कई जोड़ियां बनी जो बेहद कामयाब रहीं…इनमें अटल आडवाणी की जोड़ी भारतीय राजनीतिक इतिहास की सबसे सफल और भरोसेमंद जोड़ी मानी गई… लेकिन मोदी शाह की जोड़ी सब पर भारी साबित हो चुकी है..मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां भी कई सियासी जोड़ियां बनी…

और कामयाब रहीं…..पिछले डेढ़ दशक में शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के नेताओं और राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ भी कदम मिलाकर चलते नजरआए.. मध्यप्रदेश में शिवराज के साथ बनी सियासी जोड़ियों की….तो सवाल शिव के साथ किसकी जोड़ी रही नंबर 1…..और वो कौनसा राज है कि शिव हर जोड़ी में फिट भी हैं और हिट भी हैं…. शिवराज सिंह चौहान को राजनीतिक सफर में कई राजनेताओं का भरपूर साथ मिला…तो शिवराज भी हर साथी का दमदारी से साथ निभाते नजर आए…लेकिन बदलती परिस्थितियों और चुनौतियों के बीच सवाल उठता है कि क्या सभी जोड़ियों का महत्व एक समान है या फिर शिव की कुछ नेताओं के साथ ज्यादा ट्यूनिंग थी…आखिर कौन है वो चेहरा जिसके साथ शिव की जोड़ी बनी नंबर वन…इस पर कुछ सवाल ..मध्यप्रदेश से लेकर दिल्ली की राजनीति में शिवराज के साथ बनी जोड़ियों में किसने छाप छोड़ी ? डेढ़ दशक में जिसमें 15 महीने विपक्ष की भूमिका भी शामिल सबसे भरोसेमंद जोड़ी शिवराज के साथ आखिर कौन ?शिवराज मुख्यमंत्री तो प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर दो बार फिर मोदी सरकार में मंत्री क्या सबसे मजबूत जोड़ी शिव नरेंद्र की ?15 महीने का सियासी वनवास खत्म होने पर शुभंकर साबित हुए प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा के साथ शिव की जोड़ी ज्यादा भरोसेमंद ?चौथी बार शिवराज सरकार बनाने का अहम किरदार निभा रहे ज्योतिरादित्य के साथ क्या शिव -ज्योति एक्सप्रेस दूसरी जोड़ियों पर भारी ?ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे का दावा करने वाले शिव-कैलाश की पुरानी जोड़ी के नए तेवर कितने भरोसेमंद शिवराज जिन नरोत्तम को अपना संकटमोचक कहते हैं…मध्यप्रदेश में सत्तापक्ष से जुड़े 2 बड़े चेहरे शिवराज-नरोत्तम का कदमताल क्या कहता ?केंद्र में बदलती जोड़ियां चाहे फिर अटल – आडवाणी या मोदी – शाह के युग में भी शिवराज मध्य प्रदेश सरकार का स्वीकार्य चेहरा कैसे बने रहे ?बीजेपी के बदलते प्रदेश अध्यक्ष, केंद्रीय मंत्री, महामंत्री, उपाध्यक्ष किसके साथ शिवराज की जोड़ी क्यों और कैसे असरदार सिद्ध हुई ? बड़ा सवाल मध्य प्रदेश में नया कीर्तिमान रचने वाली शिवराज सिंह चौहान की सबसे मजबूत जोड़ी किसके साथ याद की जाएगी ?

जोड़ी नंबर वन केंद्रीय राजनीति में खास तौर से भाजपा के अंदर मोदी शाह की जोड़ी ने एक नया उदाहरण पेश किया तो लोगों को सोचने को मजबूर किया है…लेकिन बात मध्य प्रदेश की जब भी होगी तो पिछले डेढ़ दशक में जो जोड़ियां बनी….उसमें शिवराज एक खास चेहरा बने रहे… उनकी खासियत भी यही सामने आई कि जोड़ीदार के तौर पर जो भी उनसे जुड़ा… लक्ष्य हासिल होने तक कदमताल करता रहा….अभी तक विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखें तो शिवराज की नरेंद्र सिंह के साथ मजबूत भरोसेमंद जोड़ी हो.. या फिर मिशन 2023 चुनाव को ध्यान में रखते हुए शिव विष्णु की जोड़ी हो ..या फिर कमलनाथ सरकार गिरा कर सरकार चलाने के लिए जरूरी शिव- ज्योति एक्सप्रेस हो…इन्होंने समय-समय पर अपनी उपयोगिता साबित की है.. जिस तरह शिवराज अपने दूसरे जोड़ीदार का भरोसा जीत कर दिखाते रहे उसने बदलती बीजेपी में कई कीर्तिमान ध्वस्त किए तो नए रिकॉर्ड भी बना दिए… पीढ़ी परिवर्तन के दौर में बदलती बीजेपी की दिशा को समझा जा सकता है ..फिर भी लाख टके का सवाल बदलते राजनीतिक परिदृश्य में आखिर यह चर्चित जोड़ियां क्या कहती हैं…. और इनसे क्या उम्मीद की जाए..

राकेश अग्निहोत्री

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