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खेल में लिंग व नस्ल का भला क्या मतलब?

श्रुति व्यास
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दोनों के ही लिए खिताबी मैच एक सपने जैसा था। जापान की बीस वर्षीय नाओमी ओसाका पहली बार सेरेना के सामने ग्रैंड स्लैम खेल रही थीं। जबकि एक साल की बेटी  की मां सेरेना विलियम्स के लिए चौबीसवां सिंगल मुकाबला था। दोनों के लिए यह दिलचस्प मुकाबला नया इतिहास लिखने से कम नहीं था। इसलिए तय था कि सबकुछ धमाकेदार होना है। लेकिन जब मुकाबला हुआ और उसमें जो कुछ हुआ, जैसा नजारा बना वह किसी को रास नहीं आया। 

नाओमी ओसाका के लिए सेरेना विलियम्स एक रोल मॉडल थीं, एक आदर्श थीं। सेरेना को देख कर ही नाओमी ने टेनिस की दुनिया में कदम रखा था। हैती के रहने वाले उसके पिता लिओनार्ड फ्रैंकॉइस जापान चले गए थे। वहीं 1999 के फ्रैंच ओपन में उन्होंने विलियम बहनों (सेरेना और उनकी बहन) को देखा था और इसी दौरान उनकी मुलाकात नाओमी ओसाका की मां से हुई थी। 

इसके बाद तो लिओनार्ड फ्रैंकॉइस विलियम बहनों के पिता रिचर्ड विलियम्स के कदमों पर चल पड़े। उन्होंने अपनी बेटियों का टेनिस में पदार्पण करा दिया। नाओमी का खेल और प्रतिभा भी सेरेना की दिशा में बढ़ रही थी। उसकी रफ्तार सवा सौ मील प्रतिघंटे के करीब पहुंच चुकी थी। हाल में ओसाका ने लंबे समय तक सेरेना के साथ खेलने वाले साशा बाजिन को अपना कोच बनाया था। बाजिन का कहना है कि उसमें (नाओमी) वे कुछ-कुछ विलियम्स की झलक पाते हैं, न सिर्फ उसके जोरदार ग्राउंडस्ट्रोक में, बल्कि बड़े मुकाबले के प्रति उसके दमखम, जोश और सपने को लेकर भी। 

उसके गेम में बहुत ही कम समय में गजब का सुधार आया, जो फाइनल के दिन देखने को मिला। यह वह दिन था जब नाओमी ओसाका अपनी रोल मॉडल सेरेना के लिए चुनौती बन कर उभरीं और अपने को साबित कर दिखाया। मैच की शुरुआत से ही ओसाका ने विलियम्स पर पकड़ बना ली थी। जिस तरह से दोनों के बीच खेल ने रफ्तार पकड़ी, वैसे ही ओसाका का पलड़ा भारी होता चला गया। सेरेना के हर तरह के दबाब से वह आसानी से निपट ले रही थी। और कोई बहुत देर नहीं लगी जब ओसाका ने सर्विस ब्रेक करते हुए सेरेना से दूसरे और तीसरे सर्विस गेम में बढ़त हासिल कर ली। हालांकि तब तक भी इस बात की कतई गुंजाइश नहीं लग रही थी कि सेरेना का पलड़ा कमजोर पड़ने वाला है। यह दूर-दूर तक नहीं लग रहा था कि सेरेना का समय बदल सकता है।         

सेरेना की हाल में जो वापसी हुई है उसकी वजह यह रही है कि अपनी सर्व के कारण मैच में यदि सेरेना पहला सेट गंवा देतीं है तो  उसके बाद भी मैच में वापसी की क्षमता उनमें है। ओसाका भी इसी उम्मीद को लेकर आगे बढ़ रही थी। ओसाका ने एक नहीं, कई बार कहा है कि सेरेना को हराना कभी भी उनका सपना नहीं रहा। ओसाका का कहना था कि वे तो सेरेना के भीतर एक चिंगारी पैदा कर उन्हें नया जोश दिलाना चाहती थीं, ताकि दुनिया की इस महान खिलाड़ी के साथ खेलने का मजा ले सकें।       

देखने के नाते यह टेनिस का बहुत ही बढ़िया मैच था। हर किसी ने इसे पसंद किया। हर पाइंट में हर शॉट गजब का बना, जैसे कोई नाटक हो। लेकिन यह नाटक एक ऐसी बुरी घटना के साथ खत्म हुआ जिसकी शायद ही किसी ने कल्पना की होगी।

जो कुछ हुआ उसकी कल्पना न तो ओसाका ने व न उनके निज प्रशंसकों ने की थी। बेटी को जन्म देने के बाद सेरेना की वापसी को लेकर जो धमाकेदार विज्ञापन अभियान चला और पांच भागों वाली जो डॉक्यूमेंट्री बनी, और इन सबसे सेरेना में कोर्ट पर दुबारा वापसी का जो उत्साह बना था, रेफरी के एक ही कॉल से सब पर पानी फिर गया। 

