Expenditure On Consumption: बढ़े उपभोग खर्च में महंगाई की भी एक भूमिका है। सरकार की ओर से मासिक उपभोग खर्च के बारे में जारी आंकड़ों से आंकना कठिन है कि कितना उपभोग बढ़ा और कितनी वृद्धि उपभोग की चीजों की महंगाई के कारण हुई।
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मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग सर्वेक्षण (एमपीसीई) रिपोर्ट तो कुछ पहले आई थी, लेकिन अब केंद्र ने इसकी एक तथ्य तालिका जारी की है।
इसमें भी वही दिखाने की कोशिश है कि अगस्त 2023 से सितंबर 2024 की अवधि में उसके पहले वाले वर्ष की तुलना में लोगों का प्रति महीने उपभोग खर्च बढ़ा।
स्पष्टतः सरकार इसे शहर से गांवों तक में आय और खुशहाली बढ़ने के प्रमाण के रूप में पेश किया है। मगर जो सवाल सर्वे रिपोर्ट जारी होने के समय उठे, उनका कोई जवाब नहीं दिया गया है।
विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि सबसे ज्यादा खर्च खाद्य पदार्थों पर बढ़ा। जिस अवधि में यह सर्वे हुआ, उसमें खाद्य मुद्रास्फीति की दर ऊंची रही।
फिर पुराने सर्वेक्षणों की तुलना में सर्वे विधि में जो परिवर्तन किए गए, उन्हें ध्यान में रखते हुए यह आंकना और मुश्किल हो गया है कि लोगों के उपभोग पैटर्न में सचमुच कितना बदलाव आया।
महंगाई के कारण
खुद ताजा रिपोर्ट से ही जाहिर हुआ कि टॉप 10 प्रतिशत आबादी के उपभोग में पर्याप्त वृद्धि हुई, जबकि सबसे निचली पांच फीसदी आबादी के वास्तविक खर्च में बढ़ोतरी मद्धम रही।
निचली आर्थिक श्रेणी की आबादी में जो वृद्धि दिखती है, उसमें बड़ा योगदान सरकार की तरफ से दिए जा रहे पांच किलो अनाज और प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण योजनाओं का है।
जाहिर है, इसे कमाई से होने वाली आमदनी की स्थिति में सुधार नहीं कहा जा सकता। एक अन्य तथ्य यह सामने आया है कि ग्रामीण इलाकों में जो उपभोग खर्च बढ़ा, खाद्य के अलावा उसका सबसे बड़ा हिस्सा इलाज, परिवहन, वस्त्र और जूते-चप्पल के हिस्से में गया।
इन चीजों की लागत में भी महंगाई की एक भूमिका है। इसलिए आंकना कठिन है कि कितना उपभोग बढ़ा और कितनी वृद्धि पहले जितनी चीजों की महंगाई के कारण हुई।
ये सारे उल्लेख सरकार की नकारात्मक छवि बनाने के लिए नहीं किए जा रहे हैं। मगर अपने आंकड़ों को लेकर विश्वास का संकट खुद सरकार ने खड़ा किया है।
वह सभी दायरों के विशेषज्ञों को लेकर संवाद और विश्लेषण के लिए तैयार हो, तो अविश्वास का हल निकल सकता है। क्या सरकार ऐसा करेगी?