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हमारे दब्बू नेताओं का ढोंगीपन

केरल के सबरीमाला मंदिर ने हमारे राजनीतिक दलों और नेताओं की पोल खोल कर रख दी है। देश के दो बड़े दल- भाजपा और कांग्रेस-- कितने कमजोर हैं और इनके नेता कितने दब्बू हैं या यह कहें कि वे नेता ही नहीं है तो ज्यादा सही होगा। यदि दो महिलाओं ने सबरीमाला मंदिर में बड़े सबेरे जाकर पूजा कर ली तो उन्होंने कौन सा पाप कर दिया? उन्होंने देवता की पूजा ही की। उनका अपमान तो नहीं किया। वे औरतें हिंदू ही थीं और यदि उनकी उम्र 10 से 50 के बीच थी तो भी उन्होंने क्या गुनाह किया है? 

उन्होंने तो भारत के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के मुताबिक ही आचरण किया है। वे रजस्वला थीं या नहीं, यह भी पता नहीं लेकिन देखिए पूरे केरल में कितनी धींगामुश्ती मची है। हजारों लोग सड़क पर उतर आए, सैकड़ों घायल हुए, एक का निधन हो गया और सैकड़ों को गिरफ्तार करना पड़ा। स्कूल, कॉलेज, बाजार बंद हो गए। यह सब क्यों हुआ? क्योंकि भाजपा और कांग्रेस के नेता केरल की मार्क्सवादी सरकार को कठघरे में खड़ा करना चाहते हैं। 

केरल के मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन, जो कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लागू करना चाह रहे हैं, वे इन दकियानूसी धर्मांध तत्वों के विरुद्ध सीना ताने खड़े हुए हैं। विजयन मार्क्सवादी हैं, इसलिए वे धर्म और पाखंड, दोनों के खिलाफ हैं। प्रांतीय सरकार के मुखिया होने के नाते वे अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। जो दल 2019 में केंद्र में सत्तारुढ़ होने का दावा कर रहे हैं, जरा देखिए उनका रवैया क्या है? न्यायपालिका का वे अपमान कर रहे हैं। उनका ढोंगीपन देखिए। दिल्ली में वे अदालत के फैसले को अच्छा बताते हैं और केरल में अपने अनुयायियों को उसके खिलाफ दंगल करने देते हैं। 

अगर ये नेता सचमुच नेता होते तो ये अपने कार्यकर्ताओं पर कसके लगाम लगाते लेकिन ये नेता नहीं, पिछलग्गू हैं। ये वोट और नोट के पिछलग्गू हैं। ये सबरीमाला मंदिर के ब्रह्मचारी देवता अयप्पा के भक्त नहीं हैं, ये केरल की मार्क्सवादी सरकार के दुश्मन हैं। इस मामले को वे हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। हमारे सर्वज्ञजी भी उस मुद्दे पर मौनी बाबा बने हुए हैं। वे राम मंदिर पर अदालत से लटके हुए हैं। 

यदि अदालत ने कोई सबरीमाला- जैसा फैसला दे दिया तो वे क्या करेंगे ? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और शिव सेना के मारे उन्हें भागने का रास्ता भी नहीं मिलेगा। इसीलिए मैं कहता हूं कि इस तरह के धार्मिक और पारंपरिक मामलों को सुलझाने की कोशिशें अदालतों के जरिए कम, बातचीत, समाज-सुधार और लोक-शिक्षण के जरिए ज्यादा होनी चाहिए।

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