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यौन शोषण: भारत कैसे बचे ?

अमेरिका में चले मी टू (मैं भी) अभियान की तरह महिलाओं का अभियान अब भारत में भी चल पड़ा है। अब कई महिलाएं खुलकर बता रही हैं कि किस अभिनेता या किस संपादक या किस अफसर ने कब उनके साथ बलात्कार करने, अश्लील हरकतें करने, डरा-धमकाकर व्यभिचार करने की कोशिशें की हैं। अभी तो नेताओं और प्रोफेसरों के नाम खुलने शुरु नहीं हुए हैं। यदि वे नाम भी सामने आने लगे तो हमारे अखबारों और टीवी चैनलों की पौ-बारह हो जाएगी। उनके पाठक और दर्शक करोड़ों की संख्या में बढ़ जाएंगे। 

आपने कभी सोचा कि इस मुद्दे पर हमारे अखबारों में संपादकीय लेख क्यों नहीं आ रहे हैं? इसीलिए कि जहां-जहां सत्ता है, वहां-वहां दुराचार की उत्कट संभावना है। यह शाश्वत सत्य है। यह सत्य सभी देशों और सभी कालों पर लागू होता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की करतूतों को लेकर यह अभियान शुरु हुआ लेकिन अब यह सारे देशों, सारे शहरों और गांवों में फैलेगा। यह अच्छा ही है। इससे अब नारी-जाति को अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षा मिलेगी लेकिन यहां खतरा यह भी है कि इस अभियान का इस्तेमाल किसी आदमी से बदला निकालने, पैसा मूंडने, बदनाम करने और ब्लेकमेल करने के लिए भी किया जा सकता है। 

संतोष का विषय है कि ऐसी संभावनाओं का मुकाबला करने के लिए दफ्तरों और जिलों में निगरानी कमेटियां बनाई जा रही हैं, जिनकी मुखिया महिलाएं ही होंगी। लेकिन जब किसी महिला को मैं यह कहते हुए सुनता हूं कि फलां आदमी ने मेरे साथ बार-बार बलात्कार किया तो मैं सोचता हूं कि उस औरत को उस बलात्कारी से दुगुनी सजा मिलनी चाहिए, क्योंकि जब पहली बार उसके साथ जोर-जबर्दस्ती हुई तो उसने शोर क्यों नहीं मचाया ? वह दूसरी बार उसी आदमी के पास गई, इसका मतलब साफ है कि उसकी मौन स्वीकृति थी। लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि सिर्फ सजा के डर से बलात्कार या व्यभिचार नहीं रुक सकता। 

कड़ी सजा तो होनी ही चाहिए लेकिन सजा से बड़ा संस्कार है। यदि बचपन से किसी ने संस्कार का कवच पहन रखा हो तो उस कवच को राफेल का प्रक्षेपास्त्र और बोफोर्स की तोप भी नहीं तोड़ सकती। अब से पचास साल पहले सोवियत रुस के खुले स्वेच्छाचार (ओपन सेक्स) और कोलंबिया युनिवर्सिटी में न्यूयार्क के शिथिल आचरण के माहौल में मेरे जैसे छात्र के सामने कई फिसलपट्टियां आईं लेकिन मैं क्यों बेदाग टिका रहा ? क्या किसी कानून के डर से ? नहीं। अपने सुदृढ़ आर्यसमाजी संस्कारों के कारण ! इसी तरह नवभारत टाइम्स और पीटीआई भाषा के संपादक रहते हुए मैं सदैव अपने कमरों के दरवाजे और खिड़कियां खुली रखता था। शीशे की दरवाजे और खिड़कियां, ताकि पूरा हाल मुझे देखता रहे और हाल को मैं देखता रहूं। यदि हमारे नौजवानों को हम पारदर्शी जीवन का संस्कार दे सकें तो हमारे इस जगत्गुरु भारत की प्रतिष्ठा बची रहेगी।

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