संघ करें सामाजिक चिंता, न चुनाव चिंता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर्वोच्च अधिकारियों की जो बैठक इस समय ग्वालियर में चल रही है, वह पिछले पांच वर्षों की बैठकों में सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह चुनाव का मौसम है। यह भाजपा के जीवन-मरण का सवाल है। इसमें शक नहीं कि भाजपा को जिता लाने में संघ अपनी पूरी ताकत लगा देगा। संघ-जैसा सशक्त संगठन भाजपा के पास है, वैसा हिंदुस्तान के किसी भी दल के पास नहीं है। 

यह तो ठीक है लेकिन मैं संघ से पूछता हूं कि क्या सिर्फ इसी काम के लिए डॉ. हेडगावर और गुरु गोलवलकर ने इसे खड़ा किया था? यह ठीक है कि शिक्षा और सेवा के क्षेत्र में संघ सराहनीय काम कर रहा है लेकिन सामाजिक बुराइयों के खिलाफ यदि वह कटिबद्ध नहीं हेागा तो उसके ये सेवा-कार्य भी निरर्थक सिद्ध हो जाएंगे। ये बातें अब से लगभग 55-60 साल पहले मैं जब भी गुरुजी से इंदौर में किया करता था तो उनका जवाब होता था कि इस समय हमारा सिर्फ एक लक्ष्य है। वह है, हिंदू समाज को संगठित करना। 

क्या अब भी इसी लक्ष्य की आड़ लेकर संघ अकर्म की मुद्रा धारण किए रहेगा? मैं तो समझता हूं कि सिर्फ हिंदू समाज ही नहीं, देश के सभी तबकों को साथ लेकर संघ चाहे तो सामाजिक क्रांति का सूत्रपात कर सकता है। जो काम दर्जनों सरकारें और प्रधानमंत्री लोग मिलकर नहीं कर सकते, वह अकेला संघ कर सकता है। मुझे खुशी है कि पूर्व सर संघचालक स्व. सुदर्शन ने मेरे आग्रह पर मुस्लिम मंच खड़े किए। मुझे तब और भी आनंद होगा जब सारा मुस्लिम जगत यह कहेगा कि भारतीय मुसलमान दुनिया का सर्वश्रेष्ठ मुसलमान है। 

हमारा मुसलमान भारतवादी कहलवाए, राष्ट्रवादी कहलवाए, यह जरुरी है। भारत राष्ट्र को यदि सृदृढ़ बनाना है तो संघ को चाहिए कि सारे भारतीयों को वह सबसे पहले अंग्रेजी भाषा की गुलामी से मुक्ति दिलाए। मोहन भागवत ने पांच साल पहले बेंगलूर के अधिवेशन में मेरा नाम लेकर इस अभियान को शुरु किया था। उसे बढ़ाया जाए। जैसे स्वभाषा में हस्ताक्षर के लिए सबसे संकल्प करवाया गया था, वैसे ही संकल्प करोड़ों लोगों से नशे, मांसाहार, रिश्वत लेने-देने और जातिवाद के विरुद्ध करवाएं। अराकान (वर्मा) से खुरासान (ईरान) और त्रिविष्टुप (तिब्बत) से मालदीव तक आर्यावर्त्त का महासंघ खड़ा करना या जन-दक्षेस बनाना भी बहुत जरुरी है। अगर संघ इसे नहीं करेगा तो कौन करेगा?

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