बोफोर्स से बदतर रफाल

रफाल-सौदे ने हमारी सरकार को अब काफी मुसीबत में फंसा दिया है। यह तो बोफोर्स से भी ज्यादा खतरनाक रुप ले सकता है। राजीव गांधी बोफोर्स के मामले को अंत तक छिपाते चले गए, क्योंकि उसके ज्यादातर दलाल विदेशी थे लेकिन रफाल-सौदा इसलिए भयंकर सिद्ध हो रहा है कि इसमें 30 हजार करोड़ रु. खाने वाले एक भारतीय दलाल का नाम जमकर उछल रहा है। 

पिछले पांच-छह सप्ताह में अंग्रेजी अखबार ‘हिंदू’ ने जिन दस्तावेजों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि रफाल-सौदे में मोदी सरकार ने बड़ी-बड़ी धांधलियां की हैं, उन दस्तावेजों के बारे में सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा है कि ये सब दस्तावेज ‘गोपनीय’ थे। इसीलिए अदालत इन पर ध्यान न दे और सरकार ‘हिंदू’ अखबार और ‘एएनआई’ न्यूज एजेंसी पर मुकदमा चलाएगी। 

अदालत ने सरकार के इस दावे को कूड़े की टोकरी के हवाले कर दिया है और कहा है कि यदि उन दस्तावेजों में सच्चाई है तो कोर्ट उन्हें स्वीकार करेगी। यह मोदी सरकार के मुंह पर अदालत का तमाचा है। बाद में अदालत का फैसला जो भी आए, इस समय उसके इस रवैऐ ने सरकार की दाल पतली कर दी है। पुलवामा-कांड के बाद आतंकी शिविरों पर हमले से सरकार को जो थोड़ी-सी बढ़त मिली थी, वह अब सांसत में पड़  गई है। 

विदेशी एजेंसियों द्वारा प्रसारित बालाकोट के चित्रों से भी प्रचार मंत्री के दाव-पेच ढीले पड़ गए हैं। अब सरकार यदि गोपनीयता अधिनियम आदि की आड़ लेकर मीडिया के पीछे पड़ेगी तो करोड़ों मतदाताओं की सहानुभूति खो देगी और राजीव गांधी की सरकार की तरह सारी दुनिया में बदनाम हो जाएगी। ‘गोपनीय दस्तावेजों’ का गायब हो जाना ही सरकार की पोलपट्टी का प्रमाण है। 

जब ‘हिंदू’ ने पहले दिन इन दस्तावेजों के आधार पर खबर छापी थी, तब से अब तक यह सरकार क्या खर्राटे खींच रही थी ? इन दस्तावेजों पर आपत्ति करके सरकार ने इन्हें प्रामाणिक सिद्ध कर दिया है। अब बेहतर तो यह होगा कि अदालत और जनता के सामने सरकार सारी सच्चाई साफ-साफ रख दे और वे यदि यह महसूस करें कि यह रफाल-सौदा रद्द करने लायक है तो इसे वह रद्द कर दे।

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