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सरदार पटेल और विभाजन का सच

बलबीर पुंज
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हाल में देश के पूर्व गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल दो कारणों से चर्चा में रहे। पहला- गुजरात स्थित साधु द्वीप पर बनी विश्व की सबसे ऊंची (182 मीटर) प्रतिमा "स्टैच्यू ऑफ यूनिटी" को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र को समर्पित करना, जिसपर सवाल खड़े किए जा रहे है। और दूसरा- पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी द्वारा विभाजन के लिए सरदार पटेल और भारतीयों पर निशाना साधना। जो राजनीतिक अधिष्ठान सरदार पटेल को विस्मृत कर चुकी है, क्या उसमें कोई बदलाव आया है? आखिर देश के रक्तरंजित विभाजन का वास्तविक जिम्मेदार कौन है? 

पटेल की 143वीं जयंती पर जब रंगारंग कार्यक्रम के बीच भारत के लौहपुरुष सरदार पटेल को 71 वर्ष पश्चात वांछित श्रद्धाजंलि दी जा रही थी और विभाजन के बाद देश को अखंड रखने में उनकी सक्रिय भूमिका का यशगान किया जा रहा था- तब पांच दिन पूर्व 26 अक्टूबर को बुद्धिजीवी हामिद अंसारी, जो दस वर्षों तक लगातार देश के उप-राष्ट्रपति भी रहे- उन्होंने दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान बंटवारे के लिए पाकिस्तान और ब्रिटिश के साथ भारतीयों को भी जिम्मेदार ठहरा दिया। 

अंसारी ने दावा करते हुए कहा कि विभाजन के पिछले विरोध के बावजूद 11 अगस्त 1947 को सरदार पटेल ने अपने एक भाषण में कहा था कि भारत को एकजुट रखने के लिए इसका बंटवारा किया जाना चाहिए। अंसारी आगे कहते हैं, ‘हर पांचवां शख्स अल्पसंख्यक है। हर सातवां व्यक्ति मुस्लिम है। तो क्या इतनी बड़ी आबादी को आप गैर बना सकते हैं- कोई तरीका है और यदि आप बनाएंगे तो उसका नतीजा क्या होगा? बकौल अंसारी, ‘सियासत ने जो रुख पलटा तो किसी को जिम्मेदार बनाना था, तो उन्होंने कहा कि जिम्मेदार बना दो, किसे, मुसलमानों को बना दो और यह सभी ने मान भी लिया कि मुसलमानों को जिम्मेदार बनाना चाहिए।’ 

निसंदेह, जो कुछ हामिद अंसारी ने कहा- वह सत्य तो है, किंतु आधा अधूरा। आखिर किस विषाक्त चिंतन ने विभाजन की नींव तैयार की? और क्यों मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग आज भी स्वयं को स्वतंत्र भारत में ‘गैर’ समझता है? क्या यह सत्य नहीं ‘गैर’ समझने की इसी भावना ने पाकिस्तान के जन्म का मार्ग प्रशस्त किया था? 

जिस विषाक्त ‘दो राष्ट्र सिद्धांत’ ने भारत के रक्तरंजित विभाजन की नींव रखी- जिसे मुस्लिम लीग, मोहम्मद अली जिन्नाह और मोहम्मद इकबाल (अलामा इक़बाल) आदि ने मूर्ति रूप दिया- उसका सूत्रपात अंग्रेजी हुकूमत के सबसे वफादार सर सैयद अहमद खान ने 19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में किया था। वर्ष 1885 में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के साथ देश में पूर्ण स्वतंत्रता और लोकतंत्रीय व्यवस्था की मांग उठनी आरंभ हुई, तब ब्रितानी शासकों के प्रति निष्ठावान सैयद अहमद खान ने मुस्लिमों को राष्ट्रीय आंदोलन से दूर करना प्रारंभ कर दिया। उन्होंने 16 मार्च 1888 को मजहब आधारित विभाजन और मुस्लिम अलगाव के वैचारिक दर्शन का शिलान्यास तब किया, जब वह मेरठ में एक रैली को संबोधित कर रहे थे। 

उनके अनुसार, ‘सोचिए यदि अंग्रेज भारत में नहीं है, तो कौन शासक होगा? क्या दो राष्ट्र- हिंदू और मुसलमान एक ही सिंहासन पर बराबर के अधिकार से बैठ सकेंगे? निश्चित रुप से नहीं। आवश्यक है कि उनमें से एक, दूसरे को पराजित करें। जबतक एक कौम दूसरे को जीत न ले, देश में शांति कभी भी स्थापित नहीं हो सकती। मुस्लिम आबादी हिंदुओं से कम हैं, किंतु वह अपने दम पर अपना मुकाम पाने में सक्षम हैं।’ 

इस विचार से अधिकांश मुसलमानों में यह भावना दृढ़ हो गई कि मध्यकाल में जिन हिंदुओं पर हमनें (मुस्लिम शासकों) छह सौ वर्षों तक राज किया, उनके साथ हम बराबरी के साथ कैसे रह सकते है। विडंबना देखिए इस भावना से आज भी भारतीय मुस्लिम समाज का एक वर्ग ग्रस्त है, जो स्वयं कभी "गैर" तो कभी ‘असुरक्षित’ कहना पसंद करते है। कश्मीर संकट उसका का जीवंत उदाहरण है। 

