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भाजपा फूंक-फूंककर कदम बढ़ाए

कर्नाटक और मध्यप्रदेश, इन दोनों प्रांतों की सरकारों को गिराने की खबरें गर्म हैं। दोनों प्रदेशों में भाजपा विपक्ष में है। भाजपा इन दोनों प्रदेशों में सत्तारुढ़ होते-होते रह गई। मप्र में तो उसे वोट भी कांग्रेस से ज्यादा मिलें लेकिन सीटें कम रह गईं। दोनों राज्यों में भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ रहा है। केंद्र में उसकी सरकार है, राज्यपाल भी इसी सरकार द्वारा नियुक्त किए गए हैं। फिर भी वह सत्ता-सुख से वंचित है। 

इसके बावजूद क्या वजह है कि भाजपा के सारे कन्नड़ विधायकों की घेराबंदी करके हरियाणा के एक होटल में रखा गया है ? भाजपा का आरोप है कि कर्नाटक की कुमारस्वामी सरकार उसके विधायकों को तोड़ने की कोशिश कर रही है। उन्हें वह लालच दे रही है। समझ में नहीं आता कि वे टूटकर जाएंगे कहां ? यदि पांच-दस विधायक टूट भी जाएं तो वे दल-बदल नहीं कर सकते। वे विधानसभा से निकाल दिए जाएंगे। उन पर दल-बदल कानून थोप दिया जाएगा और फिर बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस और जनता दल (से) मिलाकर 116 विधायक हैं, जबकि बहुमत के लिए 113 सदस्यों की जरुरत है। 

कुमारस्वामी को एक बसपा विधायक का समर्थन भी है। यदि उनके दो निर्दलीय विधायकों ने अपना समर्थन वापस ले लिया तो भी उनके पास कुल 117 याने चार अतिरिक्त विधायकों का समर्थन है। वे कहते हैं कि वे निश्चित हैं। लेकिन यह निश्चिंतता खतरनाक है। उन्होंने खुद बताया है कि भाजपा उनके विधायकों को 50 करोड़ रु. इस्तीफा देने के लिए दे रही है और यह वादा कर रही है कि अगले चुनाव में लड़ने के लिए वह उन्हें 30 करोड़ रु. देगी। यदि भाजपा ने कांग्रेस और जनता दल के 5-6 विधायक और तोड़ लिये तो कुमारस्वामी सरकार अल्पमत में चली जाएगी। ऐसे में राज्यपाल भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं। 

लगभग यही खेल मप्र में होने की संभावना है लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने इस तरह की जोड़-तोड़ को गलत बताया है। मैं समझता हूं कि चौहान ने काफी परिपक्वता और दूरदर्शिता का परिचय दिया है। इस समय लोकसभा चुनाव सिर पर हैं। यदि भाजपा पर चालबाजी, रिश्वतबाजी और तिकड़मबाजी के आरोप लग गए तो मोदी की पहले से लड़खड़ाती गाड़ी को धराशायी होने से कोई रोक नहीं पाएगा। 

येदियुरप्पा और चौहान के आचरण में जमीन-आसमान का अंतर है लेकिन मप्र और कर्नाटक में आज जो भी उठा-पटक चल रही है, उसका कर्णधार भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व है। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व लोकसभा के चुनाव में अपनी छवि निष्कलंक रखे, यह बहुत जरुरी है। इसीलिए प्रांतीय नेतागण यदि सत्ता के लालच में अंधे हो रहे हैं तो उसका कर्तव्य है कि वह उन्हें रोके। लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपनी प्रतिष्ठा बचाना है तो उसे अभी फूंक-फूंककर कदम बढ़ाने होंगे।

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