अब बीरेन सिंह ने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया है, तो उचित रास्ता तुरंत विधानसभा भंग कर मणिपुर में नया चुनाव कराना होगा। इस बीच किए गए किसी शासन इंतजाम से प्रदेश में सामान्य स्थिति बहाल होने की आशा न्यूनतम ही रहेगी।
आखिरकार भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को हटाने पर राजी हुआ। मगर जिन हालात में सिंह ने इस्तीफा दिया, उससे किसी नई, सद्भावपूर्ण पहल की तुरंत उम्मीद पैदा नहीं हुई है। वजह यह कि ये कदम तब उठाया गया, जब राज्य में सत्ताधारी नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (एनडीए) में बीरेन सिंह के खिलाफ बगावत को संभालना मुश्किल दिखने लगा। सोमवार से तय विधानसभा सत्र से दो दिन पहले जब एनडीए विधायक दल की बैठक बुलाई, तो खबरों के मुताबिक उसमें सत्ताधारी गठबंधन के 46 में से सिर्फ 20 विधायक हाजिर हुए। तब इस आशंका ने ठोस रूप ले लिया कि सिंह सरकार अविश्वास प्रस्ताव पर हार सकती है। तब वो कदम उठाया गया, जिसकी जरूरत मई 2023 में राज्य के हिंसा-ग्रस्त होने के समय से महसूस की जा रही थी।
सिंह का आचरण लगातार जनमत के कठघरे में था। अगस्त 2024 में ऑडियो टेप लीक होने की घटना ने उनकी जमीन को और भुरभुरा कर दिया था। इसमें उन पर नस्लीय अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ कथित भड़काऊ बातें कहने का आरोप लगा था। वो टेप सुप्रीम कोर्ट में भी पेश किया गया। बाद में एक लैब ने अपनी जांच के बाद कहा कि टेप में दर्ज आवाज 93 फीसदी तक सिंह की आवाज से मिलती है। इससे ये धारणा गहराई की सभी समुदायों का हित-रक्षक होने के बजाय बीरेन सिंह ने हिंसा काल में बहुसंख्यक मैतेई समुदाय के नेता के रूप में काम किया है। इन परिस्थितियों में उनके पद पर रहते किसी मेल-मिलाप की गुंजाइश बेहद सीमित हो गई थी।
बहरहाल, अब उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया है, तो उचित रास्ता तुरंत विधानसभा भंग कर नया चुनाव कराना होगा। इस बीच किए गए किसी शासन इंतजाम से प्रदेश में सामान्य स्थिति बहाल होने की आशा न्यूनतम ही रहेगी। केंद्र सरकार और भाजपा नेतृत्व को कम-से-कम मणिपुर में अपने राजनीतिक हितों पर राष्ट्रीय हित को तरजीह देनी चाहिए, जहां कानून- व्यवस्था के साथ-साथ सामुदायिक- सांप्रदायिक संबंध बिगड़ते चले गए हैँ। ऐसा नहीं किया गया, तो बीरेन सिंह के इस्तीफे से मिला मौका हाथ से चला जाएगा।