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अयोध्या फिर न बने युद्धभूमि

कुंभ के अवसर पर आयोजित धर्म-संसद में विश्व हिंदू परिषद ने जो घोषणा की है, उसके कारण देश के रामभक्त बेहद परेशान दिख रहे हैं। उन्हें आशा थी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विहिप के दबाव के चलते मोदी सरकार राम मंदिर का निर्माण अयोध्या में तुरंत शुरु कर देगी। संघ और विहिप, दोनों ने अदालत के फैसले का इंतजार करने का इरादा छोड़ दिया था और प्रधानमंत्री मोदी से आग्रह किया था कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए वह अध्यादेश जारी करें। 

लेकिन अब इन संगठनों ने अगले चार-पांच माह के लिए चुप्पी साध ली है। वे न तो कोई मांग करेंगे और न ही कोई आंदोलन करेंगे, क्योंकि इसे वे एक घटिया चुनावी मुद्दा नहीं बनाना चाहते। इसमें शक नहीं कि इस मुद्दे को लेकर सारे दल जूतों में दाल बांटते और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे खूंटी पर टंग जाते। सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा का होता। उसकी दशा कांग्रेस-जैसी हो जाती। जो नई सरकार बनती, उसका क्या पता, वह कैसी होती?

शायद वह राम मंदिर के मुद्दे  को मोदी सरकार की ही तरह दरी के नीचे सरका देती। या खुद राम मंदिर खड़ा करके वह भाजपा, संघ और विहिप की जड़ों को मट्ठा पिला देती। कांग्रेस ने तो ऐसा संकेत भी दे दिया है। इस मामले में मेरी स्पष्ट राय है कि यह मामला न अदालत सुलझा सकती है और न ही कोई आंदोलन ! ये दोनों रास्ते ऐसे हैं, जिनसे राम-मंदिर का मामला आगे जाकर भारत के गले का पत्थर बन जाएगा। 

इस मामले का स्थायी और सर्वमान्य हल यह है कि अयोध्या की इस कुल 70 एकड़ जमीन में एक सर्वधर्म तीर्थ खड़ा किया जाए, जहां राम का अपूर्व विश्व-स्तरीय सुंदर मंदिर बने और शेष स्थानों पर भारत के ही नहीं, विश्व के सभी प्रमुख धर्मों के पूजास्थल बन जाएं। उनका एक संग्रहालय और पुस्तकालय भी बने। 

सरकार ने अधिग्रहीत जमीन उसके मालिकों को वापिस लौटाने की जो याचिका अदालत को दी है, वह उसने उचित नहीं किया है। उसे वह तुरंत वापस ले। स्वामी स्वरुपानंदजी भी तीनों याचिकाकर्ताओं से बात करें। उन्हें सहमत करवाएं। 21 फरवरी से आंदोलन न छेड़ें। सांसारिक नौकरशाहों के नौकरों याने हमारे नेताओं पर आध्यात्मिक कृपा करें। उनकी बुद्धि और विवेक को जागृत करें। अयोध्या को 21 वीं सदी की नई युद्ध-भूमि न बनने दें।

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