अपने विभाजनकारी एजेंडे के अंतर्गत सैयद अहमद खान ने सन 1875 में एक शैक्षणिक संस्था की शुरुआत की, जो वर्ष 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (अ.मु.वि.) के रुप में स्थापित हुआ। इसी विश्वविद्यालय ने सैयद अहमद खान के विषाक्त सिद्धांत को पूरे देश में फैलाया। सैयद के ‘दो राष्ट्र सिद्धांत’ ने यह विचार स्थापित कर दिया कि मुसलमान का दैवीय कर्तव्य है कि वह स्वतंत्रता आंदोलन से दूर रहे। अपने इस अभियान में वह काफी हद तक सफल भी हुए, क्योंकि मौलाना अबुल कलाम आजाद, जाकिर हुसैन, बदरुद्दीन तैयबजी और रहमतुल्लाह सयानी जैसे कुछ अपवाद ही राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हुए। शेष मुस्लिम समाज के बड़े वर्ग ने स्वयं को गाजी मानसिकता से जोड़ते हुए खुद को कासिम, गजनी, बाबर, खिलजी और औरंगजेब जैसे क्रूर आक्रांताओं को अपना आदर्श माना और पाकिस्तान आंदोलन में शामिल हो गए। यह अलग बात है कि विभाजन के बाद पाकिस्तान की मांग करने वाले अधिकतर लोग भारत में ही बस गए। 

पूर्व उप-राष्ट्रपति ने विभाजन के लिए सरदार पटेल पर भी परोक्ष रूप से निशाना साधा है। वास्तव में, पटेल अगस्त 1946 में "मुस्लिम भावना" को व्यक्त करने के लिए मुस्लिम लीग द्वारा बुलाई गई उस ‘सीधी कार्रवाई’ से उनके मूल उद्देश्य को समझ चुके थे- जिसमें हजारों निरपराध हिंदुओं का नरसंहार हुआ था और सैकड़ों महिलाओं का सार्वजनिक बलात्कार व हिंदुओं का बलात् मतांतरण किया गया था। इस घटना के बाद देश के अन्य क्षेत्रों में गृहयुद्ध जैसी स्थिति हो गई थी। 

क्या विभाजन रुक सकता था? मुस्लिम लीग की पाकिस्तान संबंधी मांग को ब्रितानियों के साथ वामपंथियों का समर्थन प्राप्त था। यदि तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने विभाजन से पहले पराजयवादी मानसिकता और शुतुरमुर्ग वाली प्रवृति नहीं दिखाता, तो भारत की भौगोलिक स्थिति आज अलग हो सकती थी। क्या यह सत्य नहीं कि 1860-65 के कालखंड में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम ने दासता के पैरोकारों की मांगों को न केवल कुचला, अपितु उनके द्वारा थोपे गृहयुद्ध का भी डटकर सामना किया और अंत में वह विजयी भी हुए? इस घटना के 82 वर्ष बाद जब जिन्नाह ने मजहब आधारित पाकिस्तान की मांग उठाकर भारत में मजहबी उन्माद फैलाया, यदि तब उसका उचित प्रतिकार होता, तो क्या स्थिति कुछ और नहीं होती? 

सच तो यह है कि आज जिस सरदार पटेल पर विभाजन का परोक्ष दोष मढ़कर अपमानित किया जा रहा है, वह 15 में से 12 तत्कालीन कांग्रेस समितियों के समर्थन होने के बाद भी देश के पहले प्रधानमंत्री नहीं बन पाए। किंतु दृढ़-प्रतिज्ञी पटेल ने पद से बढ़कर राष्ट्र को सर्वोपरि माना। उनके कुशल नेतृत्व और दूरदर्शी नीतियों के कारण ही शेष भारत आज संप्रभु देश के रूप में अखंड खड़ा है।  कांग्रेस द्वारा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ स्मारक को ‘गांधी बनाम पटेल’ बनाने का हास्यास्पद प्रयास हुआ है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सरदार पटेल के बजाय गांधीजी की ऊंची प्रतिमा नहीं बनाने पर भाजपा पर निशाना साधा है। कटु सत्य तो यह है कि बापू के देहांत के बाद कांग्रेस ने गांधीजी को केवल भौतिक रूप (भवनों और सड़कों का नामकरण सहित) से सहेजने की कोशिश तो की- किंतु उनके विचारों, राष्ट्रवाद और सनातन चिंतन को वामपंथी बौद्धिकता के नीचे दफन कर दिया। इसी कारण वर्तमान गांधीजी के सच्चे अनुयायी और राष्ट्रवादी सरदार पटेल का सम्मान, कांग्रेस में एक विशेष परिवार को असहज कर देता है। अस्पृश्यता, जातिभेद, गौरक्षा, मतांतरण, हिंदी, स्वच्छता, मजहबी कट्टरता, विभाजनकारी नीतियों और रामराज्य पर गांधीजी ने जो विचार अपने जीवनकाल में व्यक्त किए थे- क्या वर्तमान कांग्रेस की नीतियों और इन विचारों में कोई समानता दिखती है? 

क्या अंसारी और उनके कांग्रेस-वामपंथी परिवार के लोग इस प्रश्न का उत्तर दे सकते है कि गांधीजी- जो सहनशील, समावेशी और अहिंसा के मूर्त रूप थे, वह भी क्यों भारतीय मुसलमानों को न केवल अपने साथ खड़ा नहीं कर पाएं और न ही उन्हे वैसा स्नेह मिला, जैसा जिन्ना को बड़ी सहजता के साथ प्राप्त हो गया? क्या उस विषैली मानसिकता पर कभी ईमानदार चर्चा होगी?

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