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28-02-2025 Vol 19

सीईओ’ज का ‘विकसित भारत’

वित्त वर्ष 2023-24 में एलएंडटी के सीईओ एसएन सुब्रह्मण्यम की कमाई 51.5 करोड़ रु. रही। यह एलएंडटी के कर्मचारियों की औसत तनख्वाह से लगभग 535 गुना ज्यादा है। कर्मचारियों का औसत वार्षिक वेतन 9.55 लाख रुपये ही था।

भारत में कंपनियों के सीईओ कर्मचारियों के कामकाज के घंटों की हर सीमा हटा देना चाहते हैं। पहले इन्फोसिस के संस्थापक एनआर नारायण मूर्ति ने वकालत की थी कि कर्मचारी एक हफ्ते में 70 घंटे काम करें। अब एलएंडटी के सीईओ एसएन सुब्रह्मण्यम ने कहा है कि कर्मचारियों को 90 घंटे काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनका वश चले, तो वे रविवार को भी कर्मचारिओं को काम करने पर बुलाएंगे। फिर एक अजीब टिप्पणी कर बैठे कि घर पर बैठ कर कर्मचारी कब तक ‘पत्नियों को निहारते’ रहेंगे! कुछ अन्य सीईओ’ज ने भी इस सुझाव का समर्थन किया है। सीईओ कर्मचारियों के अधिकारों को नहीं दिल से स्वीकार नहीं करते, यह तो उनके बात-व्यवहार से पहले भी जाहिर होता था।

लेकिन नया ट्रेंड यह है कि इससे इनकार से राष्ट्र निर्माण को जोड़ा जा रहा है। नारायण मूर्ति ने भी ऐसी बात कही थी। अब सुब्रह्मण्यम ने कहा है कि असाधारण लक्ष्य हासिल करने के लिए असाधारण प्रयास करने होते हैं- “विकसित भारत” बनाने के लिए जरूरी है कि कर्मचारी ऐसे प्रयास में शामिल हों। तो सीईओ’ज ने पॉलिटिकली करेक्ट होते हुए खुद को इकॉनमिकली समृद्ध होने की एक नई जुगाड़ लगाई है। ऐसा नहीं होता, तो साथ-साथ ही वे असाधारण प्रयास से हासिल लाभ के भी बंटवारे की बात करते। इसी बहस के दौरान सामने आए इस तथ्य पर गौर करेः वित्त वर्ष 2023-24 में सुब्रह्मण्यम की कमाई 51.5 करोड़ रु. रही। यह एलएंडटी के कर्मचारियों की औसत तनख्वाह से लगभग 535 गुना ज्यादा है।

कर्मचारियों का औसत वार्षिक वेतन 9.55 लाख रुपये था। केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन उद्योगपतियों के सामने जाकर कर्मचारियों का वेतन ना बढ़ाने के लिए उन्हें फटकार लगा चुके हैं। नागेश्वरन ने एसोचैम की बैठक में कहा था कि कंपनियों का मुनाफा रिकॉर्ड स्तर पर है, जबकि कर्मचारियों की वास्तविक आय गतिरुद्ध है। क्या बेहतर नहीं होता कि सीईओ’ज इस विसंगति को सुधारने की दिशा में भी ‘असाधारण प्रयास’ करते! चूंकि वे ऐसा करते हुए नहीं दिखते, इसलिए उनके ऐसे बयानों को लेकर उनके मकसदों पर उठाए जाने वाले सवालों को वाजिब ही कहा जाएगा।

NI Editorial

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