फाइनल मैच का जो दुखदायी अंत देखने को मिला उससे सारे टेनिस प्रशंसक स्तब्ध रह गए। कुछ का मानना था कि सेरेना अंपायर की जलन का शिकार हुईं हैं, जबकि कुछ का मानना रहा कि सेरेना का गैर-पेशेवर रवैया इस घटना के लिए जिम्मेदार था। एक बात तो यह, जिस पर हर कोई सहमत हो सकता है, कि अधिकारियों का जिस तरह का बर्ताव रहा, उसकी उम्मीद नहीं की जा सकती, भले चेयर अंपायर कार्लोस रामोस ही क्यों न हों, जिन्होंने आचार संहिता के उल्लंघन पर तीन बार सेरेना को चेताया था और सेरेना फट पड़ीं थीं।     

हालांकि किसी को भी यह लग सकता है कि सेरेना नस्लवाद और लिंग भेदभाव का शिकार हुई हैं, और यह भी सही है कि कोर्ट पर पुरुष खिलाड़ी भी इसी तरह से अंपायरों से उलझते रहे हैं, लेकिन उन्हें इस तरह की सजा नहीं दी गई। फिर भी इस बात को स्वीकारने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए कि यूएस ओपन के फाइनल को सेरेना और बेहतर तरीके से संभाल सकती थीं।    

ट्रॉफी समारोह के दौरान कोर्ट पर अपनी टिप्पणियों और मैच के बाद दिए इंटरव्यू में उन्होंने जिस तरह का अजीबो-गरीब बर्ताव दिखाया, वह कोर्ट पर किए गए अपने व्यवहार को छिपाने की एक कोशिश थी। जैसे एक पत्रकार के यह पूछने पर कि क्या वे कुछ अलग कर देती? अंपायर रामोस ने किसी पुरुष खिलाड़ी से चोर कह देने के बाद भी गेम नहीं छीना। इसीलिए मैं फट पड़ी। लेकिन मैं महिलाओं और समानता के लिए लड़ती रहूंगी। भले इससे मुझे कुछ मिले या न मिले, लेकिन आगे आने वालों के लिए एक रास्ता तो बनेगा।        

क्या सेरेना विलियम्स सही कह रही हैं? अगर आप तटस्थ रह कर इस बारे में सोचते हैं तो सेरेना विलियम्स गलत हैं।  

टेनिस बहुत ही शानदार खेल है। एक ऐसा खेल जिसमें आपका धैर्य पूरी तरह से सामने दिखता है। खेल जबर्दस्त खेल भावना का प्रतीक है। लेकिन जब खेल को लिंग और नस्ल जैसे भेदभाव में रंग दिया जाता है, तो लगता है टेनिस की जड़ों में कहीं न कहीं एक तरह की सामाजिक-राजनीति कुंठाए पैठी हुई है, और इसका अहसास तब होता है जब सेरेना विलियम्स जैसी खिलाड़ी के भीतर से इसका विस्फोट होता है। खेल एक ऐसा क्षेत्र है जिसको आप किसी खास चश्मे से नहीं दख सकते, और टेनिस में कभी किसी ने ऐसा किया भी नहीं है। टेनिस एक ऐसा रोमांच भरा खेल है जिसका हम पल-पल का मजा लेते हैं और जब खिलाड़ी की चौंकाने वाली हार देखते हैं तो एक झटका-सा लगता है। एक महिला का सेमीफाइनल या फाइनल ठीक उसी उत्सुकता और रोमांच के साथ देखा जाता है जैसे कि पुरुषों का। इसलिए जब खेल की कोई उत्कृष्ट खिलाड़ी जो सबके लिए रोल मॉडल हो, अगर कोई विजेता जैसा व्यवहार करती हो, तो उसे चैंपियन की जिम्मेदारियों का अहसास कराना कोई गलत तो नहीं है। 

खेल में समानता के लिए आवाज उठाना है तो सेरेना को यह याद दिलाना पड़ेगा कि वह यह गेम उसी उत्साह और भावना के साथ खेलें, जैसे कि बाकी पुरुष प्रतिभागी खेलते हैं। खिलाड़ी चाहे कोई भी हो, महिला या पुरुष, या फिर उसके आलोचक, खेल को कोई रंग नहीं देना चाहिए, बल्कि सम्मान करते हुए उसे खेलभावना के साथ ही देखना और खेला जाना चाहिए। खेल में बड़ा कोई नहीं है, चाहे वह सेरेना हों या फिर फैसला देने वाले अंपायर या फिर दर्शक।

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