हुर्रियत ने कहा, सुरक्षा कोई मसला नहीं

श्रीनगर। जम्मू कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस लिए जाने के फैसले को हुर्रियत कांफ्रेंस ने राजनीति से जोड़ा है। हुर्रियत की ओर से कहा गया है कि पुलवामा हमले के बाद से हुर्रियत नेताओं की सुरक्षा का मामला उठाया जा रहा था और इस तरह पूरे मामले का राजनीतिकरण किया जा रहा था। इस बीच हुर्रियत के उदारवादी धड़े के नेता मीरवाइज उमर फारूक ने कहा कि उनके लिए सुरक्षा कोई मसला नहीं है।

मीरवाइज ने अलगाववादी नेताओं से सुरक्षा वापस लेने के फैसले पर कहा कि केंद्र सरकार ने उनकी जान पर खतरे की आशंका के आधार पर सुरक्षाकर्मियों को रखने का जोर दिया था। बाद में हुर्रियत के प्रवक्ता ने कहा- सुरक्षा घेरा हम लोगों के लिए कोई मसला ही नहीं है। यह सरकार का फैसला था कि इसे जारी रखा जाए या इसे हटा दिया जाए।

हुर्रियत प्रवक्ता ने कहा- सरकार और इसके साथ दुष्प्रचार में शामिल कश्मीर विरोधी मीडिया अलगाववादी नेताओं को पुलिस सुरक्षा उपलब्ध होने के मामले को कश्मीर मसले का राजनीतिकरण करने के मकसद से उठा रही हैं। दोनों ही इस बात से वाकिफ हैं कि इससे कश्मीर विवाद का समाधान की वास्तविकता को नहीं बदला जा सकता और न जमीनी हकीकत या हमारे प्रमुख कदम को ही बदला जा सकता।

प्रवक्ता ने कहा कि हुर्रियत नेताओं ने कभी भी अपनी सुरक्षा की मांग नहीं की थी, बल्कि वास्तव में सरकार ने उनकी जान पर खतरे की आशंका जताते हुए उन्हें सुरक्षा मुहैया कराई थी। जिन अलगाववादी नेताओं से सुरक्षा वापस ली गई है उनमें शामिल शब्बीर अहमद शाह को प्रवर्तन निदेशालय, ईडी ने पिछले साल गिरफ्तार भी किया था और वे फिलहाल दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद हैं। हुर्रियत के कट्टरपंथी धड़े के प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी को कोई सुरक्षा उपलब्ध नहीं है। वे पिछले कई महीने से हैदरपोरा स्थित निवास पर नजरबंद हैं और उन्हें बाहर जाने से रोकने के लिए बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों व राज्य पुलिस के जवानों को तैनात रखा गया है।

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