बेशक सेल फोन क्षेत्र में ओलिगोपॉली का मुद्दा उठा कर कांग्रेस ने प्रमुख विपक्षी दल की अपनी भूमिका का निर्वाह किया है। अब जरूरत इस बात की है कि इस पर जन-चेतना लाते हुए इसे प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया जाए।
कांग्रेस ने सेल फोन और इंटरनेट सेवा क्षेत्र में ऑलिगोपॉली कायम होने का संगीन इल्जाम लगाया है। आम अनुभव के आधार पर ये कहा जा सकता है कि इस आरोप में दम है। इसलिए कांग्रेस ने इस सिलसिले में जो सवाल पूछे हैं, उन पर सरकार से जवाब की अपेक्षा है। सार्वजनिक विमर्श में भी उस पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए। ऑलिगोपॉली उस स्थिति को कहते हैं, जब अर्थव्यवस्था के किसी क्षेत्र पर चंद कंपनियों का कब्जा हो जाता है और फिर वे कंपनियां आपसी गुटबाजी के साथ उस क्षेत्र में कीमतें और सेवा संबंधी अन्य शर्तें तय करती हैं। सेल फोन और इंटरनेट सेवा क्षेत्र में आज भारत में तीन कंपनियां ही मुख्य रूप से बची हैं। उनमें भी मोटे तौर पर दो कंपनियों- रिलायंस जिओ और एयरटेल भारती का ही दबदबा है। कांग्रेस ने ध्यान खींचा है कि 3-4 जुलाई से तीनों कंपनियों ने सेवा शुल्क में भारी बढ़ोतरी कर दी है। ऐसी खबरें पहले ही आई थीं कि ये कंपनियां शुल्क वृद्धि के लिए लोकसभा चुनाव खत्म होने का इंतजार कर रही हैं।
तभी सवाल उठा था कि क्या ये कंपनियां सत्ताधारी पार्टी की सहायता के लिए व्यापारिक निर्णय लागू करने में चुनाव खत्म होने तक की देर कर रही हैं? अब कांग्रेस ने पूछा है कि सरकार ने उन कंपनियों को एकतरफा ढंग से शुल्क वृद्धि की इजाजत कैसे दे दी, जिनके दायरे में भारत के 92 फीसदी सेल फोन यूजर आते हैं? इस कदम से कंपनियों को साझा तौर पर 34,824 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सालाना कमाई होगी। कांग्रेस का आरोप है कि इस बारे में आंखें मूंद कर सरकार और टेलीकॉम रेगुलेटरी ऑथरिटी ऑफ इंडिया ने 109 करोड़ उपभोक्ताओं के प्रति अपने कर्त्तव्य की अनदेखी की है। पार्टी ने पूंजीगत व्यय और स्पेक्ट्रम आवंटन संबंधी निर्णयों के जरिए भी इन कंपनियों को लाभ पहुंचाने का इल्जाम लगाया है। यह निर्विवाद है कि ओलिगोपॉली का मुद्दा उठा कर कांग्रेस ने प्रमुख विपक्षी दल की अपनी भूमिका का निर्वाह किया है। अब जरूरत इस बात की है कि इस पर जन-चेतना लाते हुए इसे प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया जाए।