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04-04-2025 Vol 19

स्वागतयोग्य, पर काफी नहीं

निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की बढ़ती गई समस्याओं की जड़ में आज का आर्थिक ढांचा है। दुनिया भर में श्रमिक वर्ग इस ढांचे का ऐसा ही प्रभाव देखने को मिला है। इसलिए विनियमन स्वागतयोग्य है, इससे कुछ लाभ होगा, मगर यह पर्याप्त नहीं है।

महाराष्ट्र और कर्नाटक की सरकारें ऑफिस कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए सख्त नियमों और उन पर अमल के निरीक्षण की तैयारी में हैं। यह कदम अर्न्स्ट एंड यंग (ईवाई) की एक युवा कर्मचारी की मौत के बाद उठाया जा रहा है। तब उस मौत का कारण काम का अत्यधिक दबाव बताया था। भारत में वाइट-कॉलर यानी दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए सुरक्षा के नियम लगभग ना के बराबर हैं। उदारीकरण के दौर में, जब कंपनियों ने मुनाफा बढ़ाने के लिए कॉस्ट कटिंग की पॉलिसी अपना ही है, तब कम कर्मचारियों से अधिक काम लेना आम चलन बन गया है। जो कर्मचारी इसमें पिछड़ते हैं, उनकी नौकरी खतरे में पड़ जाती है।

अनियमित घंटों तक काम और मनमानी बर्खास्तगी आज वाइट-कॉलर कर्मियों की आम समस्या है। इसका बहुत खराब असर खासकर युवा कर्मियों पर पड़ा है। ईवाई कर्मचारी की मौत के बाद ये सारे मुद्दे बहुचर्चित हुए थे। उसका प्रभाव सरकारों पर पड़ा है। कर्नाटक में अधिकारियों ने निजी कंपनियों में ऑफिस में कामकाज की स्थिति की जांच शुरू की है। महाराष्ट्र में भी एक ऐसा प्रस्ताव विचाराधीन है। बताया गया है कि प्रस्तावित नियम कंपनियों में नियुक्ति और बर्खास्तगी की प्रक्रियाओं की विनियमित नियंत्रित करेगा। इसमें सभी कॉरपोरेट कर्मचारियों को शामिल किया जाएगा। उनमें मैनेजर स्तर स्टाफ भी शामिल होंगे।

कर्नाटक के अधिकारियों का कहना है कि यह कदम कर्मचारियों की अत्यधिक काम की शिकायतों को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है। यह तथ्य है कि भारत में युवा आत्म-हत्या के मामले बढ़े हैं। किशोरों और युवाओं के बीच मृत्यु का चौथा सबसे प्रमुख कारण कामकाज का बढ़ा दबाव है। बेशक ये आंकड़े भारत में मानसिक स्वास्थ्य और युवाओं में बढ़ते तनाव का संकेत हैं। बहरहाल, अहम सवाल है कि क्या कानून या विनियम लागू करने से ऐसी समस्याओं का समाधान हो सकता है? वाइट कॉलर हों या ब्लू कॉलर कर्मी, उनकी बढ़ती गई समस्याओं की जड़ में आज का आर्थिक ढांचा है। दुनिया भर में श्रमिक वर्ग इस ढांचे का ऐसा ही प्रभाव देखने को मिला है। इसलिए विनियमन स्वागतयोग्य है, इससे कुछ लाभ होगा, मगर यह पर्याप्त नहीं है।

NI Editorial

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