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सीबीआईः फिजूल का विवाद

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक के पद पर ऋषि कुमार शुक्ला की नियुक्ति को लेकर कांग्रेस ने जो विवाद खड़ा किया है, वह अनावश्यक लगता है। यह ठीक है कि शुक्ला पहले कभी इस ब्यूरो के अफसर नहीं रहे लेकिन वे मप्र के वरिष्ठतम पुलिस अफसर रह चुके हैं और उन्हें लगभग दस वर्ष का गुप्तचरी का अनुभव भी है। कांग्रेस ने लगभग दो साल पहले सीबीआई के निदेशक के पद पर आलोक वर्मा की नियुक्ति का भी जमकर विरोध किया था लेकिन जब वर्मा और केंद्र सरकार से मुठभेड़ हुई तो कांग्रेस पार्टी वर्मा की तारीफों के पुल बांधने लगी। 

इसका अर्थ क्या हुआ ? क्या यह नहीं कि मोदी-सरकार का दुश्मन कांग्रेस का मित्र, अपने आप बन जाएगा ? याने शत्रु का शत्रु, मित्र कहलाएगा ? क्या यह नीति किसी भी देश को ठीक राह पर चलने देगी ? सीबीआई निदेशक की नियुक्ति करने वाले पेनल में प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और संसद में विपक्ष का नेता होता है। इन तीनों में से प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश ने शुक्ला को चुना लेकिन कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने विरोध किया। उनके विरोध का मुख्य तर्क यह था कि शुक्ला को भ्रष्टाचार के मामले की जांच का अनुभव नहीं है, जो कि इस पद पर नियुक्ति की एक शर्त है। 

यह ठीक है लेकिन इस पद के लिए अन्य जितनी भी शर्तें हैं, उन सब में शुक्ला किसी से कम नहीं है। बल्कि ज्यादा ही है। मप्र में पुलिस महानिदेशक के तौर पर शुक्ला ने कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं और वे वरिष्ठता में अन्य उम्मीदवारों से आगे हैं। उनकी ईमानदारी और कर्मठता की भी सराहना होती रही है। उन्होंने कई भ्रष्ट पुलिस अफसरों को बर्खास्त किया है और कइयों के खिलाफ जांच भी बिठाई है। उन्होंने 2005 में अबू सलेम और मोनिका बेदी जैसे तिकड़मी अपराधियों को विदेश से पकड़कर भारत में लाने में भी अग्रणी भूमिका निभाई है। 

जहां तक भ्रष्टाचार की जांच के अनुभव का सवाल है, कौन सा ऐसा एक भी पुलिसवाला देश में है, जिसका भ्रष्टाचार से पाला नहीं पड़ा है ? क्या ही अच्छा होता कि यह नियुक्ति सर्वसम्मति से होती। सभी नियोक्ताओं की इज्जत बढ़ती।

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